ड्रामा हमेशा कल्पना और काल्पनिक किरदारों का संग्रह होता है जिसका वास्तविकता से कोई ताल्लुक नहीं होता। आज के सोशल मीडिया के दौर में विभिन्न प्रकार के ड्रामे हमारी जिंदगियों में बहुत तेजी से शामिल हो चुके हैं।
अफसोस का मुकाम यह है कि बाज़ वालिदैन ईमान में दाखिल होने के बावजूद भी ईमान की रोशनी से महरूम होकर खुदा के खौफ से बेनियाज़ हैं और खुद भी इन ड्रामों की वबा में गिरफ्तार हैं, जो न सिर्फ उन्हें बल्कि दूसरों को भी गुमराह की दावत दे रहे हैं।
यह ड्रामे नई नस्ल के जेहन पर ऐसे गहरे असरत छोड़ रहे हैं कि वह अखलाक व मुआशरत के बुनियादी उसूलों से दूर होती जा रही हैं।
ड्रामों में पेश किए जाने वाले तखय्युलाती मनाज़िर नौजवानों के लिए हकीकत बन जाते हैं और उनकी जिंदगियों का हिस्सा बनकर उनके अखलाक व किरदार को मुतास्सिर करते हैं।
पाकिस्तानी ड्रामों का असर:
पाकिस्तानी ड्रामे आज इस कदर ताकतवर हो चुके हैं कि नस्ल इंसानी की फिक्री बुनियादें उनसे मुतास्सिर हो रही हैं। इन ड्रामों में दिखाए जाने वाले ख्यालात व नज़रियात को अपनाया जाने लगा है, जिससे मुआशरती बिगाड़ पैदा हो रहा है।
मिसाल के तौर पर, शौहर और बीवी के दरमियान मोहब्बत को आज़माइश में डालने की रविश आम हो चुकी है। वक्ती तौर पर मामलात बेहतर नज़र आते हैं लेकिन वक्त के साथ-साथ झगड़े और लड़ाइयां जन्म लेने लगती हैं। कभी खानदान वाले लड़की की बेजा हिमायत करते हैं और कभी शौहर की, जिससे रिश्ते मज़ीद बिगड़ जाते हैं।
यह हकीकत याद रखनी चाहिए कि ड्रामों में पेश किए जाने वाले ताल्लुकात हकीकी नहीं होते। इन किरदारों के जाती रिश्ते अलग होते हैं और उनके दरमियान हकीकी मोहब्बत व एतमाद का कोई ताल्लुक नहीं होता। यह सब सिर्फ जज़्बाती मनाज़िर होते हैं जिनका दाईमी मोहब्बत या हकीकी रिश्तों से कोई वास्ता नहीं रखते।
दीनी तरबियत की अहमियत:
इन नुकसानात से बचने के लिए घरों में दीनी माहौल पैदा करना निहायत ज़रूरी है ताकि बच्चे इन फुजूलियात से बच सकें और हराम व हलाल, दुनिया व आखिरत, हकीकी इज्ज़त व जिल्लत का फर्क समझ सकें।
शादी से पहले बच्चों को जिंदगी गुजारने के उसूल सिखाए जाएं। उन्हें सब्र व बरदबारी का सबक दिया जाए और निकाह के मकासिद को वाजेह तौर पर समझाया जाए।
उन्हें बताया जाए कि इस्लाम के अंदर निकाह महज एक ख्वाहिश की तकमील का नाम नहीं बल्कि एक अज़ीम ज़िम्मेदारी और अमानत है।
जिस की बुनियाद अल्लाह व रसूल ﷺ की तालीमात पर रखी गई है। नबी करीम ﷺ ने फरमाया:
قَالَ رَسُولُ اللَّهِ ﷺ:
النِّكَاحُ مِنْ سُنَّتِي، فَمَنْ رَغِبَ عَنْ سُنَّتِي فَلَيْسَ مِنِّي۔
तर्जुमा:
रसूल अल्लाह ﷺ ने फरमाया:
निकाह मेरी सुन्नत है, पस जिस ने मेरी सुन्नत से मुंह मोड़ा वह मुझ से नहीं
[सुनन इब्न माजा: नंबर 1846]
अल्लाह हमें ड्रामों के फितनों से महफूज़ रखे और हकीकत को तस्लीम करने वाला बनाए। आमीन।