ज़ुल्म न करने पर ज़ालिम, जुर्म न करने पर मुजरिम, अच्छा करने पर बुरा, ग़लती ना करने पर क़ुसूरवार, वफ़ा करने पर बेवफ़ा, मोहब्बत से पेश आने पर मग़रूर होने का टैग जब लगता है ना तो दिल बहुत बेज़ार हो जाया करते हैं। इतने कि फिर सफ़ाइयाँ देने को भी दिल नहीं चाहता, इतने कि ना नज़र अंदाज़ किया जाता है ना हंसी आती है और कभी कभी तो तकलीफ़ भी नहीं होती यूं कि सारी हस्सियात ख़त्म हो जाती हैं।ये वो औक़ात हैं जिस में कुछ अल्लाह को भूल जाते हैं और कुछ अल्लाह के क़रीब और इन आज़माइशों को जो अल्लाह के अहकाम पर चल कर पार कर ले वही साबिर है।
इस वक़्त सब्र कर के ख़ामोश हो जाओ जब लोगों के अल्फ़ाज़ उन के मुंह पर मार देने वाले हों।
और सब्र की एक बात बहुत अच्छी है जब ये आ जाये तो फिर किसी की तलब नहीं रहती।