यह दुनिया अजब तमाशा गाह-ए-फ़ितना है, यहां कभी हक़ को बातिल के लिबास में पेश किया जाता है और कभी गुनाह को मोहब्बत की खुशबू में लपेट कर दिलों के बाज़ार में बेचा जाता है। यूं ही एक दिन जिसे अहले-ए-फ़िरंग ने वैलेंटाइन डे का नाम दिया, ज़माने के उफ़ुक़ पर सुर्ख़ गुलाब की सूरत तुलू होता है, मगर हक़ीक़त में यह गुलाब नहीं बल्कि तहज़ीब-ए-मग़रिब के खार दार बाग़ का वो फूल है जिसकी महक में ज़हर-ए-हलाहल पोशीदा है। यह दिन बाज़ाहिर इश्क़ व मोहब्बत का पयामबर बन कर आता है मगर इस के दामन में मोहब्बत नहीं बल्कि हवस की आवारगी है, इस के चेहरे पर मुस्कुराहट नहीं बल्कि शैतानी फ़रेब की दबीज़ नकाब है। मोहब्बत तो वो पाकीज़ा जज़्बा है जो दिल के निहां खानों में हया की चादर ओढ़ कर बैठता है, मोहब्बत तो वो नूर है जो निकाह की क़ंदील से रोशन होता है, मगर यह कैसा इश्क़ है जो बाज़ारों में बिकने लगे, यह कैसी उल्फ़त है जो बेपर्दगी की दहलीज़ पर दम तोड़ दे। वैलेंटाइन डे दरअसल मोहब्बत नहीं, यह नफ़्स की शहंशाही का जश्न है, यह शहवत के बुत कदे की रौनक है, यह वो मेला है जहां हया के परवाने जलते हैं और ईमान के चिराग़ बुझते हैं। यह त्योहार नौजवानों के दिलों में ऐसे ख्वाब बोता है जो ताबीर के बजाए तबाही देते हैं, यह उन की निगाहों में ऐसी चमक पैदा करता है जो आख़िरकार अश्क बन कर टपकती है। यह मग़रिब का वो तोहफ़ा है जिस की ज़ाहिरी रंगीनी में बातिन की तारीकी छुपी हुई है, यह वो साज़ है जिस की लय में खुशी नहीं बल्कि रूह की शिकस्तगी है। अहले-ए-ईमान जानते हैं कि मोहब्बत का असल मफ़हूम सिर्फ़ सुर्ख़ गुलाब नहीं बल्कि दिल की पाकीज़गी है, सिर्फ़ तोहफ़े नहीं बल्कि इफ़्फ़त की पासबानी है। वैलेंटाइन डे दर हक़ीक़त मोहब्बत के नाम पर अख़लाक़ की शिकस्त, हया की मौत और तहज़ीब की ग़ारत गरी का उनवान है, और सच तो यह है कि यह दिन मोहब्बत का नहीं, यह फ़रेब-ए-मोहब्बत का दिन है, यह गुलाब का नहीं, यह खार का दिन है, यह वस्ल का नहीं, यह ज़वाल का दिन है। अल्लाह हमें इस फ़ितना-ए-रंग-ओ-बू से महफूज़ रखे और मोहब्बत को इस के असल मक़ाम हया, इफ़्फ़त और शरीयत की रोशनी में कायम रखे, आमीन।
मोहम्मद मुसअब पालनपुरी