*मिराज के मुताल्लिक़ अक़ीदए अहले सुन्नत*
                    (क़िस्त अव्वल)

*वाक़िया मिराज कब हुआ*
मिराज की तारीख़, दिन और महीना में बहुत ज़्यादा इख़्तिलाफ़ात हैं, लेकिन इतनी बात पर बिला इख़्तिलाफ़ सब का इत्तेफ़ाक़ है कि मिराज नुज़ूल-ए-वही के बाद और हिजरत से पहले का वाक़िया है जो मक्का मुअज़्ज़मा में पेश आया और इब्न-ए-क़ुतैबा दीनवरी (अल-मुतवफ़्फ़ी २६७ हिजरी) और इब्न-ए-अब्दुल बर (अल-मुतवफ़्फ़ी ४६३ हिजरी) और इमाम राफ़ई व इमाम नववी ने तहरीर फ़रमाया कि वाक़िया मिराज रजब के महीने में हुआ, और मुहद्दिस अब्दुल ग़नी मुक़द्दसी ने रजब की सत्ताईसवीं भी मुतअय्यन कर दी है और अल्लामा ज़रक़ानी ने तहरीर फ़रमाया है कि लोगों का इसी पर अमल है और बा'ज़ मुअर्रिख़ीन की राय है कि यही सब से ज़्यादा क़वी रिवायत है।
*(ज़रक़ानी जिल्द १ सफ़्हा ३५५ ता सफ़्हा ३५८)(अल-मवाहिब अल-लद्दुनिया व शरह अल-ज़रक़ानी बाब वक़्त अल-इसरा, जिल्द २, सफ़्हा ७०, ७१ मुल्तक़तन)*
हकीमुल उम्मत मुफ़्ती अहमद यार ख़ान नईमी रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते हैं बैतुलल्लाह शरीफ़ से बैतुल मुक़द्दस तक की जिस्मानी मिराज क़तई यक़ीनी है, इसका इंकार कुफ़्र है, बैतुल मुक़द्दस से आसमान बल्कि ला-मकान तक की मिराज का अगर इस लिए इंकार करता है कि आसमान के फटने को नामुमकिन मानता है तो भी काफ़िर है कि इस में आयात-ए-क़ुरआनिया का इंकार है वरना गुमराह है, मज़ीद लिखते हैं कि आयत-ए-करीमा *सुब्हानल्लज़ी से बारकना हौलहु* तक बैतुल मुक़द्दस तक की मिराज का ज़िक्र है और *लिनुरियहु मिन आयातिना* में आसमानी मिराज का ज़िक्र है और *इन्नहु हुवस् समीउल बसीर* में ला-मकाानी मिराज का ज़िक्र है। (मिरातुल मनाजीह, 8/135)
मुफ़्ती अहमद यार ख़ान नईमी रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते हैं: जिस्मानी मिराज नबुवत के ग्यारहवीं साल यानी हिजरत से दो साल पहले अपनी (चचा ज़ाद) हमशीरा उम्मे हानी के घर से सत्ताईसवीं रजब दोशंबा की शब को हुई। (मवाहिब लद्दुनिया मा ज़रक़ानी, 2/70, 71, मिरातुल मनाजीह, 8/135)

*उम्मे हानी के घर से मस्जिद हराम तक*
मिराज की इब्तिदा कहां से हुई? इस बारे में शारह-ए-बुख़ारी अल्लामा महमूद ऐनी हनफ़ी रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते हैं कि नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु अलैहि व आलिही वसल्लम हज़रत उम्मे हानी रज़ियल्लाहु अन्हा के घर पर आराम फ़रमा रहे थे जो शो'ब-ए-अबी तालिब के पास था, घर की छत खुल गई, फ़रिश्ता अंदर दाख़िल हुआ और आप सल्लल्लाहु अलैहि व आलिही वसल्लम को घर से उठाकर मस्जिद हराम लाए जबकि आप पर ऊंघ का असर था। (उमदतुल कारी, 11/600, तहत अल-हदीस:3887)

