ईमानदारी का दामन न छोड़ो __!!



एक ताजिर अपनी मेहनत से कामयाब हुआ और एक बहुत बड़े इदारे का मालिक बन गया। जब वह बूढ़ा हो गया तो उस ने इदारे के डायरेक्टरों में से किसी को अपना काम सौंपने की दिलचस्प तरकीब निकाली। उस ने इदारे के तमाम डायरेक्टरों का इजलास तलब किया और कहा “मेरी सेहत मुझे ज्यादा देर तक अपनी जिम्मेदारियां निभाने की इजाजत नहीं देती इसलिए मैं आप में से एक को अपनी जिम्मेदारियां सौंपना चाहता हूं। मैं आप सब को एक एक बीज दूंगा। इसे बोने के एक साल बाद आप इस की सूरत-ए-हाल से मुत्तला करेंगे जिस की बुनियाद पर मैं अपनी जिम्मेदारियां सौंपने का फैसला करूंगा।

कुछ अरसा बाद सब डायरेक्टर अपने बीज से उगने वाले पौधों की तारीफें करने लगे सिवाए ज़ैद के जो परेशान था। वह खामोश रहता और अपनी खिफ़त को मिटाने के लिए मजीद मेहनत से दफ्तर का काम करता रहा। दरअसल ज़ैद ने नया गमला खरीद कर इस में नई मिट्टी डाल कर बेहतरीन खाद डाली थी और रोजाना पानी भी देता रहा था मगर इस के बीज में से पौधा न निकला।

एक साल बाद इदारे के सरबराह ने फिर सब डायरेक्टर्ज़ का इजलास बुलाया और कहा कि सब वह गमले ले कर आएं जिन में उन्होंने बीज बोया था। सब खूबसूरत पौधों वाले गमलों के साथ इजलास में पहुंचे मगर ज़ैद जिस का बीज उगा नहीं था वह खाली हाथ ही इजलास में शामिल हुआ और इदारे के सरबराह से दूर वाली कुर्सी पर बैठ गया। इजलास शुरू हुआ तो सब ने अपने बीज और पौधे के साथ की गई मेहनत का हाल सुनाया इस उम्मीद से कि उसे ही सरबराह बनाया जाए।

सब की तकरीरें सुनने के बाद सरबराह ने कहा एक आदमी कम लग रहा है। इस पर ज़ैद जो एक और डायरेक्टर के पीछे छुपा बैठा था खड़ा हो कर सर झुकाए बोला “जनाब। मुझ से जो कुछ हो सका मैं ने किया मगर मेरा वाला बीज नहीं उगा”। इस पर कुछ साथी हंसे और कुछ ने ज़ैद के साथ हमदर्दी का इज़हार किया।

चाय के बाद इदारे के सरबराह ने एलान किया कि इस के बाद ज़ैद इदारे का सरबराह होगा। इस पर कई हाजरीन मजलिस की हैरानी से चीख निकल गई। इदारे के सरबराह ने कहा “इस इदारे को मैं ने बहुत मेहनत और दीयानतदारी से इस मकाम पर पहुंचाया है और मेरे बाद भी ऐसा ही आदमी होना चाहिए और वह ज़ैद है जो मेहनती होने के साथ दीयानतदार भी है। मैं ने आप सब को उबले हुए बीज दिए थे जो उग नहीं सकते। सिवाए ज़ैद के आप सब ने बीज तबदील कर दिए”

ए बन्दे! मत भूल कि जब कोई नहीं देख रहा होता तो पैदा करने वाला देख रहा होता इसलिए दीयानत का दामन न छोड़ो..

ख़त्म शुद