शब-ए-बरात — मग़फ़िरत व नजात की रूह परवर रात
मुफ़्ती मुहम्मद इब्राहीम ग़फ़्फ़ारी
बानी व मोहतिमम मदरसा अबूज़र ग़फ़्फ़ारी रज़ी अल्लाहु अन्हु
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शाबान-उल-मुअज़्ज़म की पंद्रहवीं शब को शब-ए-बरात कहा जाता है; यानी वो बाबरकत रात जिसमें रहमत-ए-इलाही जोश में आती है और गुनाहों से नजात के फ़ैसले सादिर होते हैं। ये कोई बेबुनियाद तसव्वुर नहीं, बल्कि तक़रीबन दस सहाब-ए-किराम रज़ी अल्लाहु अन्हुम से इस मुबारक रात के फ़ज़ाइल में अहादीस मनक़ूल हैं, जो इसकी अज़मत व रिफ़अत पर शाहिद हैं।
हज़रत आइशा रज़ी अल्लाहु अन्हा फ़रमाती हैं कि एक मर्तबा शाबान की पंद्रहवीं शब मैंने नबी करीम ﷺ को अपनी आराम गाह पर मौजूद न पाया। तलाश में निकली तो देखा कि आप ﷺ जन्नत-उल-बक़ीअ में तशरीफ़ फ़रमा हैं। आप ﷺ ने फ़रमाया:
“ये शाबान की पंद्रहवीं रात है; इस रात अल्लाह तआला आसमान-ए-दुनिया पर नुज़ूल फ़रमाते हैं और क़बीला बनी कल्ब की बकरियों के बालों की तादाद से भी ज़्यादा गुनाहगारों की मग़फ़िरत फ़रमाते हैं।”
एक दूसरी रिवायत में आया है कि इसी रात आइंदा साल पैदा होने वालों और वफ़ात पाने वालों के नाम लिख दिए जाते हैं, बंदों के आमाल उठाए जाते हैं और उनके रिज़्क़ के फ़ैसले नाज़िल होते हैं।
इसी तरह एक रिवायत ये भी बताती है कि इस अज़ीम-उश-शान रात में उमुमी मग़फ़िरत का एलान होता है, मगर चंद बदबख़्त अफ़राद इस सआदत से महरूम रहते हैं: मुशरिक, वालिदैन का नाफ़रमान, दिलों में कीना रखने वाला, शराब नोश, नाहक़ क़ातिल, टख़नों से नीचे लिबास लटकाने वाला और चुग़ल ख़ोर—ये सब इस वक़्त तक इस रहमत के मुस्तहिक़ नहीं बनते, जब तक अपने गुनाहों से सच्ची तौबा न कर लें।
हज़रत अली रज़ी अल्लाहु अन्हु से मनक़ूल है कि इस रात इबादत का एहतिमाम करो और इसके दिन में रोज़ा रखो। इस रात सूरज ग़ुरूब होते ही अल्लाह तआला अपनी मख़लूक़ की तरफ़ खुसूसी तवज्जो फ़रमाते हैं और निदा दी जाती है:
“है कोई मग़फ़िरत चाहने वाला कि मैं उसे बख़्श दूँ? है कोई रिज़्क़ में वुसअत माँगने वाला? है कोई मुसीबत ज़दा जो नजात चाहता हो?”
इन अहादीस-ए-मुबारका, सहाबा-ए-किराम रज़ी अल्लाहु अन्हुम और सलफ़-ए-सालिहीन रहिमहुम अल्लाह के अमल से ये बात वाज़ेह होती है कि शब-ए-बरात में बिलखुसूस तीन आमाल का एहतिमाम मसनून व मुस्तहसन है:
अव्वल: मर्दों के लिए दुआ और ईसाल-ए-सवाब की नियत से क़ब्रिस्तान जाना। ताहम ये बात मलहूज़ रहे कि नबी करीम ﷺ से पूरी हयात-ए-तैयबा में शब-ए-बरात के मौक़े पर जन्नत-उल-बक़ीअ जाना सिर्फ़ एक मर्तबा साबित है। लिहाज़ा कभी इत्तिबा-ए-सुन्नत की नियत से जाना बाइस-ए-अजर है, मगर इसे हर साल लाज़िम समझना, फूल चढ़ाना, चादरें डालना और चराग़ाँ करना दुरुस्त नहीं। दीन का हुस्न यही है कि जो चीज़ जिस दर्जे में साबित हो, उसे उसी दर्जे में रखा जाए।
दुव्वम: इस रात नवाफ़िल, तिलावत-ए-क़ुरान और अज़कार का एहतिमाम। ये याद रहे कि नफ़्ल इबादत ख़ल्वत की इबादत है; शोर व हंगाम, मख़सूस इज्तिमाआत और जमाअत की पाबंदी इसके मिज़ाज के ख़िलाफ़ है। ये रातें मेले ठेलों के लिए नहीं बल्कि गोश-ए-तन्हाई में रब से लौ लगाने के लिए अता होती हैं—इन क़ीमती लम्हों को ग़फ़लत की नज़र न किया जाए।
सुव्वम: पंद्रह शाबान के दिन रोज़ा रखना मुस्तहब है; एक तो हज़रत अली रज़ी अल्लाहु अन्हु की रिवायत की बिना पर, और दूसरे इस वजह से कि नबी करीम ﷺ हर माह अय्याम-ए-बीज़ (१३, १४, १५) के रोज़ों का एहतिमाम फ़रमाया करते थे। इस नियत से रोज़ा रखना मूजिब-ए-अजर व सवाब है।
रहा इस रात पटाख़े चलाना, आतिश बाज़ी करना, हलवे की रस्म या दीगर फ़ुज़ूल व इसराफ़ पर मबनी उमूर—तो ये सब ख़ुराफ़ात में दाख़िल हैं। शैतान इन्ही ला हासिल मशग़ाल में उलझा कर इंसान को मग़फ़िरत, तौबा और इबादत से महरूम करना चाहता है, और बदक़िस्मती से अक्सर लोग इसी फ़रेब में आ जाते हैं।
बहर कैफ़, शब-ए-बरात की फ़ज़ीलत एक मुस्लिम हक़ीक़त है, और सलफ़-ए-सालिहीन ने इस रात को ग़नीमत जान कर इससे भरपूर फ़ायदा उठाया है। सआदत इसी में है कि हम भी इख़्लास, एतदाल और इत्तिबा-ए-सुन्नत के साथ इस रात को अल्लाह से लौ लगाने, दिलों को साफ़ करने और ज़िंदगी को सँवारने का ज़रिया बनाएँ।
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