किताब: जवानी की तन्हाई की बेहतरीन रफ़ीक़
✒️ मुफ्ती मोहम्मद तस्लीम उद्दीन अल-महमूदी
जवानी एक ऐसा मौसम है जिसमें ख्वाब भी तरोताज़ा होते हैं और जज़्बात भी। यह उम्र का वह दौर है जब दिल फितरी तौर पर हर नई और चमकती चीज़ की तरफ खिंचता है। ख्यालात तूफानी होते हैं, जज़्बात बेकाबू, और जिंदगी की रंगीन गलियां हर तरफ से हमें पुकारती हैं। यह वह लम्हे होते हैं जब इंसान के कदम किसी भी सिम्त मुड़ सकते हैं — रोशनी की तरफ भी और अंधेरों की जानिब भी।
ऐसे ही जवानी के उभरते लम्हों में, जब दिल का जहाज ख्वाहिशात के समंदर में बहकने को तैयार था, हमने एक फैसला किया — एक ऐसा फैसला जो जिंदगी का सबसे कीमती सरमाया बन गया। हमने दुनिया की वक्ती चमक दमक, बेमकसद महफिलों और आरज़ी खुशियों को खैरबाद कहा, और एक ऐसी रफाक़त को अपनाया जिसने हमें संभाला, संवारा और जिंदगी का असल मकसद सिखाया। हमने किताब की सोहबत को अपना हमसफ़र बनाया।
किताब हमारे लिए महज कागज के औराक़ का मजमुआ नहीं थी, बल्कि यह एक खामोश उस्ताद, एक वफादार दोस्त और एक मुखलिस रहनुमा थी। यह वह साथी थी जो कभी ग़ीबत नहीं करती, कभी धोखा नहीं देती, और कभी हमसे मुंह नहीं मोड़ती। जब दुनिया शोर मचा रही थी, किताब ने हमें सुकूत बख्शा; जब ख्यालात उलझ रहे थे, किताब ने उन्हें सुलझाया; जब दिल बिखर रहा था, किताब ने उसे यकजा कर दिया।
किताब की सोहबत में हमें मालूम हुआ कि असल कशिश बाजारों की रोशनी या वक्ती दोस्तों की हंसी में नहीं, बल्कि इल्म के वह मोती हैं जो हमारे किरदार, सोच और अमल को सुनहरी बना देते हैं। यह वह लम्हे थे जब रात के सन्नाटे में, एक चिराग की मधम रोशनी में, किताब के औराक़ पलटते हुए हमें ऐसा सुकून मिलता जैसे समंदर किनारे ठंडी हवा का झोंका मिल रहा हो।
आज जब हम पलट कर देखते हैं, तो एहसास होता है कि किताब से जो ताल्लुक जोड़ा था, वह महज एक मशगला नहीं था बल्कि जिंदगी की सिम्त मुतअय्यन करने वाला एक फैसला था। दुनिया के बदलते हालात, दोस्तों की आमद व रफ्त, जमाने की उतार चढ़ाव — सब गुजर गए, मगर किताब का साथ आज भी कायम है। वह अब भी हमारी तन्हाई की बेहतरीन रफ़ीक़ है, हमारे सवालों का जवाब है, और हमारी सोच का चिराग है।
आखिर में यह कहना बेजा न होगा कि जवानी की सबसे बड़ी कामयाबी यह नहीं कि हम कितने रंगीन लम्हों में गुजरे, बल्कि यह है कि हमने कितने पुरासर लम्हे संभाल कर अपनी शख्सियत में समेटे। और हमारे लिए वह लम्हे, वह सरमाया, किताब की मोहब्बत में गुजरे हुए लम्हात ही हैं।