*शक़-ए-सद्र और बुराक़ पर सवारी*
अल्लाह के हबीब सल्लल्लाहु अलैहि व आलिही वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया: मैं हतीम में आराम कर रहा था कि अचानक एक आने वाला मेरे पास आया और मेरी हंसली की हड्डी से ले कर पेट के नीचे तक का हिस्सा चाक किया, मेरा दिल निकाला, फिर सोने का एक तश्त लाया गया, इस में मेरा दिल ज़मज़म से धोया गया, फिर उसे हिकमत से भरा गया, फिर उसे दोबारा इस की जगह रखा गया, फिर मेरे पास सफ़ेद रंग का एक जानवर लाया गया जो खच्चर से छोटा और गधे से बड़ा था मैं इस पर सवार हुआ। (*बुख़ारी,2/584,हदीस:3887,मुस्लिम,स87, हदीस: 411माख़ूज़न*)
उतर कर नमाज़ पढ़ी, फिर अर्ज़ किया जिब्राईल ने मालूम है कि आप ने किस जगह नमाज़ पढ़ी है? (कहने लगे) आप ने तैयबा (यानी मदीना पाक) में नमाज़ पढ़ी है, इसी की तरफ़ आप की हिजरत होगी, फिर एक और मक़ाम पर अर्ज़ किया कि उतर कर नमाज़ पढ़ लीजिये, मैं ने उतर कर नमाज़ पढ़ ली, जिब्रील अलैहिस्सलाम ने अर्ज़ किया: मालूम है कि आप ने कहां नमाज़ पढ़ी है? (फिर कहने लगे) आप ने तूर-ए-सीना पर नमाज़ पढ़ी है जहां अल्लाह पाक ने हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम को हम कलामी का शरफ़ अता फ़रमाया था, फिर एक और जगह अर्ज़ की कि उतर कर नमाज़ पढ़ लीजिये, मैं ने उतर कर नमाज़ पढ़ी, जिब्रील ने अर्ज़ किया: मालूम है कि आप ने कहां नमाज़ पढ़ी है? (फिर कहने लगे) आप ने बैत-ए-लहम में नमाज़ पढ़ी है जहां हज़रत-ए-ईसा अलैहिस्सलाम की विलादत हुई थी। (नसाई, स81, हदीस:448)

*दौरान-ए-सफ़र के चंद मुशाहिदात*
आप सल्लल्लाहु अलैहि व आलिही वसल्लम ने बैतुल मुक़द्दस की तरफ़ जाते हुए रास्ते के किनारे एक बूढ़ी औरत देखी, हज़रत-ए-जिब्राईल से दरयाफ़्त फ़रमाया: यह कौन है? अर्ज़ किया: हुज़ूर! बढ़े चलिए, आप सल्लल्लाहु अलैहि व आलिही वसल्लम आगे बढ़ गए, फिर किसी ने आप को पुकार कर कहा: हलुम्मा या मुहम्मद यानी ऐ मुहम्मद! इधर आईये, हज़रत-ए-जिब्राईल ने फिर वही अर्ज़ किया कि हुज़ूर! बढ़े चलिए, आप सल्लल्लाहु अलैहि व आलिही वसल्लम आगे बढ़ गए, फिर एक जमाअत पर गुज़र हुआ, उन्होंने आप को सलाम अर्ज़ करते हुए कहा: अस्सलामु अलैका या अव्वलु, अस्सलामु अलैका या आख़िरु, अस्सलामु अलैका या हाशिरु यानी ऐ अव्वल! आप पर सलामती हो, ऐ आख़िर! आप पर सलामती हो, ऐ हाशिर! आप पर सलामती हो, हज़रत-ए-जिब्राईल अलैहिस्सलाम ने अर्ज़ किया: हुज़ूर! इन के सलाम का जवाब मरहमत फ़रमाईये, आप सल्लल्लाहु अलैहि व आलिही वसल्लम ने सलाम का जवाब इरशाद फ़रमाया, इस के बाद मुसलसल दो जमाअतों पर गुज़र हुआ तो वहां भी ऐसा ही हुआ। (दलाइल अल-नबुव्वह लिल-बैहक़ी, 2/362)

