بسم اللہ الرحمن الرحیم۔ 
حجاب، نقاب اور برقعہ: قرآنی احکام، آئینی آزادی اور میڈیا ڈیبیٹ کی حقیقت
               مضمون (72)

عصرِ حاضر میں بعض موضوعات کو دانستہ طور پر سنسنی، تعصب اور مخصوص بیانیے کے تحت اس انداز میں پیش کیا جا رہا ہے کہ اصل مسئلہ پس منظر میں چلا جاتا ہے اور فتنہ نمایاں ہو جاتا ہے۔ حجاب، نقاب اور برقعہ بھی انہی موضوعات میں شامل ہو چکے ہیں۔
نیوز چینلز پر ہونے والی طویل بحثیں بظاہر سماجی اصلاح کے نام پر ہوتی ہیں، مگر حقیقت میں اکثر اسلام اور مسلمانوں کے طرزِ زندگی کو مشکوک، متنازع اور پسماندہ ثابت کرنے کی کوشش محسوس ہوتی ہے۔ ایسے ماحول میں ضروری ہے کہ اس مسئلے کو جذبات کے بجائے قرآن، عقل، انصاف اور آئین کی روشنی میں دیکھا جائے۔
اسلام میں پردے کا تصور محض ایک لباس تک محدود نہیں بلکہ یہ حیا، وقار اور اخلاقی نظم کا حصہ ہے۔
حجاب ایک وسیع اصطلاح ہے جس میں سر ڈھانپنا، زینت میں اعتدال اور نگاہوں کی حفاظت شامل ہے۔
نقاب چہرے کا پردہ ہے جس میں صرف آنکھیں ظاہر رہتی ہیں۔
برقعہ مکمل جسم کو ڈھانپنے والا لباس ہے، جو حجاب کی ایک صورت ہے، مگر حجاب صرف برقعہ ہی کا نام نہیں۔
قرآنِ مجید میں لفظ برقعہ نہیں آیا، مگر پردے کا حکم پوری وضاحت کے ساتھ موجود ہے، جیسا کہ سورہ الاحزاب (59. 33) اور سورہ النور (31) میں بیان کیا گیا ہے، جہاں پردے کو عزت، شناخت اور تحفظ سے جوڑا گیا ہے۔
اسلام، آئین اور شخصی اختیار
اسلام نے پردے کا حکم ضرور دیا ہے، مگر جبر کا اسلوب اختیار نہیں کیا۔ اسی طرح بھارت جیسے جمہوری ملک کا آئین بھی ہر شہری کو مذہبی آزادی، شخصی اختیار اور مساوی مواقع کی ضمانت دیتا ہے۔
یہ پس منظر ذہن میں رکھ کر اگر موجودہ بحث کو دیکھا جائے تو اصل مسئلہ لباس نہیں بلکہ لباس کو ہدف بنا کر ذہن سازی ہے۔
ہمارے ملک بھارت میں یہ ایک مسلمہ حقیقت ہے کہ عورتیں مختلف طرزِ لباس اختیار کرتی ہیں، اور یہی تنوع مسلمانوں کے اندر بھی موجود ہے۔ کچھ مسلمان خواتین حجاب یا برقعہ پہنتی ہیں اور کچھ نہیں - یہ سراسر ان کا ذاتی، مذہبی اور آئینی حق ہے۔ کسی ایک طرزِ لباس کو ترقی یا پسماندگی کا پیمانہ بنانا نہ عقل کا تقاضا ہے اور نہ جمہوری اقدار کا۔
اسی طرح اگر کوئی دکاندار اپنی دکان کی حفاظت کے لیے کچھ اصول طے کرتا ہے تو یہ اس کا کاروباری اختیار ہے۔ جو خواتین یا افراد ان اصولوں سے مطابقت رکھتے ہوں گے وہ وہاں جائیں گے، اور جو نہیں رکھتے وہ کسی دوسری دکان کا انتخاب کریں گے۔ یہ فیصلہ دونوں طرف سے آزادانہ ہونا چاہیے، نہ کہ دباؤ، طنز یا نفرت کے ماحول میں۔
