अस्थिरता के क्षितिज पर कुछ पवित्र आत्माएँ ऐसी चमकती हैं जिनकी जिंदगी सिर्फ दिनों की श्रृंखला नहीं बल्कि मार्गदर्शन की रोशनी का कारवां होती है, वे अपने अस्तित्व से मुर्दा दिलों में जिंदगी की चमक पैदा करते हैं, और अपने संबंध से उम्मत के सीने ईमान की गर्मी से रोशन हो जाते हैं, इन्हीं रब्बानी पुरुषों और पवित्र साथियों में एक नाम मौलाना उमर साहब पालनपुरी रहमतुल्लाह अलैह का है, जो पालनपुर की मुबारक सरजमीन से उठने वाली वह महान हस्ती थे जिनकी खुशबूए एखलास ने दुनिया के कोने-कोने को महका दिया, जिनका जिक्र-ए-खैर सुनने वाला अपने दिल में अजब सरूर महसूस करता है और जिनकी याद आते ही निगाहों में अकीदत के चिराग रोशन हो जाते हैं, मौलाना की जिंदगी सरापा दावत थी, सरापा तबलीग थी, सरापा मुजाहिदा व रियाजत थी, उनका हर लम्हा इसी मुबारक मिशन के लिए वक्फ था जिसे अकाबिर ने उम्मत के लिए सरमाया-ए-नजात बनाया, तबलीगी जमात में मौलाना का किरदार निहायत नुमायाँ और ताबनक था, वह काफिला-ए-दावत के ऐसे सालार थे जिनके कदमों में एखलास की खाकसारी, जिनकी पेशानी पर लिल्लाहियत की ताबंदी और जिनकी निगाह में दर्द-ए-उम्मत की बेकराँ वुसअत मौजजन थी, उन्होंने दुनियावी मनसब व जाह को कभी खातिर में न लाया बल्कि अपनी जवानी, अपनी तवानाई, अपनी आसائش और अपनी राहत सब राह-ए-दावत में निसार कर दी, उनकी जिंदगी सफर-ए-दीन से इबारत थी, वह मुल्कों मुल्कों गए, शहरों शहरों फिरे, बस्तियों बस्तियों पहुंचे, और हजारों नहीं बल्कि लाखों दिलों को नूर-ए-ईमान से मुनव्वर किया, उनके कदम जहां पड़ते वहां रूहानियत की बहार आ जाती, उनकी मजलिस जहां सजती वहां कुल्ब की दुनिया बदल जाती, वह महज मुसाफिर न थे बल्कि पयामबर-ए-मोहब्बत थे, उनका सफर जिस्मानी नहीं बल्कि रूहों को बेदार करने वाला सफर था, अल्लाह ताला ने मौलाना को बयान का अजीब मलका अता फरमाया था, उनकी जबान में हलावत, उनके अल्फाज में तासीर, उनके लहजे में सोज व गुदाज और उनकी नसीहत में हिकमत की चाशनी थी, वह जब दावत की बात करते तो दिल झुक जाते, जब आखिरत का जिक्र करते तो आंखें अश्कबार हो जातीं, उनकी गुफ्तगू महज अल्फाज का मजमुआ न थी बल्कि नूर के चिराग थे जो सीनों में रोशन हो जाते, उनकी सादगी में जलाल था और उनके एखलास में जमाल, वह तवाजो के पैकर थे मगर दावत के मैदान में कोह-ए-इस्तिकामत, उनकी मेहनतों ने उम्मत को यह सबक दिया कि दीन की खिदमत ही असल सरमाया है और दावत इलल्लाह ही सबसे बड़ी सआदत, मौलाना उमर साहब पालनपुरी रहमतुल्लाह अलैह का नाम तारीख-ए-दावत में हमेशा सुनहरी हुरूफ़ से लिखा जाएगा, वह अगरचे पर्दा-ए-खाक में चले गए मगर उनके सफर बाकी हैं, उनकी मेहनत की खुशबू बाकी है, उनकी आवाज आज भी दिलों में गूंजती है, और उनका नूरानी नक्श-ए-कदम आज भी तालिबान-ए-हक के लिए मशअल-ए-राह है, अल्लाह ताला उनकी मगफिरत फरमाए, उनके दरजात बुलंद करे, और उम्मत को उनके एखलास व दावत के रास्ते पर चलने की तौफीक अता फरमाए आमीन या रब्बुल आलमीन।

मोहम्मद मुसअब पालनपुरी