*बैतुल मुक़द्दस आमद*
एक रिवायत में है कि हुज़ूर-ए-अनवर सल्लल्लाहु अलैहि व आलिही वसल्लम बैतुल मुक़द्दस में बाब-ए-ईमानी से दाख़िल हुए फिर मस्जिद के पास आए और वहां अपनी सवारी बांध दी। (सीरत हलबिया, 1/523) आप सल्लल्लाहु अलैहि व आलिही वसल्लम इरशाद फ़रमाते हैं: मैं ने बुराक़ को उसी हलक़े में बांधा जहां अंबिया-ए-किराम अपनी सवारियां बांधा करते थे, फिर मस्जिद में दाख़िल हुआ और दो रकातें पढ़ीं, फिर बाहर निकला तो बुख़ारी शरीफ़ की रिवायत के मुताबीक़ यहां आप के पास दूध और शराब के दो प्याले लाए गए, आप ने इन्हें मुलाहिज़ा फ़रमाया फिर दूध का प्याला क़बूल फ़रमा लिया, इस पर हज़रत जिब्राईल अलैहिस्सलाम कहने लगे : अल्हम्दुलिल्लाहिल्लज़ी हदाका लिल्फ़ितरति लौ अख़ज़्तल ख़म्र ग़वत उम्मतुका यानी तमाम तारीफ़ें अल्लाह अज़्ज़ व जल्ल के लिए जिस ने आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि व आलिही वसल्लम की फ़ितरत की जानिब रहनुमाई फ़रमाई, अगर आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि व आलिही वसल्लम शराब का प्याला क़बूल फ़रमाते तो आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि व आलिही वसल्लम की उम्मत गुमराह हो जाती। (सहीह अल-बुख़ारी, स११८१, अल-हदीस : ४७०९)

*मुशाहिदात की तफ़सील*
आप सल्लल्लाहु अलैहि व आलिही वसल्लम के बैतुल मुक़द्दस पहुंचने के बाद हज़रत-ए-जिब्राईल ने अर्ज़ किया: वह बुढ़िया जिसे आप ने रास्ते के किनारे मुलाहिज़ा फ़रमाया था, वह दुनिया थी, इस की सिर्फ़ इतनी उम्र बाक़ी रह गई है जितनी इस बुढ़िया की है, जिस ने आप को अपनी तरफ़ माइल करना चाहा था वह अल्लाह का दुश्मन इब्लीस था, चाहता था कि आप इस की तरफ़ माइल हो जाएं, जिन्होंने आप को सलाम अर्ज़ किया था वह हज़रत-ए-इब्राहिम, हज़रत-ए-मूसा और हज़रत-ए-ईसा अलैहिमुस्सलाम थे। (दलाइल अल-नबुव्वह लिल-बैहक़ी,2/ 362)

*अंबिया-ए-किराम की इमामत*
यह सफ़र करते करते हमारे प्यारे आक़ा सल्लल्लाहु अलैहि व आलिही वसल्लम बैतुल मुक़द्दस तशरीफ़ लाए जहां मस्जिद-ए-अक़्सा में अंबिया-ए-किराम की इमामत फ़रमाई, चुनांचे आप सल्लल्लाहु अलैहि व आलिही वसल्लम फ़रमाते हैं कि जब मैं बैतुल मुक़द्दस में आया तो अंबिया-ए-किराम जमा थे, हज़रत जिब्राईल अलैहिस्सलाम ने मुझे आगे किया तो मैं ने उन की इमामत की। (नसाई, स81, हदीस:448)

*अंबिया-ए-किराम के ख़ुतबे*
मस्जिद-ए-अक़्सा में नमाज़ के बाद बा'ज़ अंबिया-ए-किराम अलैहिमुस्सलाम ने ख़ुतबे दीये, सब से पहले अल्लाह के ख़लील हज़रत सय्यदना इब्राहिम अलैहिस्सलाम ने कहा: तमाम तारीफ़ें अल्लाह के लिए जिस ने मुझे ख़लील बनाया, अज़ीम बादशाहत अता फ़रमाई, इमाम और अपना फ़रमांबरदार बंदा बनाया, मेरी इक़्तिदा व पैरवी की जाती है, मुझे आग से नजात अता फ़रमाई और उसे मुझ पर ठंडी और सलामती वाली कर दिया।

इन के बाद हज़रत सय्यदना मूसा अलैहिस्सलाम कहने लगे: तमाम तारीफ़ें अल्लाह के लिए जिस ने मुझ से कलाम फ़रमाया, मुझे अपनी रिसालत और कलिमात के लिए मुंतख़ब फ़रमाया, मुझे राज़ कहने को क़रीब किया, मुझ पर तौरात नाज़िल फ़रमाई, मेरे हाथ पर फ़िरऔन को हलाक फ़रमाया और मेरे ही हाथ पर बनी इस्राईल को नजात अता फ़रमाई।

