पसंद की शादी के बाद सूरत-ए-हाल कुछ यूं होती है
जो पसंद की शादी कर लेता है और बाद में कुछ नई आदतों से वाकिफ होता है, वो उलझन में पड़ जाता है।
एक लड़की बहुत अच्छा लिबास पहने हुए , उम्दा खुशबू लगाए , मेकअप किए हुए है।
लड़के को पसंद आ जाती है, शादी हो गई।
शादी के बाद जब बीवी ने वैसे ही कपड़े, खुशबूएँ और मेकअप मांगा तो होश ठिकाने आए
कि ये सब मुफ्त नहीं था; पहले अब्बा जी के पैसों से आता था, अब शौहर की जेब से आएगा।
शादी से पहले सजी बनी लड़की कॉलेज या ऑफिस में चंद घंटों के लिए नजर आती थी।
शादी के बाद निहार मुंह, बगैर दांत साफ किए, बगैर हेयर स्टाइल के और शिकन आलूद कपड़ों में नजर आती है”।
तो....
तमाम खुशकुन ख्यालात उड़न छू हो जाते हैं।
इसी तरह डेट पर फास्ट फूड या चाइनीज खाते हुए छुरी कांटे की महारत, नैपकिन का नफीस इस्तेमाल, मशरूब जरआ जरआ पीना, सब कुछ हसीन लगता है।
लेकिन शादी के बाद वही लड़की आपके साथ दस्तरखान या डाइनिंग टेबल पर बैठ कर जब दाल, साग, भिंडी, तोरी रोटी के साथ खाती है, दाल चावलों पर डाल कर उंगली से अचार की फांक तोड़ती है और इस्तेमालशुदा बर्तन समेटती है तो वही लड़की इतनी हसीन नहीं लगती।
वही लड़की शादी से पहले जब अपने घर के मामलात लड़के से डिस्कस करती है,
अपनी भाभी, सहेली या बहन भाई का गिला करती है तो लड़का फखर महसूस करता है कि मुझे काबिले एतमाद समझा गया और साहिबे राय भी।
लेकिन जब वही लड़की शादी के बाद ननद, सास, देवर, जेठ या देवरानी, जेठानी का किस्सा शोहर-ए-नामदार को सुनाती है तो शौहर नामदार जच हो जाते हैं और राय देने से गुरेज करते हैं,
बल्कि
इंतिहाई सूरत-ए-हाल में बेगम की खातिर ख्वाह तवाजो भी फरमाते हैं।
अब वही लड़की जमाई भी लेगी और डकार भी।
सर भी खुजाएगी।
लड़की वही है, लड़का भी वही है। बस मारूजी हालात की तब्दीली से जज्बात बदल जाते हैं और तरजीहात भी।
अगर लड़का इस सब की तवक्को नहीं कर रहा था तो दरअस्ल वो शादी नहीं, अहमकों की जन्नत का ख्वाहिशमंद था।
इसी तरह अगर लड़की भी ख्वाबनाक फूलों के हिंडोले में झूलने के ख्वाब देख रही थी तो वो भी अहमकों की सरदार ही थी।
पसंद की शादी हो या रिवायती,
रिश्ता तब चलता है जब तवक्कोआत कम और बर्दाश्त ज्यादा हो।
वरना ख्वाबों की जन्नत जल्द ही सवालों की दुनिया में बदल जाती है।
असल मोहब्बत वो है जो सजी संवरी शामों से आगे बढ़ कर,
बिखरी सुबहों को भी कबूल कर ले।
आयशा ❤