ज़िन्दगी में कुछ मुलाक़ातें बज़ाहिर बहुत मामूली दिखाई देती हैं, मगर अपने अंदर एक गहरी मअनवियत छुपा लेती हैं। ये वाक़िया भी ऐसी ही एक मुलाक़ात का था।
2 जनवरी 2026 मेरे लिए एक आम सा दिन था। चंद लोग महफ़िल में गुफ़्तगू कर रहे थे और फ़िज़ा में रस्मी शाएस्तगी और समाजी मेल जोल का रिवायती रंग मौजूद था। लोग सलाम व दुआ में मसरूफ़ थे, मैं ने भी एक साहिब-ए-शिनासाई को तहज़ीब के तक़ाज़ों के मुताबिक़ आगे बढ़ कर सलाम किया।
सलाम का जवाब तो मिला, मगर इस के बाद आने वाला लम्हा ग़ैर मामूली था।
सामने वाले शख्स ने मुझे एक तवील और गहरी नज़र से देखा। वो महज़ देखना नहीं था, बल्कि ऐसा महसूस होता था जैसे कोई ख़ामोश पैमाइश या 'मुहाकमा' कर रहा हो। उन्होंने आहिस्ता आहिस्ता मुझे सर से पाँव तक देखा, और फिर सर को हल्की सी जुंबिश दी। इस मुख्तसर सी हरकत में एक अजीब सा पैग़ाम था—ऐसा पैग़ाम जिस में अल्फाज़ तो मफ़क़ूद थे मगर एक गहरा एहसास ज़रूर मौजूद था।
वो लम्हा तो बीत गया, मगर इस की बाज़गश्त दिल व दिमाग में बाक़ी रही। मैं वहाँ से ख़ामोशी और वक़ार के साथ निकल आया, लेकिन अगले पाँच छह रोज़ तक वो मंज़र वक़्फ़े वक़्फ़े से ज़ेहन की स्क्रीन पर उभरता रहा। वो तीखी नज़रें, वो ख़ामोश सर हिलाना और वो ग़ैर मरई सा नफ़सियाती दबाओ... ये एक ना। मुकम्मल मुलाक़ात थी
फिर एक लम्हे के लिए मैं ने खुद से सवाल किया: "क्या वाक़ई किसी की निगाह इंसान की क़द्र व क़ीमत तय कर सकती है?"
इसी सवाल की कोख से मेरा जवाब भी बरामद हो गया।
रूहानी सुकून का रास्ता
इस्लाम हमें ये सबक देता है कि इज्ज़त और सुकून का असल सरचश्मा सिर्फ अल्लाह की ज़ात है। जब इंसान सिद्क़-ए-दिल से ये कहता है:
"हस्बियल्लाहु व निअमल वकीलु"
(अल्लाह मेरे लिए काफ़ी है और वो बेहतरीन कारसाज़ है)
तो दिल के अंदर एक ग़ैर मामूली इत्मीनान की लहर दौड़ जाती है। इसी तरह क़ुरआन की दो मुख्तसर मगर ताक़तवर सूरतें, सूरह अल-फलक़ और सूरह अन-नास, इंसान को हसद, नज़र-ए-बद और मंफ़ी असरात से महफ़ूज़ रखने के लिए एक मुस्तहकम रूहानी हिसार फ़राहम करती हैं। जब दिल अल्लाह की पनाह में आ जाए तो लोगों के रवैये अपनी तासीर खो देते हैं।
नफ़सियाती इदराक और जिस्मानी तर्ज़-ए-अमल
नफ़सियात के मुताबिक़ बाज़ औक़ात कोई 'नामुकम्मल' वाक़िया ज़ेहन में बार बार इस लिए आता है कि इंसानी दिमाग उसे मुकम्मल करना चाहता है। इसे ज़ेइगारनिक इफ़ेक्ट कहा जाता है। ऐसी सूरतहाल में आप का पुरएतमाद जिस्मानी तर्ज़-ए-अमल (Body Language) ही आप का सब से मुअस्सिर और ख़ामोश हथियार है।
दिफ़ाई अंदाज़ अपनाने के बजाए अपने कंधे मुतवाज़िन और सीधे रखें; सामने वाले की आँखों में आँखें डाल कर देखने के बजाए इस की पेशानी के वस्त में देखें। ये अमल मुक़ाबिल को ला-शऊरी तौर पर ये एहसास दिलाता है कि आप इस के ज़ेर-ए-असर नहीं हैं, बल्कि वो खुद अपने वजूद में नुक़्स ढूँडने पर मजबूर हो जाता है। याद रखिए, आप की पुरवक़ार ख़ामोशी और एक बेनियाज़ सी मुस्कराहट सामने वाले के तकब्बुर को ख़ाक में मिलाने और इस 'नामुकम्मल वाक़िये' की तकमील के लिए काफ़ी है।
ज़र्फ की असल जीत
ज़िन्दगी के सफ़र में ऐसे लोग मिलते रहते हैं जो अपनी निगाहों या रवैयों से दूसरों को कमज़ोर महसूस करवाने की कोशिश करते हैं। मगर असल अज़मत इस में नहीं कि हम हर रवैये का जवाब दें, बल्कि असल फ़तह ये है कि हम अपने सुकून और इज्ज़त-ए-नफ़्स को किसी दूसरे के रवैये का मोहताज न बनाएँ।
उक़ाब जब आसमान की बुलन्दियों में परवाज़ करता है तो ज़मीन से उठने वाली गर्द इस की उड़ान को मुतास्सिर नहीं कर सकती। इसी तरह जो इंसान अपनी क़द्र पहचान लेता है, लोगों की तीखी नज़रें इस के वक़ार में कमी नहीं कर सकतीं। दरहक़ीक़त यही वो घड़ी होती है जब हासिदीन की निगाहों और आप के वक़ार का असल इम्तिहान होता है।