सादिया फातिमा अब्दुल खालिक
नांदेड़ महाराष्ट्र
8485884176
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*इबादत के बाद इनाम का दिन*
तमाम तारीफें अल्लाह के लिए हैं और सारी नेमतें उसी की दी हुई हैं,
अल्लाह तआला का लाख-लाख शुक्र है कि उसने हमें अशरफुल मखलूकात में रखा है और आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के उम्मती में रखा है,
रमजान के रोजे पूरे होते ही हम इनाम इलाही के दिन में दाखिल हो गए, बारगाहे इलाही में सरबसजूद हैं कि यह दिन देखने मिला है, माहे रमजान रूह की मजबूती और जाहिर व बातिन की सफाई का नाम, यह नेकियों की तिजारत, तौबा व इस्तिगफार, हमदर्दी, सब्र व शुक्र, ईसार व कुर्बानी और कुरान फहमी का महीना, अनवार व बरकात का नुजूल, रहमतों और बरकतों के समेटने का मौका, गुनाहों से मगफिरत और अजाबे जहन्नम से निजात का परवाना, इन तमाम फैज व बरकात को समेटते हुए हम इस दिन तक पहुंच गए हैं,
यह माहे खैर तो, एक गनीमत है, जिसका हर दिन अहम, हर लम्हा कीमती और हर पल नेकियों की बहार है, बेशुमार इनायतें, फजीलतें, हिदायतें, अजमतें व बेइंतहा रहमतें, बरकतें, कामयाबियां और कामरानियां हैं,
मोमिनीन के लिए दो ही ईदें हैं, एक ईद उल फितर और एक ईद उल अज़हा, कुरान मजीद रमजान के रोजों से मुताल्लिक दो मसलहतें बयान करता है, एक यह कि मुसलमानों में तकवा पैदा हो, (लअल्लकुम تتّقون) और दूसरे उसकी इस नेमत का शुक्र अदा करना चाहिए जो उसने माहे मुबारक में नाजिल किया,
(لتکبروا اللہ علی ما ہدیکم و لعلکم تشکرون)
अल्लाह का हुक्म अदा करके एक मुसलमान महीना भर की मशक्कत उठाकर न सिर्फ रोजा रखता है बल्कि अल्लाह की इताअत करते हुए अपने रोजे में मुकम्मल ईमान व एहतिसाब की कैफियत पैदा करने की कोशिश करता है ताकि वह इस रोजे से वह अज्र हासिल कर सके जिसका जिक्र किया गया और जिसका वह हकदार भी होगा
यौमे ईद माहे सियाम की तकमील पर अल्लाह तआला से इनामात पाने का दिन है तो इससे ज्यादा खुशी व मुसर्रत का मौका क्या हो सकता, यही वजह है कि उम्मते मुस्लिमा में इस दिन को एक खास मकाम और अहमियत हासिल है, उलमाए किराम ने लिखा है कि ईद लफ्ज ,,عود,, से मुश्तक है, जिसके मानी ,,लौटना,, के है, यानी ईद हर साल लौटती है, इसके लौट कर आने की ख्वाहिश की जाती है, और फितर के मानी ,,रोजा तोड़ने या खत्म करने,, के हैं, चूंकि ईद उल फितर के रोज, रोजों का सिलसिला खत्म होता है, और इस रोज अल्लाह तआला बंदों को इबादात रमजान का सवाब अता फरमाते हैं, तो इसी मुनासिबत से इसे ,,ईद उल फितर,, करार दिया गया है,
अहादीस मुबारका में शबे ईद और यौमे ईद की बहुत फजीलत बयान फरमाई गई है, हजरत अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज से रिवायत है कि नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया जब ईद उल फितर की रात होती है तो इसे ,,लैलतुल जाइजा,, यानी ,,इनाम की रात,, के नाम से पुकारा जाता है, और जब सुबह ईद होती है, हक तआला जल्ल शानुहु फरिश्तों को तमाम बस्तियों में भेजते हैं और वह रास्तों के कोनों पर खड़े हो जाते हैं और ऐसी आवाज से जिसे जिन्नात और इंसानों के सिवा हर मखलूक सुनती है, पुकारते हैं कि ,,ए उम्मते मुहम्मदिया सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम इस करीम रब की बारगाहे करम में चलो जो बहुत ज्यादा अता फरमाने वाला है, जब लोग ईदगाह के तरफ निकलते हैं तो अल्लाह रब्बुल इज्जत फरिश्तों से फरमाता है कि ,,इस मजदूर का क्या बदला है जो अपना काम पूरा कर चुका हो, वह अर्ज करते हैं कि ,,ए हमारे माबूद इसका बदला यही है कि उसकी मजदूरी और उजरत पूरी पूरी अता कर दी जाए,, तो अल्लाह तआला फरमाते हैं कि ,,ए फरिश्तों तुम्हें गवाह बनाता हूं कि मैंने उन्हें रमजान के रोजों और तरावीह के बदले में अपनी रजा और मगफिरत अता फरमा दी,, और फिर बंदों से इरशाद होता है कि ,,ए मेरे बंदों मुझसे मांगो, मेरी इज्जत व जलाल और बुलंदी की कसम, आज के दिन आखिरत के बारे में जो सवाल करोगे अता करूंगा, दुनिया के बारे में जो सवाल करोगे उसमें तुम्हारी मसलहत पर नजर करूंगा, मेरे इज्जो जलाल की कसम, मैं तुम्हें मुजरिमों और काफिरों के सामने रुसवा न करूंगा, मैं तुम से राजी हो गया,, (अत्तरगीब वत्तरहीब)।