مگر یہ کہنا کہ. اگر ترقی کرنی ہے تو حجاب یا برقعہ اتارنا ہی پڑے گا” نہ صرف عورت کی آزادی پر حملہ ہے بلکہ اس کے وقار اور خودمختاری کی نفی بھی ہے۔ سوال یہ ہے کہ آپ کس اختیار سے کسی عورت کے لباس کو اس کی قابلیت، ذہانت یا ترقی سے جوڑ رہے ہیں؟ اور آپ کو یہ حق کس نے دیا کہ آپ اپنی پسند اور سوچ دوسروں پر مسلط کریں؟
اگر کوئی شخص خود کو جدید، ترقی یافتہ یا ماڈرن سمجھتا ہے، تو اسے چاہیے کہ وہ سب سے پہلے دوسروں کے انتخاب کا احترام سیکھے۔ کسی عورت کو اس کے لباس کی بنیاد پر طعنہ دینا، اسے کمتر ثابت کرنے کی کوشش کرنا یا ہراساں کرنا، درحقیقت جمہوریت اور آزادیِ اظہار کی روح کے خلاف ہے۔
جب ہر شہری کو اپنی مرضی کے مطابق جینے کا حق حاصل ہے، تو پھر حجاب یا برقعہ پہننے والی عورت اس آزادی سے کیوں محروم سمجھی جائے؟ وہ بھی اسی ملک کی شہری ہے، اسی آئین کے تحت جیتی ہے، اور اسی قانون کی پابند ہے۔ وہ ہر وہ تعلیم، عہدہ اور ترقی حاصل کرنے کی اہل ہے جس کا وہ خواب دیکھتی ہے. بشرطیکہ وہ ملکی قوانین کی پاسداری کرے، جو ہر شہری پر یکساں طور پر لاگو ہوتے ہیں۔
جرم، پردہ اور اجتماعی بدنامی
اگر کسی فرد نے برقعہ یا نقاب کو جرم کے لیے استعمال کیا، تو وہ جرم یقیناً قابلِ مذمت ہے اور مجرم کو قانون کے مطابق سزا ملنی چاہیے۔ مگر چند افراد کے عمل کو بنیاد بنا کر پورے اسلام، پردے اور مسلمان عورت کو مشکوک ٹھہرانا نہ انصاف ہے اور نہ دیانت۔
جرم کا تعلق لباس سے نہیں بلکہ نیت اور عمل سے ہوتا ہے، اور قانون بھی فرد کے عمل کو دیکھتا ہے، اس کے لباس کو نہیں۔
حجاب، نقاب اور برقعہ کو بار بار ترقی کے خلاف علامت بنا کر پیش کرنا دراصل ایک فکری دباؤ ہے، جس کا مقصد عورت کو اس کی شناخت سے کاٹنا ہے۔
یہ بیانیہ نہ اسلامی تعلیمات سے مطابقت رکھتا ہے، نہ آئینی اقدار سے، اور نہ ہی حقیقی ترقی کے تصور سے۔
حجاب، نقاب اور برقعہ کوئی فیشن نہیں، نہ ہی کسی پر تھوپنے کا آلہ ہیں۔ یہ ایمان، ثقافت، وقار اور شخصی آزادی کا اظہار ہیں۔
قرآن نے پردے کا حکم دیا، آئین نے مذہبی آزادی دی، اور عقل نے انصاف کا تقاضا رکھا ہے۔
اصل مسئلہ لباس نہیں، تعصب ہے۔
اصل خطرہ پردہ نہیں، دوغلا معیار ہے۔
اگر واقعی ہم ایک مہذب، جمہوری اور انصاف پسند معاشرہ چاہتے ہیں تو ہمیں:
جرم کو جرم رہنے دینا ہوگا
لباس کو لباس
اور انسان کو اس کی آزادی کے ساتھ جینے دینا ہوگا
یہی انصاف ہے،
یہی آئین کا تقاضا ہے،
اور یہی پائیدار سماجی ہم آہنگی کی بنیاد۔
   بقلم محمودالباری
Mahmoodulbari342@gmail.com

बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम। 
हिजाब, नकाब और बुर्का: कुरानी अहकाम, आईनी आज़ादी और मीडिया डिबेट की हकीकत
               मज़मून (72)

