रविवार की सुबह थी। सूरज पूरी आब-ओ-ताब के साथ रात के पर्दे से निकल रहा था। जैसे किसी नई चीज़ के होने की खबर दे रहा हो। परिंदों की चहचहाहट फ़िज़ा को खुशगवार बना रही थी... नन्ही कलियों को शबनम दिलकश अंदाज़ में वुज़ू करा रही थी। बुलबुल भी आज कुछ नया ही राग अलाप रही थी। कंगनवाल से मालेर कोटला तक का रास्ता कुछ इस तरह सजा हुआ था गोया कि मुद्दतों बाद उसे किसी के इस्तकबाल का मौका मिला हो। सुबुक ख़िराम बाद-ए-सबा दिल को फ़र्हत-ओ-इंबिसात से सरशार कर रही थी और परिंदे अपने आशियानों और घोंसलों से निकल कर दाने-दुनके चुगने के लिए आसमान पर परवाज़ कर रहे थे... इस बहिश्ती माहौल में मियांजी अपने 7 साल के लख़्त-ए-जिगर (वालिद मोहतरम) को साइकिल पर बिठा कर मदरसा छोड़ने जा रहे थे... मियांजी की आंखों में नमी उस दर्द को बयान कर रही थी जो हर एक बाप को उस वक़्त होता है जब उसकी मासूम औलाद उससे दूर हो रही होती है। लेकिन जब चेहरा इस लख़्त-ए-जिगर की तरफ होता तो यही नमी एक दिलआवेज़ तबस्सुम में बदल जाती थी... और नसीहतों का दौर शुरू हो जाता था...
मुसाफ़त कट रही थी___
ज्यों-ज्यों मंज़िल करीब आती जा रही थी मियां जी का दिल इस मासूम के फ़िराक़ में निढाल होता जा रहा था.. लेकिन ये सब था किस लिए? आखिर वो क्या चीज़ थी जिसने मियांजी को इतना झिंझोड़ कर रख दिया था? तो जवाब यही है कि अपनी और आने वाली नस्ल की फ़िक्र-ए-आखिरत!! यही वो फ़िक्र होती है कि जब किसी के अंदर ये जागती है तो उसको चारों तरफ़ कुदरत-ए-खुदावंदी के जलवे नज़र आते हैं। ये फ़िक्र एक ऐसी आग होती है जो अपने अलावा तमाम दुनियावी फ़िक्रों को खा जाती है... मियांजी के शाम-ओ-सहर इसी फ़िक्र में गुज़रने लगे थे। वो शख्स जो एक बच्चे के देर रात घर आने से तड़प उठता हो आखिर किस तरह अपने नूर-ए-नज़र को अपने से अलैहदा करने के वास्ते तैयार हो गया था? ग़ौर-ओ-फ़िक्र इसी नतीजे पर आकर ठहर जाती है जिसको मैं ज़िक्र कर आया हूं कि फ़िक्र-ए-आखिरत ने उन्हें झिंझोड़ दिया था.. और इसी फ़िक्र में अपने दिल पर पत्थर रख कर अपने नूर-ए-चश्म को अपने से दूर करने जा रहे थे। मदरसा करीब आ गया था। साइकिल की रफ़्तार धीमी होने लगी थी। मियांजी की नसीहतों का सिलसिला भी खत्म होने वाला था चुनांचे आख़िरी नसीहत करते हुए उन्होंने कहा।
बेटा मेरा तुम्हें अपने से दूर करने का और इस चार दीवारी के सुपुर्द करने का वाहिद और बुनियादी मक़सद अल्लाह और उसके रसूल की रज़ा है। और ये एक ऐसा मरकज़ी मक़सद है जिसकी तरफ़ तमाम दुनियावी व दीनवी मक़ासिद आकर जमा होते हैं। मैं अल्लाह से दुआ गो हूं कि वो हमारे इस मक़सद को अमली जामा पहनाए।
बच्चे ने धीमी आवाज़ से आमीन कहा।।
मियांजी ने साइकिल को रोकते हुए कहा कि बेटा रिहाइशी सामान वगैरा का जायज़ा ले लो कुछ रह तो नहीं गया? अब साइकिल रुक चुकी थी।
बाकी है................