इन के बाद हज़रत-ए-सय्यदना दाऊद अलैहिस्सलाम ने कहा: तमाम तारीफ़ें अल्लाह के लिए जिस ने मुझे बादशाहत अता फ़रमाई, मुझ पर ज़बूर नाज़िल फ़रमाई, लोहे को मेरे लिए नरम फ़रमा दिया, मेरे लिए परिंदों और पहाड़ों को मुसख़्ख़र फ़रमा दिया, मुझे हिकमत और फ़स्ल-ए-ख़िताब अता फ़रमाया।

इन के बाद हज़रत सय्यदना सुलैमान अलैहिस्सलाम कहने लगे: तमाम तारीफ़ें अल्लाह के लिए जिस ने मेरे लिए हवाओं, जिन्नों और इंसानों को मुसख़्ख़र फ़रमा दिया, शयातीन को भी मुसख़्ख़र फ़रमा दिया और अब यह वह काम करते हैं जो मैं उन से चाहता हूं मसलन बुलंद व बाला मकानात तामीर करना और तस्वीरें बनाना, मुझे परिंदों की बोली और हर चीज़ सिखाई, मेरे लिए पिघले हुए तांबे का चश्मा बहाया और मुझे ऐसी बादशाहत अता फ़रमाई जो मेरे बाद किसी के लिए नहीं।

इन के बाद हज़रत सय्यदना ईसा अलैहिस्सलाम ने कहा: तमाम तारीफ़ें अल्लाह के लिए जिस ने मुझे तौरात और इंजील सिखाई, मुझे पैदाइशी अंधे और कोढ़ के मर्ज़ वाले को तंदुरुस्त करने वाला और अपने इज़्न से मुर्दों को ज़िंदा करने वाला बनाया, मुझे आसमान पर उठाया, मुझे काफ़िरों से पाक किया, मुझे और मेरी मां को शैतान मरदूद से पनाह अता फ़रमाई जिस की वजह से उसे मेरी मां पर कोई राह नहीं।

इन सब हज़रात के बाद अल्लाह के हबीब, इमाम अल-अंबिया, साहिब-ए-मिराज सल्लल्लाहु अलैहि व आलिही वसल्लम ने ख़ुतबा दिया, ख़ुतबे से पहले आप ने अंबिया-ए-किराम से फ़रमाया कि तुम सब ने अपने रब्ब की सना बयान की है, अब मैं रब्ब की तारीफ़ व सना बयान करता हूं, फिर आप ने इस तरह ख़ुतबा पढ़ा: तमाम तारीफ़ें अल्लाह के लिए जिस ने मुझे तमाम जहानों के लिए रहमत और तमाम इंसानों के लिए ख़ुश ख़बरी सुनाने वाला और डर सुनाने वाला बना कर भेजा, मुझ पर हक़ व बातिल में फ़र्क़ करने वाली किताब को नाज़िल फ़रमाया जिस में हर शय का रौशन बयान है, मेरी उम्मत को लोगों में ज़ाहिर होने वाली सब उम्मतों में बेहतरीन उम्मत बनाया, दरमियानी उम्मत बनाया और उन्हें अव्वल भी बनाया और आख़िर भी, मेरे लिए मेरा सीना कुशादा फ़रमाया, मुझ से बोझ को दूर फ़रमाया, मेरे ज़िक्र को बुलंद फ़रमाया और मुझे फ़ातिह और ख़ातिम बनाया, यह सुन कर हज़रत-ए-सय्यदना इब्राहिम अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया: बिहाज़ा फ़ज़लकुम मुहम्मदुन यानी इसी वजह से मुहम्मद ने तुम पर फ़ज़ीलत पाई। (दलाइल अल-नबुव्वह लिल-बैहक़ी, 2/ 400, 401)