अस्र-ए-हाज़िर में बाज़ मौजूआत को दानिस्ता तौर पर सनसनी, तअस्सुब और मख़सूस बयानीये के तहत इस अंदाज़ में पेश किया जा रहा है कि असल मसला پس मंज़र में चला जाता है और फ़ितना नुमायाँ हो जाता है। हिजाब, नकाब और बुर्का भी इन्ही मौजूआत में शामिल हो चुके हैं।
न्यूज़ चैनल्स पर होने वाली तवील बहसें बाज़ाहिर समाजी इस्लाह के नाम पर होती हैं, मगर हकीकत में अक्सर इस्लाम और मुसलमानों के तर्ज़-ए-ज़िन्दगी को मश्कूक, मुतनाज़े और पसमांदा साबित करने की कोशिश महसूस होती है। ऐसे माहौल में ज़रूरी है कि इस मसले को जज़बात के बजाए कुरान, अक्ल, इंसाफ और आईन की रोशनी में देखा जाए।
इस्लाम में परदे का तसव्वुर महज़ एक लिबास तक महदूद नहीं बल्कि यह हया, वक़ार और अखलाकी नज़्म का हिस्सा है।
हिजाब एक वसीअ इस्तलाह है जिस में सर ढाँपना, ज़ीनत में एतदाल और निगाहों की हिफाज़त शामिल है।
नकाब चेहरे का पर्दा है जिस में सिर्फ आँखें ज़ाहिर रहती हैं।
बुर्का मुकम्मल जिस्म को ढाँपने वाला लिबास है, जो हिजाब की एक सूरत है, मगर हिजाब सिर्फ बुर्का ही का नाम नहीं।
कुरान-ए-मजीद में लफ्ज़ बुर्का नहीं आया, मगर परदे का हुक्म पूरी वज़ाहत के साथ मौजूद है, जैसा कि सूरह अल-अहज़ाब (59. 33) और सूरह अन-नूर (31) में बयान किया गया है, जहाँ परदे को इज्ज़त, शिनाख्त और तहफ्फुज़ से जोड़ा गया है।
इस्लाम, आईन और शख़्सी इख़्तियार
इस्लाम ने परदे का हुक्म ज़रूर दिया है, मगर जबर का उसलूब इख़्तियार नहीं किया। इसी तरह भारत जैसे जम्हूरियत मुल्क का आईन भी हर शहरी को मज़हबी आज़ादी, शख़्सी इख़्तियार और मसावी मवाके की ज़मानत देता है।
यह پس मंज़र ज़ेहन में रख कर अगर मौजूदा बहस को देखा जाए तो असल मसला लिबास नहीं बल्कि लिबास को हदफ बना कर ज़ेहन साज़ी है।
हमारे मुल्क भारत में यह एक मुसल्लमा हकीकत है कि औरतें मुख्तलिफ तर्ज़-ए-लिबास इख़्तियार करती हैं, और यही तनव्वुअ मुसलमानों के अंदर भी मौजूद है। कुछ मुसलमान ख़वातीन हिजाब या बुर्का पहनती हैं और कुछ नहीं - यह सरासर उनका ज़ाती, मज़हबी और आईनी हक़ है। किसी एक तर्ज़-ए-लिबास को तरक्की या पसमांदगी का पैमाना बनाना न अक्ल का तकाज़ा है और न जम्हूरियत इकदार का।
इसी तरह अगर कोई दुकानदार अपनी दुकान की हिफाज़त के लिए कुछ उसूल तय करता है तो यह उस का कारोबारी इख़्तियार है। जो ख़वातीन या अफराद इन उसूलों से मुताबिक़त रखते होंगे वो वहाँ जाएंगे, और जो नहीं रखते वो किसी दूसरी दुकान का इंतखाब करेंगे। यह फैसला दोनों तरफ से आज़ादाना होना चाहिए, न कि दबाओ, तंज़ या नफरत के माहौल में।
