अहकाम रमजानुल मुबारक 
 

 वह उज़र जिनसे रमजान में रोजा न रखने की इजाजत होती है: 
(1) बीमारी की वजह से रोजा की ताकत न हो, या मर्ज बढ़ने का शदीद खतरा हो तो रोजा न रखना जायज है, बाद रमजान इसकी कज़ा लाजिम है।
(2) जो औरत हमल से हो और रोजा में बच्चा को या अपनी जान को नुकसान पहुंचने का अंदेशा हो तो रोजा न रखे, बाद में कज़ा करे।
(3) जो औरत अपने या किसी गैर के बच्चा को दूध पिलाती है, अगर रोजा से बच्चा को दूध नहीं मिलता, तकलीफ पहुंचती है तो रोजा न रखे फिर कज़ा करे।
(4) मुसाफिर शरई (जो कम अज़ कम अड़तालीस मील के सफर की नीयत पर घर से निकला हो) इसके लिए इजाजत है कि रोजा न रखे, फिर अगर कुछ तकलीफ व दिक्कत न हो तो अफजल यह है कि सफर ही में रोजा रख ले अगर खुद अपने आप को या अपने साथियों को इससे तकलीफ हो तो रोजा न रखना ही अफजल है।
(5) बहालत रोजा सफर शुरू किया तो उस रोजा का पूरा करना जरूरी है और अगर कुछ खाने पीने के बाद सफर से वतन वापस आ गया तो बाकी दिन खाने पीने से एहतराज करे, और अगर अभी कुछ खाया पिया नहीं था कि वतन में ऐसे वक्त वापस आ गया जब कि रोजा की नीयत हो सकती हो यानी जवाल से डेढ़ घंटा कब्ल तो इस पर लाजिम है कि रोजा की नीयत कर ले।
(6) किसी को कत्ल की धमकी दे कर रोजा तोड़ने पर मजबूर किया जाए तो इसके लिए तोड़ देना जायज है फिर कज़ा कर ले।
(7) किसी बीमारी या भूख प्यास का इतना गलबा हो जाए कि किसी मुसलमान दीनदार माहिर तबीब या डॉक्टर के नजदीक जान का खतरा लाहिक हो तो रोजा तोड़ देना जायज; बल्कि वाजिब है और फिर उसकी कज़ा लाजिम होगी।
(8) औरत के लिए अय्याम हैज़ में और बच्चा की पैदाइश के बाद जो खून आता है यानी नफास उसके दौरान में रोजा रखना जायज नहीं। इन अय्याम में रोजा न रखे बाद में कज़ा करे। बीमार, मुसाफिर, हैज़ व नफास वाली औरत जिनके लिए रमजान में रोजा रखना और खाना पीना जायज है उन को भी लाजिम है कि रमजान का एहतराम करें, सब के सामने खाते पीते न फिरें।

वल्लाहू आलम बिस्सव़ाब