बिला शुबह वह अफराद निहायत खुशकिस्मत हैं कि जिन्होंने माहे सियाम पाया और अपने औकात को इबादात में मुनव्वर रखा, पूरे माह तकवा की रविश इख्तियार किए रखी, और बारगाहे रब्बुल इज्जत में मगफिरत के लिए दामन फैलाए रखा यह ईद ऐसे ही खुश बख्त अफराद के लिए है और अब उन्हें मजदूरी मिलने का वक्त है ता हम सहाबा किराम और बुजुर्गान दीन अपनी इबादात पर इतराने के बजाए, अल्लाह तआला से कुबूलियत की दुआ किया करते थे, हजरत अली रज ने ईद की मुबारकबाद देने के लिए आने वालों से फरमाया ,,ईद तो उनकी है जो अजाबे आखिरत और मरने के बाद की सजा से निजात पा चुके हैं, इसी तरह एक दफा हजरत उमर बिन खत्ताब के दौरे खिलाफत में लोग ईद के रोज आप रज के पास आए तो देखा कि वह घर का दरवाजा बंद किए जार व कतार रो रहे हैं, लोगों ने अर्ज किया, ,,अमीरुल मोमिनीन आज तो ईद का दिन है और आप रज रो रहे हैं, हजरत उमर रज ने जवाब दिया, लोगों यह ईद का दिन भी है और वईद का दिन भी, आज जिसके नमाज रोजे और दीगर इबादात कुबूल हो गईं, बिला शुबह आज उसकी ईद है और जिसकी इबादात कुबूल नहीं हुईं, उसके लिए वईद का दिन है, इस खौफ से रो रहा हूं कि नहीं मालूम मेरी इबादात कुबूल हुई या उन्हें रद्द कर दिया गया,
ईद अपने अलावा दूसरे को भी खुशियों में शामिल करने का नाम है, सिला रहमी का मामला करने का नाम है, इस्लाम एक मुकम्मल निज़ामे हयात है, अल्लाह के बनाए गए कवानीन हमेशा इंसाफ और हुस्ने सुलूक करने का मामला करने की तरगीब दिलाते हैं ईद से पहले सदका फितर अदा करते हैं, नए कपड़े, उम्दा खानों का एहतिमाम करते हैं, हमारे अतराफ में ऐसे कई गुरबा व मसाकीन होंगे जिनके पास खाने का इंतजाम न हुआ हो, ऐसे अफराद को तलाश कर के उनके भी खाने, कपड़े, और दीगर जरूरियात का ख्याल रखते हुए ईद मनाना ही दरअसल ईद है,
इस ईद पर खास यह ध्यान रखें कि अहले ईमान का इमानी बुनियादों पर एक दूसरे से जो रिश्ता है वह निहायत गहरा और बेहद मजबूत है अगर देखा जाए तो यह रिश्ता खूनी रिश्ते से भी ज्यादा अहमियत का हामिल है, यह हमारा इमानी रिश्ता है जो कलमा की बुनियाद पर बनता है और यह बात वाजेह है कि कलमा हर चीज से बुलंदो बाला है और उसकी कद्रो मन्ज़िलत दुनिया व मा फीहा से भी बढ़कर है यह रिश्ता हमारा फिलिस्तीन के साथ है जो कभी न टूटने वाला है,
अहले गजा में बच्चे, बूढ़े, नौजवान और औरतें सब के सब बड़ी हिम्मत व जुर्रत के साथ पंजा आजमाई कर रहे हैं, और अज्म व जुर्रत की दीवार बन कर जालिम के सामने खड़े हैं, वह किसी और से मदद तलब करने के बजाए अपने अल्लाह के साथ मद मुकाबिल का मुकाबला कर रहे हैं और यह जामे शहादत पीने के लिए बेचैन हैं, बैतुल मुकद्दस से रिश्ता रखने वालों की शहादत को मद्देनजर रखें, इस्लाम के लिए शहादत पाने वालों को मद्देनजर रखें, जहां बेकसूर मुसलमान परेशान हाल हैं, उनको मद नजर रख कर ईद मनाएं,
इसी लिए हम, मौजूदा हालात को देखते हुए इस्लाम के लिए शहादत पाने वालों को याद रख कर बहुत ही सादगी से ईद मनाएं, अपने बच्चों को इस बात की तरगीब दें कि फिलिस्तीन में कितने बे आसरा जुल्म रसीदा बच्चे हैं, जो दाना पानी के लिए मोहताज हैं उनके सरों से छत छीन ली गई, अंबिया किराम का मदफन, हमारा किबला अव्वल को याद करते हुए, ईद को सादगी से मनाते हुए अल्लाह का शुक्र अदा करें,
अल्लाह तमाम मोमिनीन को ईद उल फितर का सही हक अदा करने वाला बनाए, अल्लाह हमारे इल्म व अमल को कुबूल फरमाए और अल्लाह हम सब से राजी हो जाए,
आमीन