मगर यह कहना कि. अगर तरक्की करनी है तो हिजाब या बुर्का उतारना ही पड़ेगा” न सिर्फ औरत की आज़ादी पर हमला है बल्कि उस के वक़ार और खुदमुख्तारी की नफी भी है। सवाल यह है कि आप किस इख़्तियार से किसी औरत के लिबास को उस की काबिलियत, ज़हानत या तरक्की से जोड़ रहे हैं? और आप को यह हक़ किस ने दिया कि आप अपनी पसंद और सोच दूसरों पर मुसल्लत करें؟
अगर कोई शख्स खुद को जदीद, तरक्की याफ्ता या माडर्न समझता है, तो उसे चाहिए कि वो सब से पहले दूसरों के इंतखाब का एहतराम सीखे। किसी औरत को उस के लिबास की बुनियाद पर ताना देना, उसे कमतर साबित करने की कोशिश करना या हरासाँ करना, दरहकीकत जम्हूरियत और आज़ादी-ए-इज़हार की रूह के खिलाफ है।
जब हर शहरी को अपनी मर्ज़ी के मुताबिक जीने का हक़ हासिल है, तो फिर हिजाब या बुर्का पहनने वाली औरत इस आज़ादी से क्यों महरूम समझी जाए؟ वो भी इसी मुल्क की शहरी है, इसी आईन के तहत जीती है, और इसी कानून की पाबंद है। वो हर वो तालीम, ओहदा और तरक्की हासिल करने की अहल है जिस का वो ख्वाब देखती है. बशर्ते कि वो मुल्की क़वानीन की पासदारी करे, जो हर शहरी पर यकसाँ तौर पर लागू होते हैं।
जुर्म, पर्दा और इज्तिमाई बदनामि
अगर किसी फर्द ने बुर्का या नकाब को जुर्म के लिए इस्तेमाल किया, तो वो जुर्म यकीनन काबिले मज़म्मत है और मुजरिम को कानून के मुताबिक सज़ा मिलनी चाहिए। मगर चंद अफराद के अमल को बुनियाद बना कर पूरे इस्लाम, परदे और मुसलमान औरत को मश्कूक ठहराना न इंसाफ है और न दियानत।
जुर्म का ताल्लुक लिबास से नहीं बल्कि नीयत और अमल से होता है, और कानून भी फर्द के अमल को देखता है, उस के लिबास को नहीं।
हिजाब, नकाब और बुर्का को बार बार तरक्की के खिलाफ अलामत बना कर पेश करना दरअसल एक फिक्री दबाओ है, जिस का मक़सद औरत को उस की शिनाख्त से काटना है।
यह बयानिया न इस्लामी तालीमात से मुताबिक़त रखता है, न आईनी इकदार से, और न ही हकीकी तरक्की के तसव्वुर से।
हिजाब, नकाब और बुर्का कोई फैशन नहीं, न ही किसी पर थोपने का आला हैं। यह ईमान, सकाफत, वक़ार और शख़्सी आज़ादी का इज़हार हैं।
कुरान ने परदे का हुक्म दिया, आईन ने मज़हबी आज़ादी दी, और अक्ल ने इंसाफ का तकाज़ा रखा है।
असल मसला लिबास नहीं, तअस्सुब है।
असल खतरा पर्दा नहीं, दोगला मेयार है।
अगर वाकई हम एक मुहैज़्ज़ब, जम्हूरियत और इंसाफ पसंद मुआशरा चाहते हैं तो हमें:
जुर्म को जुर्म रहने देना होगा
लिबास को लिबास
और इंसान को उस की आज़ादी के साथ जीने देना होगा
यही इंसाफ है،
यही आईन का तकाज़ा है،
और यही पायदार समाजी हम आहंगी की बुनियाद।
   बकलम महमूदुलबारी
Mahmoodulbari342@gmail.com

बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम। 
