इस दार-ए-फ़ानी के अंदर जितनी क़ौमें और मज़ाहिब ज़हूर पज़ीर हुए ख़्वाह वो यहूद-ओ-नसारा हों, बुद्ध मत हो या मुसलमान हर क़ौम-ओ-मिल्लत की तरक़्क़ी का ज़रिया और उनको बाम-ए-उरूज तक पहुंचाने का अव्वल ज़ीना तालीम-ओ-तरबियत है और मज़हब-ए-इस्लाम ने भी तालीम-ओ-तरबियत को मक़सूद का दर्जा दिया है और क्यों न दिया जाए जबकि हमारे आक़ा ﷺ के आने से क़ब्ल शिर्क-ओ-कुफ़्र के दलदल में फंसे हुए लोगों ने अपने अंदर तालीम-ओ-तरबियत के न होने की वजह से तरह तरह के ख़ुराफ़ात और गुनाह में मुब्तिला थे मसलन शराब नोशी; क़ुमार बाज़ी; ज़िनाकारी; और ज़ुल्म-ओ-तशद्दुद वग़ैरा आम था और यही लोग जब तालीम-ओ-तरबियत से आरास्ता हुए तो पूरे आलम-ए-अरब से ही नहीं बल्कि जहां जहां वो गए ज़ुल्म-ओ-सितम को अदल-ओ-इंसाफ़ से बदकारी-ओ-फ़वाहिश को नेकियों से बदल कर दम लिया; इस से मालूम हुआ कि जहालत का क़ौम-ओ-मिल्लत के अंदर होना तमाम बुराई का असल सबब है और तालीम उनको मिटाने का ज़रिया है, सवाल है कि कौनसी तालीम मुराद है ? याद रहे तालीम दुनयवी-ओ-दीनी दोनों ही नफ़ा बख़्श है , हां दुनयवी तालीम को बक़द्र ज़रूरत हासिल करना भी एक अहम फ़रीज़ा है लेकिन दीनी तालीम को तरजीह हासिल है क्योंकि फ़िक्री इसाबत दुरुस्तगी आमाल और अख़लाक़ हमीदा का उसूल इसके बग़ैर नामुमकिन है क्योंकि तालीम के बग़ैर न इंसान अच्छी तरबियत पासकता है न अपने कारवां को आगे बढ़ा सकता है और न अक़्ल-ओ-फ़रासत के उरूज को हासिल कर सकता है, बल्कि इन तमाम चीज़ों की राह हुसूल में मानए इल्म-ओ-हिकमत से ना आश्नाई है। अल हासिल क़ौमों की तरक़्क़ी-ओ-तन्ज़ली, इक़बाल-ओ-अदबार तालीम पर ही मौक़ूफ़ है और ये जिस तरह मर्दों के लिए ज़रूरी है इस से कहीं ज़्यादा औरतों के लिए ज़रूरी है इस लिए कि जब तालीम-ए-निस्वां होंगी तो इस की वजह से उनके अक़ाइद-ओ-आमाल दुरुस्त होंगे, उनकी गोद में परवरिश पाने वाले बच्चों की नशोनुमा अच्छी होगी । क्योंकि मां की गोद में ही बच्चे सब से पहले तालीम पाते हैं और ये उनके लिए पहली तालीम गाह है जब बच्चा इस दुन्या-ए-रंग-ओ-बू में आंखें खोलता है तो सब से पहले उसे मां का वास्ता पड़ता है, अपनी मां की अख़लाक़-ओ-किरदार को देख कर अपने अंदर लाने की सई करता है, मां की तालीम-ओ-तरबियत का ही का नतीजा है कि शेख़ अब्दुल क़ादिर जिलानीؒ ग़ौसुल वक़्त बने , मौलाना अशरफ़ अली थानवी हकीमुल उम्मत बने, मौलाना अब्दुल रशीद गंगोहीؒ फ़क़ीह-उन-नफ़्स व तसव्वुफ़ के इमाम बने, और उनकी इज़्ज़त-ओ-अज़मत पर दुनिया महव-ए-हैरत है, और बच्चा हरमान-ए-तरबियत के सबब रहज़न-ए-ज़मन बन जाता है इस लिए ख़वातीन में मुनज़्ज़म तालीम का एहतिमाम किया जाए , आज जहालत ने उन्हें खुदा से दूर और इबादत-ओ-रियाज़त से बरतरफ़ करके नाच गाना, फ़िल्म बीनी में मशग़ूल कर दिया है, सद हैफ़ है मर्दों पर कि ख़वातीन के लिए अस्री तालीम का नज़्म किया और दीनी तालीम को पस-ए-पुश्त डाल दिया जिस को इंसान को इंसानियत का दरस मिलता है, जिस का बुरा नतीजा हमारे आंखों के सामने है, चिराग़ वही जलाओ तो रोशनी होगी जिस को फ़ज़ूल समझ कर तुम ने बुझा दिया