*आसमानों की तरफ़ सफ़र*
यहां मस्जिद-ए-अक़्सा तक के मामलात मुकम्मल हुए, अब आसमानों का सफ़र शुरू हुआ, चुनांचे नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु अलैहि व आलिही वसल्लम इरशाद फ़रमाते हैं: फिर मुझे सवारी पर सवार किया गया, जिब्राईल अलैहिस्सलाम मुझे ले कर चले हत्ता कि वह दुनिया के आसमान पर पहुंचे तो दरवाज़ा खुलवाया, पूछा गया: कौन? फ़रमाया: जिब्रील, पूछा गया: तुम्हारे साथ कौन है, फ़रमाया: हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व आलिही वसल्लम हैं, पूछा गया: क्या इन्हें बुलाया गया है? फ़रमाया: हां, तो कहा गया: मरहबन बिही फ़निअमल मजीउ जाअ (यानी इन को ख़ुश आमदीद हो वह खूब आए) फिर दरवाज़ा खोला गया, जब मैं दाख़िल हुआ तो वहां हज़रत आदम अलैहिस्सलाम थे, जिब्राईल ने कहा: यह आप के वालिद आदम अलैहिस्सलाम हैं इन्हें सलाम करो, मैं ने उन्हें सलाम किया उन्होंने जवाब दिया, फिर फ़रमाया: मरहबन बिल इब्निस सालेहि वन्नबिय्यिस सालेह (यानी सालेह फ़र्ज़ंद, सालेह नबी तुम खूब तशरीफ़ लाए), आप ने मुझे ख़ुश आमदीद कहा और दुआ-ए-ख़ैर फ़रमाई।


*सिदरतुल मुंतहा*
आसमानों के बाद मज़ीद क़ुर्ब-ए-ख़ास की तरफ़ सफ़र का आग़ाज़ हुआ, इस बारे में प्यारे आक़ा सल्लल्लाहु अलैहि व आलिही वसल्लम इरशाद फ़रमाते हैं: फिर मैं सिदरतुल मुंतहा तक उठाया गया। (सिदरतुल मुंतहा बेरी का एक नूरानी दरख़्त है) इस के फल मटकों की तरह और पत्ते हाथी के कानों की तरह थे, जब इसे अल्लाह का कोई हुक्म पहुंचता है तो मुतग़य्यिर हो जाता है, अल्लाह की मख़लूक़ में ऐसा एक भी नहीं जो इस के हुस्न की तारीफ़ कर सके, तो अल्लाह ने मुझ पर वही फ़रमाई जो वही फ़रमाई, जिब्राईल अलैहिस्सलाम ने कहा: यह सिदरतुल मुंतहा है, वहां चार नहरें थीं: दो नहरें ख़िफ़िया थीं और दो नहरें ज़ाहिर, मैं ने: पूछा ऐ जिब्राईल! यह क्या है? अर्ज़ किया कि ख़िफ़िया नहरें जन्नत की दो नहरें हैं और ज़ाहिरी नहरें वह नील और फ़ुरात हैं, फिर मेरे सामने बैतुल मामूर लाया गया, इस के बाद मेरे पास एक बर्तन शराब का, एक बर्तन दूध का और एक बर्तन शहद का लाया गया, मैं ने दूध का प्याला लिया तो जिब्राईल अलैहिस्सलाम ने कहा: यह फ़ितरत है, इसी पर आप और आप की उम्मत होगी। (बुख़ारी, 2/584, हदीस:3887, मुस्लिम,स87, हदीस:411)

*मक़ाम-ए-इस्तवा*
नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु अलैहि व आलिही वसल्लम आसमानों और सिदरतुल मुंतहा के बाद सफ़र जारी रखते हुए एक मक़ाम पर पहुंचे जिसे मुस्तवी कहा जाता है, वहां आप ने क़लमों के चलने की आवाज़ें सुनीं, इस के बाद आप बुराक़ पर सवार हुए तो उस हिजाब के पास आए जो अल्लाह करीम के क़ुर्ब-ए-ख़ास में है, अचानक इस हिजाब से एक फ़रिश्ता निकला, रसूल-ए-करीम सल्लल्लाहु अलैहि व आलिही वसल्लम ने हज़रत जिब्राईल से फ़रमाया: यह कौन है? हज़रत जिब्राईल ने अर्ज़ किया: इस ज़ात की क़सम जिस ने आप को हक़ से साथ मबऊस फ़रमाया, बतौरे मकान के मैं तमाम मख़लूक़ में सब से ज़्यादा क़रीब हूं लेकिन इस फ़रिश्ता को मैं ने अपनी तख़लीक़ से ले कर अब तक देखा नहीं था। (तारीख़ अल-ख़मीस, 1/311) यूं आप सल्लल्लाहु अलैहि व आलिही वसल्लम (सफ़र को जारी रखते हुए) एक मक़ाम से दूसरे मक़ाम तक, एक हिजाब से दूसरे हिजाब तक गए, हत्ता कि एक ऐसे मक़ाम पर पहुंचे जहां हज़रत जिब्राईल रुक गए, आप सल्लल्लाहु अलैहि व आलिही वसल्लम ने फ़रमाया: ऐ जिब्राईल! मुझ से अलग न हो, अर्ज़ किया: ऐ मेरे आक़ा! हमारी रसाई बस एक मालूम मक़ाम तक है, मैं अगर एक बाल बराबर भी आगे जाऊंगा तो जल जाऊंगा, इस रात तो मैं आप के एहतराम की वजह से यहां तक पहुंचा हूं वरना मेरा आख़िरी ठिकाना सिदरतुल मुंतहा है। (तारीख़ अल-ख़मीस, 1/311)