हिजाब, नकाब और बुर्का: कुरानी अहकाम, आईनी आज़ादी और मीडिया डिबेट की हकीकत
               मज़मून (72)

अस्र-ए-हाज़िर में बाज़ मौजूआत को दानिस्ता तौर पर सनसनी, तअस्सुब और मख़सूस बयानीये के तहत इस अंदाज़ में पेश किया जा रहा है कि असल मसला पृष्ठभूमि में चला जाता है और फ़ितना नुमायाँ हो जाता है। हिजाब, नकाब और बुर्का भी इन्ही मौजूआत में शामिल हो चुके हैं।
न्यूज़ चैनल्स पर होने वाली तवील बहसें बाज़ाहिर समाजी इस्लाह के नाम पर होती हैं, मगर हकीकत में अक्सर इस्लाम और मुसलमानों के तर्ज़-ए-ज़िन्दगी को मश्कूक, मुतनाज़े और पसमांदा साबित करने की कोशिश महसूस होती है। ऐसे माहौल में ज़रूरी है कि इस मसले को जज़बात के बजाए कुरान, अक्ल, इंसाफ और आईन की रोशनी में देखा जाए।
इस्लाम में परदे का तसव्वुर महज़ एक लिबास तक महदूद नहीं बल्कि यह हया, वक़ार और अखलाकी नज़्म का हिस्सा है।
हिजाब एक वसीअ इस्तलाह है जिस में सर ढाँपना, ज़ीनत में एतदाल और निगाहों की हिफाज़त शामिल है।
नकाब चेहरे का पर्दा है जिस में सिर्फ आँखें ज़ाहिर रहती हैं।
बुर्का मुकम्मल जिस्म को ढाँपने वाला लिबास है, जो हिजाब की एक सूरत है, मगर हिजाब सिर्फ बुर्का ही का नाम नहीं।
कुरान-ए-मजीद में लफ्ज़ बुर्का नहीं आया, मगर परदे का हुक्म पूरी वज़ाहत के साथ मौजूद है, जैसा कि सूरह अल-अहज़ाब (59. 33) और सूरह अन-नूर (31) में बयान किया गया है, जहाँ परदे को इज्ज़त, शिनाख्त और तहफ्फुज़ से जोड़ा गया है।
इस्लाम, आईन और शख़्सी इख़्तियार
इस्लाम ने परदे का हुक्म ज़रूर दिया है, मगर जबर का उसलूब इख़्तियार नहीं किया। इसी तरह भारत जैसे जम्हूरियत मुल्क का आईन भी हर शहरी को मज़हबी आज़ादी, शख़्सी इख़्तियार और मसावी मवाके की ज़मानत देता है।
यह पृष्ठभूमि ज़ेहन में रख कर अगर मौजूदा बहस को देखा जाए तो असल मसला लिबास नहीं बल्कि लिबास को हदफ बना कर ज़ेहन साज़ी है।
हमारे मुल्क भारत में यह एक मुसल्लमा हकीकत है कि औरतें मुख्तलिफ तर्ज़-ए-लिबास इख़्तियार करती हैं, और यही तनव्वुअ मुसलमानों के अंदर भी मौजूद है। कुछ मुसलमान ख़वातीन हिजाब या बुर्का पहनती हैं और कुछ नहीं - यह सरासर उनका ज़ाती, मज़हबी और आईनी हक़ है। किसी एक तर्ज़-ए-लिबास को तरक्की या पसमांदगी का पैमाना बनाना न अक्ल का तकाज़ा है और न जम्हूरियत इकदार का।
इसी तरह अगर कोई दुकानदार अपनी दुकान की हिफाज़त के लिए कुछ उसूल तय करता है तो यह उस का कारोबारी इख़्तियार है। जो ख़वातीन या अफराद इन उसूलों से मुताबिक़त रखते होंगे वो वहाँ जाएंगे, और जो नहीं रखते वो किसी दूसरी दुकान का इंतखाब करेंगे। यह फैसला दोनों तरफ से आज़ादाना होना चाहिए, न कि दबाओ, तंज़ या नफरत के माहौल में।
