समर-ए-इख़लास...!
अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से मरवी है कि आनहज़रत ﷺ ने इरशाद फ़रमाया:
तीन आदमी सहरा की तरफ़ निकले। अचानक आसमान से बारिश शुरू हो गई, तो वो पनाह लेने के लिए एक ग़ार में दाख़िल हो गए और बारिश रुकने का इंतज़ार करने लगे। इसी हाल में बैठे थे कि पहाड़ से एक भारी पत्थर गिरा और ग़ार का दहाना बंद हो गया। ये सूरत-ए-हाल देख कर वो अपनी ज़िंदगी से मायूस हो गए।
उन में से एक ने कहा:
“तुम में से हर एक अपना सब से ख़ालिस और बेहतरीन अमल याद करे और उसे वसीला बना कर अल्लाह तआला से दुआ करे, शायद वो हम पर रहम फ़रमाए और हमें इस मुसीबत से निजात दे।”
एक शख़्स ने कहा:
“ए अल्लाह! तू जानता है कि मैं अपने वालिदैन का बहुत फ़रमाँबरदार था। मैं रात को उन के लिए दूध (या पानी) लाता, वो पीते थे। एक रात मैं आया तो देखा कि वो सो चुके हैं। मैं ने उन्हें जगाना मुनासिब न समझा और न ही बच्चों को उन से पहले पिलाना गवारा किया। मैं बर्तन हाथ में लिए खड़ा रहा, यहां तक कि सुबह हो गई।
ए अल्लाह! अगर मैं ने ये अमल सिर्फ़ तेरी रज़ा के लिए किया था तो हमारी मुश्किल आसान फ़रमा दे।”
चुनांचे पत्थर कुछ सरक गया और रोशनी की हल्की सी किरन अंदर दाख़िल हो गई।
दूसरा बोला:
“ए अल्लाह! तू जानता है कि मैं एक औरत से बहुत मोहब्बत करता था। बड़ी कोशिश के बाद मुझे उस पर क़ुदरत हासिल हो गई, मगर जब मैं उस के क़रीब हुआ तो उस ने कहा: ‘अल्लाह से डरो!’ तो मैं तेरे ख़ौफ़ से फ़ौरन पीछे हट गया और उसे छोड़ दिया।
ए अल्लाह! अगर मैं ने ये अमल ख़ालिस तेरे डर से किया था तो हमारी मुश्किल आसान फ़रमा दे।”
पत्थर मज़ीद सरक गया, इतना कि अगर वो चाहें तो निकल सकते थे, मगर अभी मुकम्मल रास्ता न खुला था।
तीसरे ने कहा:
“ए अल्लाह! तू जानता है कि मैं ने कुछ मज़दूर काम पर रखे। सब को उन की पूरी मज़दूरी दे दी, सिवाए एक के, जो अपनी उजरत छोड़ कर चला गया। मैं ने उस की मज़दूरी को महफ़ूज़ रखा और उसे कारोबार में लगा दिया, यहां तक कि वो बहुत बढ़ गई। कुछ अरसे बाद वो मज़दूर वापस आया और अपनी उजरत का मुतालबा किया। मैं ने कहा: ‘ये सब जो तुम देख रहे हो, तुम्हारा है।’ उस ने सब ले लिया।
ए अल्लाह! अगर मैं ने ये अमल सिर्फ़ तेरी रज़ा के लिए किया था तो हमारी मुश्किल आसान फ़रमा दे।”
चुनांचे पत्थर पूरी तरह हट गया और वो तीनों सही सलामत बाहर निकल आए।
इस मौक़ा पर आनहज़रत ﷺ ने फ़रमाया:
“जिस ने सच्चाई इख़्तियार की, उस ने निजात पाई।”
(मुत्तफ़िक़ अलैह: सही बुख़ारी, सही मुस्लिम)
*आप का एक री एक्ट हमारे लिए हौसला अफ़ज़ाई है।।♥️❤️👍*