इससे इस बात का पता चला कि मियां बीवी में अगर किसी बात पर कोई तल्ख़ कलामी हो जाए तो औरत को उस वक़्त तक नहीं सोना चाहिए जब तक कि एक दूसरे से राज़ी ना हो जाएं। हदीस पाक में आया है कि खाविंद नाराज़ होकर सो गया और बीवी ने उसको मनाने की कोशिश ना की तो जब तक वो कोशिश नहीं करेगी अल्लाह ताला के फ़रिश्ते उस पर लानत करेंगे।



आज कल मॉडर्न क़िस्म की बीवियां ज़रा सी बात पर मुंह बसूर कर सो जाती हैं। वो समझती हैं कि अब खाविंद खुद ही हमें मनाएगा। लेकिन शरीयत कह रही है कि बीवी खाविंद को मनाए। और ये क्या चाहती हैं कि खाविंद हमें मनाए और फिर हम जन्नत में भी जाएं। सुभान अल्लाह। बात तो शरीयत की चलती है, हमारी बात तो नहीं चलती। तो शरीयत कह रही है कि जब खाविंद नाराज़ हो या बीवी नाराज़ हो तो बीवी को पहल करनी चाहिए।



इसका ये मतलब भी नहीं कि भई अगर किसी जायज़ बात पर बीवी को गुस्सा आ गया तो खाविंद अकड़ कर बैठ जाए। नहीं। खाविंद को भी ये कहा जाएगा कि भई अव्वल तो तुमने ऐसी बात ही क्यों की जिससे अपनी बीवी का दिल दुखाया, अपनी बीवी को गुस्सा दिलाया, जो हर वक़्त तुम से मोहब्बत करने वाली है। जो तुम्हारी अपनी है। अरे अपनों को गुस्सा दिलाते हो ? और अगर गुस्सा दिला दिया है तो अब बीवी को खुश करना भी तुम्हारी ज़िम्मेदारी है। तो मर्द को भी पूछा जाएगा। मगर इस हदीस पाक में रसूल अल्लाह ﷺ ने औरत को कहा लिहाज़ा औरतों को दिल में ये बात तस्लीम कर लेनी चाहिए कि हमें अव्वल तो ज़िंदगी में खाविंद से ऐसा मामला कभी नहीं आने देना कि वो हम से और हम उन से गुस्सा हों। अगर खुदा न खास्ता ऐसी बात आ गई तो खाविंद को मनाने में पहल करनी है। तब हम जन्नत में जाने की मुस्तहिक़ बनेंगी।



हदीस पाक में तो कहा गया कि ये अपना हाथ खाविंद के हाथ में देकर कहे, मैं नहीं सोऊंगी जब तक आप मुझ से राज़ी नहीं हो जायेंगें। लेकिन आज कल की औरतों की ये हालत है कि ज़रा सा गुस्सा में आ जाएं, खाविंद मनाने के लिए अगर हाथ भी बढ़ाए तो हाथ झटक देती हैं। कहती हैं मुझे हाथ मत लगाइए। अब बताएं जो खाविंद को ये कहेगी कि हाथ मत लगाइए, फिर क्या ये जन्नती औरत की निशानी है या किसी और औरत की? तो इस बात को समझने की कोशिश कीजिए और अपनी "मैं" को ख़त्म करके जिस तरह हदीस पाक में फ़रमाया गया उसके मुताबिक़ बनने की कोशिश कीजिए।



अल्लाह ताला तमाम मुसलमानों को हदीस के मुताबिक़ ज़िंदगी गुज़ारने की तौफ़ीक़ अता फरमाए आमीन या रब्बुल आलमीन