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 *दिन में चिराग़ लेकर फिरने वाले व्यक्ति का वाक़या* 


 एक व्यक्ति दिन की रोशनी में चिराग़ लेकर बाज़ार के अतराफ़ व जवानिब में फिर रहा था।

किसी व्यक्ति ने उसे इस हरकत पर टोकते हुए कहा कि मुझे क्या हो गया है कि दिन की रोशनी में चिराग़ की ज़रूरत पेश आ रही है?

उसने कहा कि मैं हर तरफ़ आदमी ढूँढता हूँ, मुझे कोई आदमी नहीं मिलता।

उसने जवाब दिया कि आदमियों से तो यह बाज़ार भरा पड़ा है और तू कहता है कि मुझे कोई आदमी नज़र नहीं आ रहा।

उसने साइल को वज़ाहत से जवाब देते हुए कहा कि बाज़ार में कोई मर्द नहीं है, सिर्फ़ सूरत मर्द की सी है, यह सब रोटी और ख़्वाहिशात-ए-नफ़सानिया के मारे हुए हैं।

उसने मज़ीद वज़ाहत करते हुए कहा कि इस बाज़ार में जो इंसान दिखाई देते हैं, यह सब इंसानी सिफ़ात और आदमियत के ख़िलाफ़ हैं। यह आदमी नहीं हैं, सिर्फ़ आदमियत के ग़िलाफ़ में नज़र आ रहे हैं।

आदमी बनने के लिए सिफ़ात-ए-आदमी ज़रूरी हैं। फिर उसने मिसाल देते हुए समझाया: देखो! अगर ऊद, जो एक ख़ुशबूदार लकड़ी है, इस में ऊद की ख़ुशबू न हो तो फिर इस में और आम ईंधन की लकड़ियों में क्या फ़र्क़ है? ऐसे बग़ैर ख़ुशबू वाले ऊद को भी ईंधन ही कहना चाहिए।

अब असल मौज़ू की तरफ़ आते हुए उसने कहा कि आदमियत और इंसानियत गोश्त और चर्बी और पोस्त (खाल) का नाम नहीं है। आदमियत उन सिफ़ात और अख़लाक़ व आमाल का नाम है जिन से अल्लाह तआला की रज़ा हासिल होती है।

अगर आदमियत सिर्फ़ इंसानी सूरत का नाम हो तो मुहम्मद ﷺ और अबू जहल यकसाँ होते, हालान कि ऐसा हरगिज़ नहीं है।

गुलिस्तान-ए-रूमी

सबक़:
हक़ीक़ी आदमियत सिर्फ़ जिस्म या शक्ल का नाम नहीं, बल्कि अच्छे अख़लाक़, नेक आमाल और अल्लाह की रज़ा हासिल करने में है।
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