शब-ए-बरात

शब-ए-बरात इस्लामी तक़वीम की एक अज़ीम और बाबरकत रात है जो शाबान-उल-मुअज़्ज़म की पंद्रहवीं रात को आती है। इस रात को अल्लाह ताला की खास रहमत, मग़फ़िरत और बख़्शिश का दरवाज़ा खुला रहता है। हदीस-ए-मुबारका में आया है कि इस रात अल्लाह ताला बेशुमार बंदों की मग़फ़िरत फरमाता है। मुसलमान इस रात नवाफिल अदा करते हैं, कुरान-ए-करीम की तिलावत करते हैं, दुआ और इस्तग़फ़ार में मशगूल रहते हैं और अपने गुनाहों पर निदामत का इज़हार करते हैं। शब-ए-बरात हमें तौबा, इस्लाह-ए-नफ़्स और अल्लाह से कुर्बत हासिल करने का पैग़ाम देती है।


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फ़ज़ाइल-ए-जुमा

जुमा का दिन तमाम दिनों का सरदार है और इस्लाम में इसे खास अहमियत हासिल है। इस दिन की एक बड़ी फ़ज़ीलत नमाज़-ए-जुमा है जो मुसलमानों के लिए फ़र्ज़ है। हदीस-ए-नबवी ﷺ के मुताबिक जुमा के दिन एक ऐसी घड़ी होती है जिसमें मांगी गई दुआ कुबूल होती है। इस दिन दरूद-ए-शरीफ की कसरत, कुरान-ए-करीम की तिलावत और सूरह कहफ़ की तिलावत का खास एहतिमाम किया जाता है। जुमा का दिन मुसलमानों के लिए इज्तिमा, उख़ुवत और रूहानी ताज़गी का ज़रिया है।