असार-ए-सहाबा की अहमियत
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८/ रमज़ान १४४७ हिजरी
सहाबा किराम -रिज़वान अल्लाह अलैहिम अजमईन- इस उम्मत के मुक़्तदा हैं, इन के बड़े एहसानात हैं, शरीयत को बड़ी दियानत के साथ उन्होंने उम्मत तक पहुंचाया है, इन का सब से बड़ा इम्तियाज़ी वस्फ़ "हुज़ूर पुरनूर -सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम- की सोहबत" है, इस की बरकत से इन के अंदर बेशुमार खूबियां पैदा हुईं, उलूम में गहराई मिली, गैर मामूली फ़हम अता हुआ, शरीयत के रम्ज़ शनास बने, इन की नस फहमी सब से बालातर है।
इन की बातों, फ़ैसलों और फ़तवों को "असार" कहा जाता है, शरीयत में इस की बड़ी अहमियत है, अमल के साबित करने में इस का बड़ा किरदार है, हर ज़माने के आइम्मा ने इसे हाथों हाथ लिया है, अपने मौक़िफ़ पर इन की आरा को फ़ौक़ियत दी है।
क़ाबिल-ए-अमल बातों की निशानदेही में इन "असार" का बड़ा दख़ल है, हुक्म के मंसूख़ होने की इतलाअ बसा औक़ात इन्हीं से मिलती है, इन की गैर क़ियासी बातें "मरफ़ू हदीस" का दर्जा रखती हैं।
हुज़ूर -सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम- की बातों को बयान करने में बहुत मोहतात थे, ग़लत बात के मंसूब हो जाने का अंदेशा इन्हें हर वक़्त लगा रहता था, इसी वजह से उन्होंने हदीस बयान करने में एहतिआती रवैया अपनाया, हुज़ूर -सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम- से बारहा सुनी हुई बातों में भी "समाअ" की वजाहत नहीं की।
उम्मत ने असार के साथ मरफ़ू हदीस जैसा मामला किया, इन असार में हुज़ूर -सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम- की बेशुमार बातें पिन्हां हैं, शरीयत का मोतद्द बह इल्म इन में मौजूद है।
उलमा ने इस पर अमल करने की पुरज़ोर तरग़ीब दी है, इस से सिर्फ़-ए-नज़र करने को महरूमी क़रार दिया है, मसले के सुबूत में इस को मज़बूत तरीन दलील समझा है, इसी में हमारे लिए कामयाबी है, हर मसले में इस से पहलू तही बरतना और मरफ़ू रिवायत का मुतलाशी होना कम इल्मी की बात है, कज फहमी की अलामत है, दीनदारी नहीं बल्कि हुवा परस्ती है।