अगर मर्द को यह इल्म हो जाए कि न-महरम औरत की तरफ एक नज़र भी
उसकी इबादत की लज़्ज़त छीन लेती है
और उसे अल्लाह के नज़दीक कितना गुनाहगार बना देती है,
तो वह अपनी आँखों में कील ठुकवा ले
लेकिन नामहरम की तरफ निगाह न उठाए।
और अगर औरत को यह इल्म हो जाए
कि बेपर्दगी से उसका रब किस क़दर नाराज़ होता है,
और ज़ीनत का इज़हार उसे किस दर्जे अज़ाब का मुस्तहिक़ बना देता है,
और मर्द औरत को किस नज़र से देखता है,
तो वह सात कपड़ों में भी खुद को ढाँप कर मुतमइन न हो।
यह दीन सख़्ती नहीं, हिफ़ाज़त है।
यह पर्दा क़ैद नहीं, इज़्ज़त है।
ज़ुबैर दीवान | अल-फ़लाह