अस्सलाम अलैकुम व रहमतुल्लाह व बरकातुहु 

रमजान मुबारक में सहरी खाने की फ़ज़ीलत और उसके फ़यूज़ व बरकात का बकसरत तज़किरा हमें अहादीस मुबारका में मिलता है। क्योंकि हुज़ूर नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व आलेही वसल्लम बालएल्तिज़ाम रोज़े का आग़ाज़ सहरी खाने से फरमाते और दूसरों को भी सहरी खाने की ताकीद फरमाते। जैसा कि दर्ज ज़ैल अहादीस मुबारका से साबित है :

1। हज़रत अनस बिन मालिक रज़िअल्लाहु अन्हु से मरवी है कि हुज़ूर नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व आलेही वसल्लम ने फरमाया :

تَسَحَّرُوْا فَإِنَّ فِی السَّحُوْرِ بَرَکَةً.

मुस्लिम, अससहीह, किताब अससियाम, बाब फज़ल अससहूर व ताकीद इस्तेहबाहु, 2 : 770, रक़म : 1095

’’सहरी खाया करो क्योंकि सहरी में बरकत है।‘‘

2। हज़रत अबू सईद खुदरी रज़िअल्लाहु अन्हु से मरवी है कि हुज़ूर नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व आलेही वसल्लम ने फरमाया :

اَلسُّحُوْرُ أَکْلُهُ بَرَکَةٌ فَلَا تَدْعُوْهُ.

अहमद बिन हनबल, अलमुसनद, 3 : 12, रक़म : 11102

’’सहरी सरापा बरकत है इसे तर्क न किया करो।‘‘

3। हज़रत अबू सईद खुदरी रज़िअल्लाहु अन्हु से मरवी है कि हुज़ूर नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व आलेही वसल्लम ने यह भी फरमाया :

فَإِنَّ اﷲَ وَ مَلاَئِکَتَهُ يُصَلُّوْنَ عَلَأ الْمُتَسَحِّريْنَ.

अहमद बिन हनबल, अलमुसनद, 3 : 12, रक़म : 11102

’’अल्लाह तआला और उसके फरिश्ते सहरी करने वालों पर अपनी रहमतें नाज़िल करते हैं।‘‘

4। हज़रत अम्र बिन अलआस रज़िअल्लाहु अन्हुमा से मरवी है कि हुज़ूर नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व आलेही वसल्लम ने फरमाया :

فَصْلُ مَا بَيْنَ صِيَامِنَا وَصِيَامِ أَهْلِ الْکِتَابِ، أَکْلَةُ السَّحَرِ.

मुस्लिम, अससहीह, किताब अससियाम, बाब फज़ल अससहूर व ताकीद इस्तेहबाहु, 2 : 771, रक़म : 1096

’’हमारे और अहले किताब के रोज़ों में सहरी खाने का फ़र्क है।‘‘

5। हज़रत इरबाज़ बिन सारिया रज़िअल्लाहु अन्हुमा से मरवी है कि मैं ने हुज़ूर नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व आलेही वसल्लम से सुना :

وَهُوَ يَدْعُوْا إِلَی السُّحُوْرِ فِی شَهْرِ رَمًضَانْ، فَقَالَ : هَلُمُّوْاإِلَی الْغَدَاءِ الْمُبَارَکِ.

1. इब्न हिब्बान, अससहीह, 8 : 244, रक़म : 3465
2. बैहक़ी, अससुनन अलकुबरा, 6 : 23, रक़म : 7905

’’आप सल्लल्लाहु अलैहि व आलेही वसल्लम रमजान मुबारक में सहरी के लिए बुलाते और इरशाद फरमाते : सुबह के मुबारक खाने के लिए आओ।‘‘

रोज़े में सहरी को बिला शुबह अहम मक़ाम हासिल है। रूहानी फ़यूज़ व बरकात से क़तअ नज़र सहरी दिन में रोज़े की तकवियत का बाइस बनती है। इस की वजह से रोज़े में काम की ज़्यादा रगबत पैदा होती है। अलावा अज़ीं सहरी का ताल्लुक़ रात को जागने के साथ भी है क्योंकि यह वक़्त ज़िक्र और दुआ का होता है जिस में अल्लाह तआला की रहमतें नाज़िल होती हैं और दुआ और इस्तिग़फ़ार की क़बूलियत का बाइस बनता है।

वल्लाह व रसूलुहु आलम बिससवाब।