*मासिक धर्म की हालत में शिक्षिका का कुरान सुनना और पढ़ाना*

मासिक धर्म की हालत में शिक्षिका कुरान सुन सकती है, इसमें कोई हर्ज़ नहीं, अलबत्ता कुरान की तिलावत न करे, और न कुरान को छुए, लेकिन कुरान सुन सकती है।

सही बुखारी में है:

’’अन मंसूर बिन सफ़िया अन्न उम्महु हद्दसतुहु अन्न आइशा हद्दसतुहा अन्न अन्नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम कान यत्तकिउ फी हिजरी व अना हाइज़, सुम्मा यक़रउल कुरआन।‘‘

(सही अल-बुखारी, किताब अल-हैज़, बाब क़िराअतुर रजुल फी हिजरी इम्रअतिही व हिया हाइज़, 1/44, त: क़दीमी कराची)

अनुवाद: हज़रत आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा बयान करती हैं कि नबी करीम ﷺ मेरी गोद में टेक लगाकर लेटते थे जब कि मैं हैज़ की हालत में होती थी, फिर आप ﷺ कुरान-ए-करीम की तिलावत फरमाते थे।

इस हदीस से साबित हुआ कि हाइज़ा का तिलावत-ए-कुरान सुनना जायज़ है, चाहे वो शिक्षिका हो या न हो।

अगर तलबा को पढ़ाने की नौबत आए तो आयतों को तोड़ तोड़ कर पढ़ाए, एक साथ एक आयत की तिलावत न करे। क्योंकि हाइज़ा के लिए तिलावत कुरान किसी सूरत भी जायज़ नहीं, पढ़ाने के लिए बस इतनी इजाज़त है कि वक़्त ज़रूरत तोड़ तोड़ कर पढ़ाए।

वल्लाहू आलम बिस-सवाब