मगर यह कहना कि. अगर तरक्की करनी है तो हिजाब या बुर्का उतारना ही पड़ेगा” न सिर्फ औरत की आज़ादी पर हमला है बल्कि उस के वक़ार और खुदमुख्तारी की नफी भी है। सवाल यह है कि आप किस इख़्तियार से किसी औरत के लिबास को उस की काबिलियत, ज़हानत या तरक्की से जोड़ रहे हैं? और आप को यह हक़ किस ने दिया कि आप अपनी पसंद और सोच दूसरों पर मुसल्लत करें؟
अगर कोई शख्स खुद को जदीद, तरक्की याफ्ता या माडर्न समझता है, तो उसे चाहिए कि वो सब से पहले दूसरों के इंतखाब का एहतराम सीखे। किसी औरत को उस के लिबास की बुनियाद पर ताना देना, उसे कमतर साबित करने की कोशिश करना या हरासाँ करना, दरहकीकत जम्हूरियत और आज़ादी-ए-इज़हार की रूह के खिलाफ है।
जब हर शहरी को अपनी मर्ज़ी के मुताबिक जीने का हक़ हासिल है, तो फिर हिजाब या बुर्का पहनने वाली औरत इस आज़ादी से क्यों महरूम समझी जाए؟ वो भी इसी मुल्क की शहरी है, इसी आईन के तहत जीती है, और इसी कानून की पाबंद है। वो हर वो तालीम, ओहदा और तरक्की हासिल करने की अहल है जिस का वो ख्वाब देखती है. बशर्ते कि वो मुल्की क़वानीन की पासदारी करे, जो हर शहरी पर यकसाँ तौर पर लागू होते हैं।
जुर्म, पर्दा और इज्तिमाई बदनामि
अगर किसी फर्द ने बुर्का या नकाब को जुर्म के लिए इस्तेमाल किया, तो वो जुर्म यकीनन काबिले मज़म्मत है और मुजरिम को कानून के मुताबिक सज़ा मिलनी चाहिए। मगर चंद अफराद के अमल को बुनियाद बना कर पूरे इस्लाम, परदे और मुसलमान औरत को मश्कूक ठहराना न इंसाफ है और न दियानत।
जुर्म का ताल्लुक लिबास से नहीं बल्कि नीयत और अमल से होता है, और कानून भी फर्द के अमल को देखता है, उस के लिबास को नहीं।
हिजाब, नकाब और बुर्का को बार बार तरक्की के खिलाफ अलामत बना कर पेश करना दरअसल एक फिक्री दबाओ है, जिस का मक़सद औरत को उस की शिनाख्त से काटना है।
यह बयानिया न इस्लामी तालीमात से मुताबिक़त रखता है, न आईनी इकदार से, और न ही हकीकी तरक्की के तसव्वुर से।
हिजाब, नकाब और बुर्का कोई फैशन नहीं, न ही किसी पर थोपने का आला हैं। यह ईमान, सकाफत, वक़ार और शख़्सी आज़ादी का इज़हार हैं।
कुरान ने परदे का हुक्म दिया, आईन ने मज़हबी आज़ादी दी, और अक्ल ने इंसाफ का तकाज़ा रखा है।
असल मसला लिबास नहीं, तअस्सुब है।
असल खतरा पर्दा नहीं, दोगला मेयार है।
अगर वाकई हम एक मुहैज़्ज़ब, जम्हूरियत और इंसाफ पसंद मुआशरा चाहते हैं तो हमें:
जुर्म को जुर्म रहने देना होगा
लिबास को लिबास
और इंसान को उस की आज़ादी के साथ जीने देना होगा
यही इंसाफ है،
यही आईन का तकाज़ा है،
और यही पायदार समाजी हम आहंगी की बुनियाद।
   बकलम महमूदुलबारी
Mahmoodulbari342@gmail.com