*खुद को मौलाना और मुफ़्ती कहना और लिखना!*
शेखुल इस्लाम मुफ़्ती मुहम्मद तक़ी उस्मानी साहिब फ़रमाते हैं कि: सबसे पहली बात तो यह है कि लोग हमें उलमा कहते हैं और लोगों को चाहिए भी कि वो उलमा का एहतराम करें। लेकिन खुद हमारे ज़ेहन में यह खनास नहीं होना चाहिए कि हम कोई बहुत बड़े आलिम बन गए हैं। आजकल एक वबा यह है कि नौजवान फ़ुज़ला भी अपने आप को आलिम कहते हैं और अपने नामों के साथ खुद ही "मौलाना" और "मुफ़्ती" के अलक़ाब लगाते हैं। हज़रत हकीमुल उम्मत मौलाना अशरफ़ अली थानवी कुद्दस अल्लाह सिर्रहु और हमारे जितने बड़े अकाबिर उलमा गुज़रे हैं। उन्होंने कभी अपने आप को आलिम नहीं समझा बल्कि हमेशा तालिबे इल्म ही समझा। अगर हम सही मानी में तालिबे इल्म ही बन जाएं तो यह बहुत बड़ी फ़ज़ीलत है। (सफ़र अफ़्रीका में उलमा के खुसूसी इज्तिमा से खिताब माहनामा अल-बलाग, कराची। दिसंबर 2025 ईस्वी। पृ:41) महमूद खारानी