बिन्नत मुहम्मद राफे़✍️
या अल्लाह… इस रमज़ान में हमें अपने हबीब ﷺ का दीदार नसीब फरमा दे… 🥹
रमज़ान की सहर होती है… आसमान पर नूर उतर रहा होता है… फ़रिश्ते रहमतें बाँट रहे होते हैं… मगर एक दिल है जो बेचैन है… जो किसी और चीज़ के लिए नहीं धड़क रहा… वो सिर्फ़ एक हस्ती के लिए तड़प रहा है… उस नबी के लिए जिसने कभी हमें देखा नहीं… मगर हमारे लिए रोए बहुत हैं…
हमने पढ़ा कि जब आप ﷺ पर ताइफ़ में पत्थर बरसाए गए, जब जिस्म-ए-मुबारक लहूलुहान था, जब जूतियाँ खून से भर गईं… तब भी ज़बान पर बद्दुआ नहीं आई… बल्कि फ़रमाया: “ए अल्लाह! इन्हें हिदायत दे, ये जानते नहीं…”
उफ़… कौन होता है ऐसा? कौन इतना रहीम होता है? वो हमारे नबी ﷺ थे… हमारी खातिर रोने वाले… हमारी शफ़ाअत के लिए क़यामत के दिन सजदे में गिर जाने वाले…
और हम?
हम गुनाहों में डूबे हुए… नमाज़ों में सुस्ती… ज़बान पर शिकायतें… दिल में दुनिया… फिर भी दिल ये कहने से बाज़ नहीं आता:
या अल्लाह! एक बार… बस एक बार ख्वाब में ही सही… हमें अपने महबूब ﷺ का चेहरा मुबारक दिखा दे…
रात के पिछले पहर जब सब सो जाएँ… तन्हाई में सजदे में गिर कर देखो… दिल से निकालो वो सिसकी जो सीने में दबी है… और कहो:
या रब! मैं इस काबिल नहीं… मेरी आँखें पाक नहीं… मेरा दिल साफ़ नहीं… मगर मैं तेरे महबूब ﷺ से मोहब्बत रखती हूँ… इस मोहब्बत को झूठा न होने दे… मुझे खाली न लौटा… अगर ख्वाब में दीदार नहीं तो कम से कम क़यामत में उनके कदमों में जगह दे देना…
ज़रा सोचो… क़यामत का मैदान है… सूरज सरों पर है… लोग नफ़्सी नफ़्सी पुकार रहे हैं… और वो ﷺ फ़रमा रहे हैं: “उम्मती… उम्मती…”
वो हमें ढूँढ रहे होंगे… क्या हम ऐसे होंगे कि वो पहचान लें? या हमारे चेहरे सुन्नत से खाली होंगे? हमारे आमाल शर्मिंदा कर देंगे?
दीदार सिर्फ़ आँखों का नहीं होता… दीदार नसीब का होता है… और नसीब उन का जागता है जो दरूद से रिश्ता जोड़ लेते हैं… जो सुन्नत को ज़िंदगी बना लेते हैं… जो गुनाह पर रो लेते हैं… जो तन्हाई में अल्लाह से कह देते हैं:
या अल्लाह! मुझे अपने महबूब ﷺ की सच्ची उम्मती बना दे…
अगर इस रमज़ान ख्वाब में दीदार हो गया तो वो लम्हा ज़िंदगी का सबसे कीमती लम्हा होगा… मगर अगर दीदार न भी हुआ… और दिल बदल गया… आँखें नम हो गईं… नमाज़ें सँवर गईं… ज़बान दरूद से तर हो गई… तो यकीन करो यही असल करम है… यही असल क़ुर्ब है…
या अल्लाह… हम कमज़ोर हैं… ख़ताकार हैं… मगर तेरे महबूब ﷺ से मोहब्बत रखते हैं… इस मोहब्बत की लाज रख ले…
इस रमज़ान हमारी किस्मत बदल दे…
हमारी आँखों को वो नूर दिखा दे…
और अगर दुनिया में नहीं… तो आख़िरत में अपने हबीब ﷺ के कदमों में गिरा दे…
आमीन या रब्बुल आलमीन… 🤲🏻🥹