*हज़रत जिब्राईल की इंतिहा*
हज़रत जिब्राईल सल्लल्लाहु अलैहि व आलिही वसल्लम ने खुद ही फ़रमाया था कि मेरा आख़िरी ठिकाना सिदरतुल मुंतहा है, लेकिन शब-ए-मिराज नबी-ए-पाक सल्लल्लाहु अलैहि व आलिही वसल्लम के सदक़े इन्हें सिदरतुल मुंतहा से आगे जाने की इजाज़त मिल गई, हज़रत जिब्राईल के रुकने के बाद अब नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु अलैहि व आलिही वसल्लम अकेले चले, आप अंधेरे वाले हिजाबात से गुज़रते गए हत्ता कि सत्तर हज़ार (70000) ऐसे मोटे हिजाबात से भी तजावुज़ कर गए जिन में से हर एक की तवालत पांच सौ (500) साल के बराबर थी, और हर हिजाब के दरमियान पांच सौ साल का फ़ासला था, तो एक मक़ाम पर बुराक़ रुक गया, वहां आप सल्लल्लाहु अलैहि व आलिही वसल्लम ने रफ़रफ़ नामी एक सब्ज़ ख़ेमा मुलाहिज़ा फ़रमाया जिस की रौशनी सूरज की रौशनी से भी ज़्यादा थी, आप इस ख़ेमे पर चढ़े और इस के ज़रिये अर्श तक पहुंचे। (तारीख़ अल-ख़मीस, 1/311) इस के बाद आप सल्लल्लाहु अलैहि व आलिही वसल्लम मज़ीद क़ुर्ब-ए-ख़ास की तरफ़ बढ़े, आप से फ़रमाया गया, मेरे क़रीब हो जाईये, मेरे क़रीब हो जाईये हत्ता कि हज़ार मर्तबा फ़रमाया गया, आप सल्लल्लाहु अलैहि व आलिही वसल्लम हर बार पुकारे जाने पर तरक़्क़ी करते गए हत्ता कि दना के मक़ाम पर पहुंचे, फिर मज़ीद तरक़्क़ी करते गए तो फ़तदल्ली तक पहुंचे, फिर मज़ीद तरक़्क़ी करते गए हत्ता कि अपनी मंज़िल क़ाबा क़ौसैन औ अदना तक पहुंचे जैसा कि अल्लाह पाक ने क़ुरआन करीम में इरशाद फ़रमाया, फिर आप सल्लल्लाहु अलैहि व आलिही वसल्लम अपने रब्ब के क़रीब हुए, यह क़ुर्ब मक़ाम व मरतबे के एतबार से था न कि मकान के एतबार से, क्योंकि अल्लाह पाक मकान से पाक है (अब आप वहां पहुंचे जहां, न ज़मां था न मकां, न ऊपर था न नीचे, न शिमाल था न जुनूब, न मश्रिक़ था और न ही मग़रिब, यह सब न थे, बस ख़ुदा की ज़ात थी और इस के हबीब थे, जो क़ुरआन व हदीस में आया है इस पर हमारा ईमान, मज़ीद हमें सोचने और अक़्ल दौड़ाने की ज़रूरत नहीं) इस के बाद आप सल्लल्लाहु अलैहि व आलिही वसल्लम ने अल्लाह करीम को सजदा किया, क्योंकि इस मरतबे को आप ने अल्लाह तआला की फ़रमांबरदारी के ज़रिये हासिल किया, सजदे में ख़ास क़ुर्ब मिलता है जैसा कि नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु अलैहि व आलिही वसल्लम ने फ़रमाया कि अपने रब्ब के ज़्यादा क़रीब वह बंदा होता है जो सजदा करता है। (तारीख़ अल-ख़मीस, 1/311)

                   *✍️मुतअल्लिम अल-जामिअतुल अशरफ़िया✍️*