जब माता-पिता ही ज़ुल्म पर उतर आएं 
इस्लाम ने माता-पिता को जो मक़ाम दिया है, वह किसी से ढका छुपा नहीं। क़ुरान में बार-बार उनके साथ हुस्न-ए-सुलूक, अदब, इताअत और खिदमत का हुक्म दिया गया है। यहां तक फ़रमाया गया कि माता-पिता को "उफ़" तक न कहा जाए, उनके सामने आवाज़ बुलंद न की जाए और उनके साथ हमेशा नरमी का बर्ताव किया जाए। यह सब हक़ है, सच है और हर मुसलमान पर लाज़िम है।
लेकिन सवाल यह है कि:
अगर यही माता-पिता अपनी औलाद के साथ ज़ुल्म करें, ना-इंसाफ़ी करें, मार पीट करें, गालियां दें, सब के सामने ज़लील करें, ज़ेहनी और जज़्बाती टार्चर करें, और घर से निकाल दें तो क्या तब भी खामोश रहना ही दीन है?
इस सवाल से मुंह मोड़ लेना आसान है, मगर इस का सामना करना ज़रूरी है, क्योंकि यह मसला हजारों घरों में रोज़ पैदा हो रहा है।
इस्लाम सिर्फ़ माता-पिता के हुक़ूक़ का नाम नहीं, बल्कि इस्लाम अदल, तवाज़ुन और रहम का मुकम्मल निज़ाम है। क़ुरान साफ़ कहता है कि अल्लाह अदल का हुक्म देता है। अदल का मतलब यह है कि हर शख्स को उस का हक़ मिले, और किसी पर ज़ुल्म न हो। यह उसूल माता-पिता पर भी लागू होता है।
नबी करीम ﷺ ने वाज़ेह फ़रमाया कि अपनी औलाद के दरमियान इंसाफ़ करो। अगर किसी को ज़्यादा और किसी को कम समझा जाए, किसी को बार-बार ज़लील किया जाए और किसी को लाड प्यार दिया जाए, तो यह तरबियत नहीं बल्कि खुला ज़ुल्म है। यह रवैया घर को सुकून की जगह के बजाए अज़ियत खाना बना देता है।
यह कहना कि "हम बड़े हैं, हमें कोई कुछ न कहे", या यह जुमला कि "मैंने अपने बाप की नहीं मानी, तो तेरी क्यों मानूं"  यह सब अना, तकब्बुर और जाहिलियत की सोच है, इस्लाम की तालीम नहीं। इस्लाम में बड़ाई उम्र से नहीं, अदल, तकवा और अख़लाक़ से होती है। जो शख्स अपनी बड़ाई के नशे में अपनी औलाद के जज़्बात कुचल दे, वह दरअसल खुद अपने किरदार को रौंद रहा होता है।
औलाद को गालियां देना, मारना, सब के सामने बे-इज़्ज़त करना, बार-बार यह एहसास दिलाना कि तुम कुछ नहीं हो, तुम नाकाम हो, तुम बोझ हो यह सब अल्फाज़ और रवैये तलवार से ज़्यादा ज़ख्म देते हैं। जिस्म के ज़ख्म भर जाते हैं, मगर दिल पर लगने वाले ज़ख्म जिंदगी भर नहीं भरते। ऐसी तरबियत से न नेक औलाद बनती है और न ही सेहतमंद मुआशरा।
इस्लाम यह नहीं कहता कि ज़ुल्म सहते रहो और ज़बान बंद रखो। हदीस का उसूल है:
खालिक़ की नाफरमानी में किसी मखलूक की इताअत नहीं।
अगर माता-पिता का रवैया ज़ुल्म, ज़्यादती और गुनाह पर मबनी हो तो इस में उन की अंधी इताअत जायज़ नहीं, हां बदतमीज़ी, बदज़बानी और गुस्ताख़ी फिर भी हराम है।
अब असल सवाल यह है कि:
ऐसी सूरत में मज़लूम औलाद क्या करे?
औलाद को चाहिए कि सब से पहले सब्र और होश से काम ले, जज़्बात में आ कर बदतमीज़ी न करे, क्योंकि इस से मसला हल नहीं बल्कि मज़ीद बिगड़ता है। हिकमत के साथ, तन्हाई में, अदब के दायरे में रहते हुए अपना दर्द बयान करे। अगर बात न बने तो खानदान के किसी समझदार, दीनदार और बा-असर बुज़ुर्ग को दरमियान में डाले ताकि इस्लाह की सूरत निकल सके।
अगर इस के बावजूद तशद्दुद जारी रहे, मार पीट, ज़िल्लत, ज़ेहनी टार्चर और जान व इज़्ज़त को खतरा लाहिक़ हो जाए, तो ऐसी हालत में अपनी हिफाज़त करना न गुनाह है और न नाफरमानी। इस्लाम इंसान की जान, इज़्ज़त और ज़ेहनी सेहत को बहुत बड़ी नेमत करार देता है। ऐसी सूरत में खुद को ज़ुल्म के माहौल से बचाना मजबूरी नहीं बल्कि ज़रूरत बन जाता है।
मज़लूम औलाद को यह बात याद रखनी चाहिए कि अल्लाह मज़लूम की आह सुनता है, चाहे वह औलाद ही क्यों न हो। माता-पिता का मक़ाम बहुत बुलंद है, मगर यह मक़ाम ज़ुल्म की इजाज़त नामा नहीं।
इस्लाम हमें सिखाता है:
इज़्ज़त माता-पिता की करो, मगर ज़ुल्म को तक़दीर न समझो।
खामोशी से टूट जाना दीनदारी नहीं, बल्कि हिकमत के साथ हक़ पर खड़ा होना असल शऊर है।
यह मौज़ू कड़वा है, मगर सच है। और सच अगरचे तल्ख़ होता है, मगर शिफा भी वही देता है।

फ़क़ीर क़ादरी: मोहम्मद फ़िदा अल-मुस्तफ़ा क़ादरी 
पी जी रिसर्च स्कॉलर: दार अल-हुदा इस्लामिक यूनिवर्सिटी , केरला