"खुदा ने आज तक उस क़ौम की हालत नहीं बदली
न हो जिस को ख़याल आप अपनी हालत के बदलने का"
इन्सानी तारीख़ गवाह है कि मेहनत करने वाले लोग कभी नाकाम नहीं होते। वही अक़वाम दुनिया में तरक़्क़ी करती हैं जो काम को इबादत समझती हैं, और मेहनत को ज़िंदगी का लाज़िमी जुज़ बनाती हैं। मेहनत इंसान को इज़्ज़त, मक़ाम और कामयाबी की बुलन्दियों तक ले जाती है।
मेहनत एक ऐसी कुंजी है जो बंद क़िस्मतों को भी खोल देती है। कामयाबी का कोई शॉर्ट कट नहीं, बल्कि ये सिर्फ़ मुसलसल जद्दोजहद, इस्तिक़ामत और क़ुर्बानी से ही हासिल होती है। जैसे फूल खिलने से पहले कांटों का सामना करते हैं, वैसे ही कामयाबी भी मेहनत के बाद ही मयस्सर आती है।
> "मेहनत से घबरा कर कभी पीछे न हटो
कांटे वही चुनते हैं जो फूलों की चाह रखते हैं
तहसील-ए-इल्म के लिए मेहनत सब से ज़्यादा ज़रूरी है। जो तालिबे इल्म सुस्ती छोड़ कर दिलजमी से पढ़ता है, वही एक दिन डॉक्टर, इंजीनियर, आलिम, मुफ़्ती या लीडर बनता है। यही वो मेहनत है जो मामूली इंसान को ग़ैर मामूली बना देती है।
> "जो थक के बैठ गए मंज़िल के पास आ कर
वो क्या समझेंगे मज़ा कामरानी का
क़ुरान-ए-मजीद में अल्लाह ताला ने फ़रमाया:
> ﴿وَأَنْ لَيْسَ لِلْإِنسَانِ إِلَّا مَا سَعَىٰ﴾
तर्जुमा: "और ये कि इंसान को वही कुछ मिलेगा जिस की उस ने कोशिश की।"
(सूरۃ النجم، آیت 39)
ये आयत इस बात का सबूत है कि अल्लाह ताला खुद मेहनत की क़द्र फ़रमाता है, और बंदे की कोशिश रायगां नहीं जाती।
इसी तरह, इंसान की फितरी कमज़ोरी की तरफ़ इशारा करते हुए फ़रमाया:
> ﴿وَكَانَ ٱلْإِنسَـٰنُ عَجُولًۭا﴾
तर्जुमा: "और इंसान बड़ा ही जल्द बाज़ है।"
(सूरۃ الإسراء، آیت 11)
लिहाज़ा हमें जल्द बाज़ी की बजाए सब्र, साबित क़दमी और मेहनत का रास्ता इख़्तियार करना चाहिए
अगर एक छोटी सी चींटी मुसलसल गिर कर उठती है, और बा आखिर अपनी ग़िज़ा को मंज़िल तक ले जाती है, तो हम क्यों हार मानें? हम तो अशरफ़ उल मख़लूक़ात हैं, हमें अपनी सलाहियतों को पहचान कर कामयाबी की तरफ़ बढ़ना चाहिए।
> "यही क़ानून-ए-फ़ितरत है, यही पैग़ाम-ए-हस्ती है
जो गिर के फिर संभल जाए, वही इंसां की हस्ती है ٌ
आखिर में यही कहूँगी कि मेहनत कामयाबी की सीढ़ी है। दुनिया में वही लोग इज़्ज़त पाते हैं जो दिन रात मेहनत करते हैं। हमें चाहिए कि हम अपनी ज़िंदगी का मक़सद तय करें, सुस्ती और काहिली से बचें, और हर मैदान में मेहनत को अपना हथियार बनाएं।
अल्लाह ताला हम सब को ज़्यादा से ज़्यादा मेहनत करने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए। आमीन, बजाहे सैय्यद उल मुरसलीन सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम