बज़्म-ए-दास्तान गोयां और हलक़ा अरबाब-ए-ज़ौक़
बज़्म-ए-दास्तान गोयां में अफ़साना निगारों के साथ साथ शोअरा की तादाद भी काफ़ी थी जिस की वजह से इस का नाम बज़्म-ए-दास्तान गोयां से हलक़ा अरबाब-ए-ज़ौक़ रख दिया गया। नाम की तबदीली के साथ साथ सिर्फ़ मिल बैठने का बहाना न रहा बल्कि इस के वाज़ेह मक़ासिद भी मुतअय्यन होने लगे।
मौज़ूआत की फ़हरिस्त
बज़्म-ए-दास्तान गोयां और हलक़ा अरबाब-ए-ज़ौक़
तरक़्क़ी पसंद तहरीक का पस मंज़र
तरक़्क़ी पसंद मुसन्निफ़ीन का मंसूर
हवाला जात
इस के मक़ासिद दर्ज ज़ैल तय पाए:
उर्दू ज़बान की तरवीज व इशाअत
नौजवान लिखने वालों की तालीम व तफ़रीह
उर्दू लिखने वालों के हुक़ूक़ की हिफ़ाज़त
तनक़ीद-ए-अदब में ख़ुसूस और बे तकल्लुफ़ी पैदा करना।
उर्दू अदब में सहाफ़त के नासाज़गार माहौल को साफ़ करना।
मक़ासिद का चौथा नुक्ता तनक़ीद के मुताल्लिक़ है और यही हमारा मौज़ू भी है। यहां इस बात को वाज़ेह करना ज़रूरी है कि तनक़ीद में ख़ुसूस और बे तकल्लुफ़ी से क्या मुराद है? क्या इस में तरक़्क़ी पसंद तहरीक की तनक़ीद में ही ख़ुसूस और बे तकल्लुफ़ी को शामिल करना था या तनक़ीदी नज़रियात भी मुख़्तलिफ़ थे। इस बात का जायज़ा लेने से पहले इस वक़्त के अदबी मंज़रनामे का मुख़्तसर बयान ज़रूरी है।
तरक़्क़ी पसंद तहरीक का पस मंज़र
सन 1935ء में पैरिस में एक अदबी कान्फ्रेंस मुनअक़िद हुई जिस में दुनिया के बड़े बड़े अदीब शरीक हुए। यह कान्फ्रेंस बुनियादी तौर पर अदब के तहफ़्फ़ुज़ और नई ज़रूरतों के लिए मुनअक़िद हुई। जिस में गोरकी और थॉमस मान जैसे शहरह आफ़ाक़ मुसन्निफ़ीन की सोच और फ़िक्र शामिल थी। इस कान्फ्रेंस में हिंदुस्तान से सज्जाद ज़हीर और मुल्क राज आनंद शरीक हुए।
इन दोनों मुसन्निफ़ीन ने लंदन में तरक़्क़ी पसंद मुसन्निफ़ीन की अंजुमन क़ायम की और एक एलान नामा भी जारी किया। इस अंजुमन ने लखनऊ में अप्रैल 1936ء को पहली कान्फ्रेंस मुनअक़िद की जिस की सदारत मशहूर अफ़साना निगार मुंशी प्रेम चंद ने की। इस कान्फ्रेंस में तरक़्क़ी पसंद मुसन्निफ़ीन का मंसूर पढ़ कर सुनाया गया।
तरक़्क़ी पसंद मुसन्निफ़ीन का मंसूर
जो कि दर्ज ज़ैल है:
इस वक़्त हिंदुस्तानी समाज में इंक़िलाबी तबदीलियाँ रुनुमा हो रही हैं और जहां बलब रिजअत परस्ती जिस की मौत लाज़मी और यक़ीनी है अपनी ज़िंदगी की मुद्दत बढ़ाने के लिए दीवाना वार हाथ पाऊँ मार रही है। पुराने तहज़ीबी ढांचों की शिकस्त व रेख़्त के बाद से अब तक हमारा अदब एक गुना फ़रारियत का शिकार रहा है और ज़िंदगी के हक़ाइक़ से गुरेज़ कर के खोखली रोमानियत और बे बुनियाद तसव्वुर परस्ती में पनाह ढूँडता रहा है। जिस के बाइस इस की रगों में नया ख़ून आना बंद हो गया है और अब शदीद हैयत परस्ती और गुमراہ कुन मंफ़ी रुझानत का शिकार हो गया है।
हिंदुस्तानी अदीबों का फ़र्ज़ है कि वह हिंदुस्तानी ज़िंदगी में रुनुमा होने वाली तबदीलियों का भरपूर इज़हार करें और अदब में साइंसी अक़्लियत पसंदी को फ़रोग़ देते हुए तरक़्क़ी पसंद तहरीक की हिमायत करें उन का फ़र्ज़ है कि वह इस क़िस्म के अंदाज़-ए-तनक़ीद को रिवाज दें जिस से ख़ानदान, मज़हब, जिन्स, जंग और समाज के बारे में रिजअत पसंदी और माज़ी परस्ती के ख़्यालात की रोक थाम की जा सके उन का फ़र्ज़ है कि वह ऐसे अदबी रुझानत को नशो व नुमा पाने से रोकें जो फ़िर्क़ा परस्ती, नस्ली तास्सुब और इंसानी इस्तिहसाल की हिमायत करते हैं।
हमारी अंजुमन का मक़सद अदब और आर्ट को इन रिजअत परस्त तबक़ों के चंगल से नजात दिलाना है जो अपने साथ अदब और फ़न को भी इनहितात के गड्ढों में धकेलना चाहते हैं। हम अदब को अवाम के क़रीब लाना चाहते हैं और इसे ज़िंदगी की अक्कासी और मुस्तक़बिल की तामीर का मुअस्सिर ज़रीया बनाना चाहते हैं। हम अपने आप को हिंदुस्तानी तहज़ीब की बेहतरीन रवायत का वारिस समझते हैं और इन रवायत को अपनाते हुए हम अपने मुल्क में हर तरह की रिजअत पसंदी के ख़िलाफ़ जद्दोजहद करेंगे जो हमारे वतन को एक नई और बेहतरीन ज़िंदगी की राह दिखाए।
इस काम में हम अपने और ग़ैर मुल्कों के तहज़ीब व तमद्दुन से फ़ायदा उठाएंगे। हम चाहते हैं कि हिंदुस्तान का नया अदब हमारी ज़िंदगी के बुनियादी मसाइल को अपना मौज़ू बनाए। यह भूख, इफ़लास, समाजी पस्ती और ग़ुलामी के मसाइल हैं, हम इन तमाम आसार की मुख़ालिफ़त करेंगे जो हमें लाचारी, सुस्ती और तव्वुहम परस्ती की तरफ़ ले जाते हैं। हम इन तमाम बातों को जो हमारी क़ुव्वत-ए-तनक़ीद को उभारती हैं और रस्मों और इदारों को अक़्ल की कसौटी पर रखती हैं तबदीली और तरक़्क़ी का ज़रीया समझ कर क़बूल करते हैं।
हलक़ा अरबाब-ए-ज़ौक़ के क़याम के सिर्फ़ तीन साल पहले न सिर्फ़ पाकिस्तानी अदब में बल्कि आलमी सतह पर अदब में यह एक ऐसी तहरीक थी जिस ने तमाम साबिक़ा अदबी नज़रियात को नज़र अंदाज़ करते हुए इंसान के बुनियादी मसाइल भूख, इफ़लास, समाजी पस्ती और ग़ुलामी को अदब का मौज़ू बनाया।
बुनियादी तौर पर यह लोग कार्ल मार्क्स के नज़रियात से मुतास्सिर थे और सरमाया दाराना निज़ाम के ज़ालिम शिकंजों से जकड़े हुए बे बस इंसानों की आवाज़ बन कर आलमी ज़मीर को झिंझोड़ना चाहते थे मगर देखना यह है कि क्या असनाफ़-ए-अदब को इस मक़सद के लिए इस्तेमाल करना दुरुस्त था या यह कि अगर ऐसा किया जाए तो अदब, अदब रहे गा या यह कोई और शक्ल इख़्तियार कर जाए गा।
मुंशी प्रेम चंद जो इस कान्फ्रेंस की सदारत कर रहे थे उन्होंने इस के हक़ में सदारती अल्फ़ाज़ कहे:
"जिस अदब से हमारा ज़ौक़-ए-सही बेदार न हो, रूहानी और ज़ेहनी तस्कीन न मिले, हम में क़ुव्वत और हरकत पैदा न हो, हमारा जज़्बा-ए-हुस्न न जागे, जो हम में सच्चा इरादा और मुश्किलात पर फ़तह पाने के लिए सच्चा इस्तिक़लाल न पैदा करे, वह आज हमारे लिए बेकार है।"
इस पर अदब का इतलाक़ नहीं हो सकता अदब आर्टिस्ट के रोमानी तवाज़ुन की ज़ाहिरी सूरत है और हम आहंगी हुस्न की तख़लीक़ करती है। तख़रीब नहीं, अदब हमारी ज़िंदगी को फ़ित्री और आज़ाद बनाता है, इस की बदौलत नफ़स की तहज़ीब होती है।
यह इस का मक़सद-ए-उल्या है। अमल की क़ुव्वत पर ज़ोर और मुश्किलात पर क़ाबू पाने का जज़्बा इस तहरीक का मुद्दआ ठहरा। इस तहरीक को बड़े बड़े अदीबों ने सराहा और इस का साथ देने के लिए कमर बस्ता हो गए। इन में डॉक्टर अब्दुल हक़, हसरत मोहानी, जोश मलीह आबादी, प्रेम चंद, क़ाज़ी अब्दुल ग़फ़्फ़ार, मजनूं गोरखपुरी, डॉक्टर आबिद हुसैन, नियाज़ फ़तह पूरी, सागर सिद्दीक़ी वग़ैरा शामिल हैं।
हवाला जात
मकाले का उनवान: उर्दू तनक़ीद और हलक़ा अरबाब-ए-ज़ौक़ (70 की दहाई तक)
मकाला बराए: पी एच डी उर्दू
मकाला निगार: ख़ालिद हुसैन शाह
निगरानी मकाला: डॉक्टर रशीद अमजद
यूनिवर्सिटी: नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ़ मॉडर्न लैंग्वेजेज़, इस्लामाबाद
सफ़हा नंबर: 38-39

बज़्म-ए-दास्तान गोयां और हलका अरबाब-ए-ज़ौक
बज़्म-ए-दास्तान गोयां में अफ़साना निगारों के साथ साथ शोअरा की तादाद भी काफ़ी थी जिस की वजह से इस का नाम बज़्म-ए-दास्तान गोयां से हलका अरबाब-ए-ज़ौक रख दिया गया। नाम की तबदीली के साथ साथ सिर्फ़ मिल बैठने का बहाना न रहा बल्कि इस के वाज़ेह मक़ासिद भी मुतअय्यन होने लगे।
मौज़ूआत की फ़हरिस्त
बज़्म-ए-दास्तान गोयां और हलका अरबाब-ए-ज़ौक
तरक़्क़ी पसंद तहरीक का पस मंज़र
तरक़्क़ी पसंद मुसन्निफ़ीन का मंसूर
हवाला जात
इस के मक़ासिद दर्ज ज़ैल तय पाए:
उर्दू ज़बान की तरवीज व इशाअत
नौजवान लिखने वालों की तालीम व तफ़रीह
उर्दू लिखने वालों के हुक़ूक़ की हिफ़ाज़त
तनक़ीद-ए-अदब में ख़ुसूस और बे तकल्लुफ़ी पैदा करना।
उर्दू अदब में सहाफ़त के नासाज़गार माहौल को साफ़ करना।
मक़ासिद का चौथा नुक्ता तनक़ीद के मुताल्लिक़ है और यही हमारा मौज़ू भी है। यहां इस बात को वाज़ेह करना ज़रूरी है कि तनक़ीद में ख़ुसूस और बे तकल्लुफ़ी से क्या मुराद है? क्या इस में तरक़्क़ी पसंद तहरीक की तनक़ीद में ही ख़ुसूस और बे तकल्लुफ़ी को शामिल करना था या तनक़ीदी नज़रियात भी मुख़्तलिफ़ थे। इस बात का जायज़ा लेने से पहले इस वक़्त के अदबी मंज़रनामे का मुख़्तसर बयान ज़रूरी है।
तरक़्क़ी पसंद तहरीक का पस मंज़र
सन 1935ء में पैरिस में एक अदबी कान्फ्रेंस मुनअक़िद हुई जिस में दुनिया के बड़े बड़े अदीब शरीक हुए। यह कान्फ्रेंस बुनियादी तौर पर अदब के तहफ़्फ़ुज़ और नई ज़रूरतों के लिए मुनअक़िद हुई। जिस में गोरकी और थॉमस मान जैसे शहरह आफ़ाक़ मुसन्निफ़ीन की सोच और फ़िक्र शामिल थी। इस कान्फ्रेंस में हिंदुस्तान से सज्जाद ज़हीर और मुल्क राज आनंद शरीक हुए।
इन दोनों मुसन्निफ़ीन ने लंदन में तरक़्क़ी पसंद मुसन्निफ़ीन की अंजुमन क़ायम की और एक एलान नामा भी जारी किया। इस अंजुमन ने लखनऊ में अप्रैल 1936ء को पहली कान्फ्रेंस मुनअक़िद की जिस की सदारत मशहूर अफ़साना निगार मुंशी प्रेम चंद ने की। इस कान्फ्रेंस में तरक़्क़ी पसंद मुसन्निफ़ीन का मंसूर पढ़ कर सुनाया गया।
तरक़्क़ी पसंद मुसन्निफ़ीन का मंसूर
जो कि दर्ज ज़ैल है:
इस वक़्त हिंदुस्तानी समाज में इंक़िलाबी तबदीलियाँ रुनुमा हो रही हैं और जहां बलब रिजअत परस्ती जिस की मौत लाज़मी और यक़ीनी है अपनी ज़िंदगी की मुद्दत बढ़ाने के लिए दीवाना वार हाथ पाऊँ मार रही है। पुराने तहज़ीबी ढांचों की शिकस्त व रेख़्त के बाद से अब तक हमारा अदब एक गुना फ़रारियत का शिकार रहा है और ज़िंदगी के हक़ाइक़ से गुरेज़ कर के खोखली रोमानियत और बे बुनियाद तसव्वुर परस्ती में पनाह ढूँडता रहा है। जिस के बाइस इस की रगों में नया ख़ून आना बंद हो गया है और अब शदीद हैयत परस्ती और गुमراہ कुन मंफ़ी रुझानत का शिकार हो गया है।
हिंदुस्तानी अदीबों का फ़र्ज़ है कि वह हिंदुस्तानी ज़िंदगी में रुनुमा होने वाली तबदीलियों का भरपूर इज़हार करें और अदब में साइंसी अक़्लियत पसंदी को फ़रोग़ देते हुए तरक़्क़ी पसंद तहरीक की हिमायत करें उन का फ़र्ज़ है कि वह इस क़िस्म के अंदाज़-ए-तनक़ीद को रिवाज दें जिस से ख़ानदान, मज़हब, जिन्स, जंग और समाज के बारे में रिजअत पसंदी और माज़ी परस्ती के ख़्यालात की रोक थाम की जा सके उन का फ़र्ज़ है कि वह ऐसे अदबी रुझानत को नशो व नुमा पाने से रोकें जो फ़िर्क़ा परस्ती, नस्ली तास्सुब और इंसानी इस्तिहसाल की हिमायत करते हैं।
हमारी अंजुमन का मक़सद अदब और आर्ट को इन रिजअत परस्त तबक़ों के चंगल से नजात दिलाना है जो अपने साथ अदब और फ़न को भी इनहितात के गड्ढों में धकेलना चाहते हैं। हम अदब को अवाम के क़रीब लाना चाहते हैं और इसे ज़िंदगी की अक्कासी और मुस्तक़बिल की तामीर का मुअस्सिर ज़रीया बनाना चाहते हैं। हम अपने आप को हिंदुस्तानी तहज़ीब की बेहतरीन रवायत का वारिस समझते हैं और इन रवायत को अपनाते हुए हम अपने मुल्क में हर तरह की रिजअत पसंदी के ख़िलाफ़ जद्दोजहद करेंगे जो हमारे वतन को एक नई और बेहतरीन ज़िंदगी की राह दिखाए।
इस काम में हम अपने और ग़ैर मुल्कों के तहज़ीब व तमद्दुन से फ़ायदा उठाएंगे। हम चाहते हैं कि हिंदुस्तान का नया अदब हमारी ज़िंदगी के बुनियादी मसाइल को अपना मौज़ू बनाए। यह भूख, इफ़लास, समाजी पस्ती और ग़ुलामी के मसाइल हैं, हम इन तमाम आसार की मुख़ालिफ़त करेंगे जो हमें लाचारी, सुस्ती और तव्वुहम परस्ती की तरफ़ ले जाते हैं। हम इन तमाम बातों को जो हमारी क़ुव्वत-ए-तनक़ीद को उभारती हैं और रस्मों और इदारों को अक़्ल की कसौटी पर रखती हैं तबदीली और तरक़्क़ी का ज़रीया समझ कर क़बूल करते हैं।
हलक़ा अरबाब-ए-ज़ौक़ के क़याम के सिर्फ़ तीन साल पहले न सिर्फ़ पाकिस्तानी अदब में बल्कि आलमी सतह पर अदब में यह एक ऐसी तहरीक थी जिस ने तमाम साबिक़ा अदबी नज़रियात को नज़र अंदाज़ करते हुए इंसान के बुनियादी मसाइल भूख, इफ़लास, समाजी पस्ती और ग़ुलामी को अदब का मौज़ू बनाया।
बुनियादी तौर पर यह लोग कार्ल मार्क्स के नज़रियात से मुतास्सिर थे और सरमाया दाराना निज़ाम के ज़ालिम शिकंजों से जकड़े हुए बे बस इंसानों की आवाज़ बन कर आलमी ज़मीर को झिंझोड़ना चाहते थे मगर देखना यह है कि क्या असनाफ़-ए-अदब को इस मक़सद के लिए इस्तेमाल करना दुरुस्त था या यह कि अगर ऐसा किया जाए तो अदब, अदब रहे गा या यह कोई और शक्ल इख़्तियार कर जाए गा।
मुंशी प्रेम चंद जो इस कान्फ्रेंस की सदारत कर रहे थे उन्होंने इस के हक़ में सदारती अल्फ़ाज़ कहे:
"जिस अदब से हमारा ज़ौक़-ए-सही बेदार न हो, रूहानी और ज़ेहनी तस्कीन न मिले, हम में क़ुव्वत और हरकत पैदा न हो, हमारा जज़्बा-ए-हुस्न न जागे, जो हम में सच्चा इरादा और मुश्किलात पर फ़तह पाने के लिए सच्चा इस्तिक़लाल न पैदा करे, वह आज हमारे लिए बेकार है।"
इस पर अदब का इतलाक़ नहीं हो सकता अदब आर्टिस्ट के रोमानी तवाज़ुन की ज़ाहिरी सूरत है और हम आहंगी हुस्न की तख़लीक़ करती है। तख़रीब नहीं, अदब हमारी ज़िंदगी को फ़ित्री और आज़ाद बनाता है, इस की बदौलत नफ़स की तहज़ीब होती है।
यह इस का मक़सद-ए-उल्या है। अमल की क़ुव्वत पर ज़ोर और मुश्किलात पर क़ाबू पाने का जज़्बा इस तहरीक का मुद्दआ ठहरा। इस तहरीक को बड़े बड़े अदीबों ने सराहा और इस का साथ देने के लिए कमर बस्ता हो गए। इन में डॉक्टर अब्दुल हक़, हसरत मोहानी, जोश मलीह आबादी, प्रेम चंद, क़ाज़ी अब्दुल ग़फ़्फ़ार, मजनूं गोरखपुरी, डॉक्टर आबिद हुसैन, नियाज़ फ़तह पूरी, सागर सिद्दीक़ी वग़ैरा शामिल हैं।
हवाला जात
मकाले का उनवान: उर्दू तनक़ीद और हलक़ा अरबाब-ए-ज़ौक़ (70 की दहाई तक)
मकाला बराए: पी एच डी उर्दू
मकाला निगार: ख़ालिद हुसैन शाह
निगरानी मकाला: डॉक्टर रशीद अमजद
यूनिवर्सिटी: नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ़ मॉडर्न लैंग्वेजेज़, इस्लामाबाद
सफ़हा नंबर: 38-39

बज़्म-ए-दास्तान गोयां और हलका अरबाब-ए-ज़ौक
बज़्म-ए-दास्तान गोयां में अफ़साना निगारों के साथ साथ शोअरा की तादाद भी काफ़ी थी जिस की वजह से इस का नाम बज़्म-ए-दास्तान गोयां से हलका अरबाब-ए-ज़ौक रख दिया गया। नाम की तबदीली के साथ साथ सिर्फ़ मिल बैठने का बहाना न रहा बल्कि इस के वाज़ेह मक़ासिद भी मुतअय्यन होने लगे।
मौज़ूआत की फ़हरिस्त
बज़्म-ए-दास्तान गोयां और हलका अरबाब-ए-ज़ौक
तरक़्क़ी पसंद तहरीक का पस मंज़र
तरक़्क़ी पसंद मुसन्निफ़ीन का मंसूर
हवाला जात
इस के मक़ासिद दर्ज ज़ैल तय पाए:
उर्दू ज़बान की तरवीज व इशाअत
नौजवान लिखने वालों की तालीम व तफ़रीह
उर्दू लिखने वालों के हुक़ूक़ की हिफ़ाज़त
तनक़ीद-ए-अदब में ख़ुसूस और बे तकल्लुफ़ी पैदा करना।
उर्दू अदब में सहाफ़त के नासाज़गार माहौल को साफ़ करना।
मक़ासिद का चौथा नुक्ता तनक़ीद के मुताल्लिक़ है और यही हमारा मौज़ू भी है। यहां इस बात को वाज़ेह करना ज़रूरी है कि तनक़ीद में ख़ुसूस और बे तकल्लुफ़ी से क्या मुराद है? क्या इस में तरक़्क़ी पसंद तहरीक की तनक़ीद में ही ख़ुसूस और बे तकल्लुफ़ी को शामिल करना था या तनक़ीदी नज़रियात भी मुख़्तलिफ़ थे। इस बात का जायज़ा लेने से पहले इस वक़्त के अदबी मंज़रनामे का मुख़्तसर बयान ज़रूरी है।
तरक़्क़ी पसंद तहरीक का पस मंज़र
सन 1935ء में पैरिस में एक अदबी कान्फ्रेंस मुनअक़िद हुई जिस में दुनिया के बड़े बड़े अदीब शरीक हुए। यह कान्फ्रेंस बुनियादी तौर पर अदब के तहफ़्फ़ुज़ और नई ज़रूरतों के लिए मुनअक़िद हुई। जिस में गोरकी और थॉमस मान जैसे शहरह आफ़ाक़ मुसन्निफ़ीन की सोच और फ़िक्र शामिल थी। इस कान्फ्रेंस में हिंदुस्तान से सज्जाद ज़हीर और मुल्क राज आनंद शरीक हुए।
इन दोनों मुसन्निफ़ीन ने लंदन में तरक़्क़ी पसंद मुसन्निफ़ीन की अंजुमन क़ायम की और एक एलान नामा भी जारी किया। इस अंजुमन ने लखनऊ में अप्रैल 1936ء को पहली कान्फ्रेंस मुनअक़िद की जिस की सदारत मशहूर अफ़साना निगार मुंशी प्रेम चंद ने की। इस कान्फ्रेंस में तरक़्क़ी पसंद मुसन्निफ़ीन का मंसूर पढ़ कर सुनाया गया।
तरक़्क़ी पसंद मुसन्निफ़ीन का मंसूर
जो कि दर्ज ज़ैल है:
इस वक़्त हिंदुस्तानी समाज में इंक़िलाबी तबदीलियाँ रुनुमा हो रही हैं और जहां बलब रिजअत परस्ती जिस की मौत लाज़मी और यक़ीनी है अपनी ज़िंदगी की मुद्दत बढ़ाने के लिए दीवाना वार हाथ पाऊँ मार रही है। पुराने तहज़ीबी ढांचों की शिकस्त व रेख़्त के बाद से अब तक हमारा अदब एक गुना फ़रारियत का शिकार रहा है और ज़िंदगी के हक़ाइक़ से गुरेज़ कर के खोखली रोमानियत और बे बुनियाद तसव्वुर परस्ती में पनाह ढूँडता रहा है। जिस के बाइस इस की रगों में नया ख़ून आना बंद हो गया है और अब शदीद हैयत परस्ती और गुमراہ कुन मंफ़ी रुझानत का शिकार हो गया है।
हिंदुस्तानी अदीबों का फ़र्ज़ है कि वह हिंदुस्तानी ज़िंदगी में रुनुमा होने वाली तबदीलियों का भरपूर इज़हार करें और अदब में साइंसी अक़्लियत पसंदी को फ़रोग़ देते हुए तरक़्क़ी पसंद तहरीक की हिमायत करें उन का फ़र्ज़ है कि वह इस क़िस्म के अंदाज़-ए-तनक़ीद को रिवाज दें जिस से ख़ानदान, मज़हब, जिन्स, जंग और समाज के बारे में रिजअत पसंदी और माज़ी परस्ती के ख़्यालात की रोक थाम की जा सके उन का फ़र्ज़ है कि वह ऐसे अदबी रुझानत को नशो व नुमा पाने से रोकें जो फ़िर्क़ा परस्ती, नस्ली तास्सुब और इंसानी इस्तिहसाल की हिमायत करते हैं।
हमारी अंजुमन का मक़सद अदब और आर्ट को इन रिजअत परस्त तबक़ों के चंगल से नजात दिलाना है जो अपने साथ अदब और फ़न को भी इनहितात के गड्ढों में धकेलना चाहते हैं। हम अदब को अवाम के क़रीब लाना चाहते हैं और इसे ज़िंदगी की अक्कासी और मुस्तक़बिल की तामीर का मुअस्सिर ज़रीया बनाना चाहते हैं। हम अपने आप को हिंदुस्तानी तहज़ीब की बेहतरीन रवायत का वारिस समझते हैं और इन रवायत को अपनाते हुए हम अपने मुल्क में हर तरह की रिजअत पसंदी के ख़िलाफ़ जद्दोजहद करेंगे जो हमारे वतन को एक नई और बेहतरीन ज़िंदगी की राह दिखाए।
इस काम में हम अपने और ग़ैर मुल्कों के तहज़ीब व तमद्दुन से फ़ायदा उठाएंगे। हम चाहते हैं कि हिंदुस्तान का नया अदब हमारी ज़िंदगी के बुनियादी मसाइल को अपना मौज़ू बनाए। यह भूख, इफ़लास, समाजी पस्ती और ग़ुलामी के मसाइल हैं, हम इन तमाम आसार की मुख़ालिफ़त करेंगे जो हमें लाचारी, सुस्ती और तव्वुहम परस्ती की तरफ़ ले जाते हैं। हम इन तमाम बातों को जो हमारी क़ुव्वत-ए-तनक़ीद को उभारती हैं और रस्मों और इदारों को अक़्ल की कसौटी पर रखती हैं तबदीली और तरक़्क़ी का ज़रीया समझ कर क़बूल करते हैं।
हलक़ा अरबाब-ए-ज़ौक़ के क़याम के सिर्फ़ तीन साल पहले न सिर्फ़ पाकिस्तानी अदब में बल्कि आलमी सतह पर अदब में यह एक ऐसी तहरीक थी जिस ने तमाम साबिक़ा अदबी नज़रियात को नज़र अंदाज़ करते हुए इंसान के बुनियादी मसाइल भूख, इफ़लास, समाजी पस्ती और ग़ुलामी को अदब का मौज़ू बनाया।
बुनियादी तौर पर यह लोग कार्ल मार्क्स के नज़रियात से मुतास्सिर थे और सरमाया दाराना निज़ाम के ज़ालिम शिकंजों से जकड़े हुए बे बस इंसानों की आवाज़ बन कर आलमी ज़मीर को झिंझोड़ना चाहते थे मगर देखना यह है कि क्या असनाफ़-ए-अदब को इस मक़सद के लिए इस्तेमाल करना दुरुस्त था या यह कि अगर ऐसा किया जाए तो अदब, अदब रहे गा या यह कोई और शक्ल इख़्तियार कर जाए गा।
मुंशी प्रेम चंद जो इस कान्फ्रेंस की सदारत कर रहे थे उन्होंने इस के हक़ में सदारती अल्फ़ाज़ कहे:
"जिस अदब से हमारा ज़ौक़-ए-सही बेदार न हो, रूहानी और ज़ेहनी तस्कीन न मिले, हम में क़ुव्वत और हरकत पैदा न हो, हमारा जज़्बा-ए-हुस्न न जागे, जो हम में सच्चा इरादा और मुश्किलात पर फ़तह पाने के लिए सच्चा इस्तिक़लाल न पैदा करे, वह आज हमारे लिए बेकार है।"
इस पर अदब का इतलाक़ नहीं हो सकता अदब आर्टिस्ट के रोमानी तवाज़ुन की ज़ाहिरी सूरत है और हम आहंगी हुस्न की तख़लीक़ करती है। तख़रीब नहीं, अदब हमारी ज़िंदगी को फ़ित्री और आज़ाद बनाता है, इस की बदौलत नफ़स की तहज़ीब होती है।
यह इस का मक़सद-ए-उल्या है। अमल की क़ुव्वत पर ज़ोर और मुश्किलात पर क़ाबू पाने का जज़्बा इस तहरीक का मुद्दआ ठहरा। इस तहरीक को बड़े बड़े अदीबों ने सराहा और इस का साथ देने के लिए कमर बस्ता हो गए। इन में डॉक्टर अब्दुल हक़, हसरत मोहानी, जोश मलीह आबादी, प्रेम चंद, क़ाज़ी अब्दुल ग़फ़्फ़ार, मजनूं गोरखपुरी, डॉक्टर आबिद हुसैन, नियाज़ फ़तह पूरी, सागर सिद्दीक़ी वग़ैरा शामिल हैं।
हवाला जात
मकाले का उनवान: उर्दू तनक़ीद और हलक़ा अरबाब-ए-ज़ौक़ (70 की दहाई तक)
मकाला बराए: पी एच डी उर्दू
मकाला निगार: ख़ालिद हुसैन शाह
निगरानी मकाला: डॉक्टर रशीद अमजद
यूनिवर्सिटी: नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ़ मॉडर्न लैंग्वेजेज़, इस्लामाबाद
सफ़हा नंबर: 38-39

बज़्म-ए-दास्तान गोयां और हलका अरबाब-ए-ज़ौक
बज़्म-ए-दास्तान गोयां में अफ़साना निगारों के साथ साथ शोअरा की तादाद भी काफ़ी थी जिस की वजह से इस का नाम बज़्म-ए-दास्तान गोयां से हलका अरबाब-ए-ज़ौक रख दिया गया। नाम की तबदीली के साथ साथ सिर्फ़ मिल बैठने का बहाना न रहा बल्कि इस के वाज़ेह मक़ासिद भी मुतअय्यन होने लगे।
मौज़ूआत की फ़हरिस्त
बज़्म-ए-दास्तान गोयां और हलका अरबाब-ए-ज़ौक
तरक़्क़ी पसंद तहरीक का पस मंज़र
तरक़्क़ी पसंद मुसन्निफ़ीन का मंसूर
हवाला जात
इस के मक़ासिद दर्ज ज़ैल तय पाए:
उर्दू ज़बान की तरवीज व इशाअत
नौजवान लिखने वालों की तालीम व तफ़रीह
उर्दू लिखने वालों के हुक़ूक़ की हिफ़ाज़त
तनक़ीद-ए-अदब में ख़ुसूस और बे तकल्लुफ़ी पैदा करना।
उर्दू अदब में सहाफ़त के नासाज़गार माहौल को साफ़ करना।
मक़ासिद का चौथा नुक्ता तनक़ीद के मुताल्लिक़ है और यही हमारा मौज़ू भी है। यहां इस बात को वाज़ेह करना ज़रूरी है कि तनक़ीद में ख़ुसूस और बे तकल्लुफ़ी से क्या मुराद है? क्या इस में तरक़्क़ी पसंद तहरीक की तनक़ीद में ही ख़ुसूस और बे तकल्लुफ़ी को शामिल करना था या तनक़ीदी नज़रियात भी मुख़्तलिफ़ थे। इस बात का जायज़ा लेने से पहले इस वक़्त के अदबी मंज़रनामे का मुख़्तसर बयान ज़रूरी है।
तरक़्क़ी पसंद तहरीक का पस मंज़र
सन 1935 में पैरिस में एक अदबी कान्फ्रेंस मुनअक़िद हुई जिस में दुनिया के बड़े बड़े अदीब शरीक हुए। यह कान्फ्रेंस बुनियादी तौर पर अदब के तहफ़्फ़ुज़ और नई ज़रूरतओं के लिए मुनअक़िद हुई। जिस में गोरकी और थॉमस मान जैसे शहरह आफ़ाक़ मुसन्निफ़ीन की सोच और फ़िक्र शामिल थी। इस कान्फ्रेंस में हिंदुस्तान से सज्जाद ज़हीर और मुल्क राज आनंद शरीक हुए।
इन दोनों मुसन्निफ़ीन ने लंदन में तरक़्क़ी पसंद मुसन्निफ़ीन की अंजुमन क़ायम की और एक एलान नामा भी जारी किया। इस अंजुमन ने लखनऊ में अप्रैल 1936 को पहली कान्फ्रेंस मुनअक़िद की जिस की सदारत मशहूर अफ़साना निगार मुंशी प्रेम चंद ने की। इस कान्फ्रेंस में तरक़्क़ी पसंद मुसन्निफ़ीन का मंसूर पढ़ कर सुनाया गया।
तरक़्क़ी पसंद मुसन्निफ़ीन का मंसूर
जो कि दर्ज ज़ैल है:
इस वक़्त हिंदुस्तानी समाज में इंक़िलाबी तबदीलियाँ रुनुमा हो रही हैं और जहां बलब रिजअत परस्ती जिस की मौत लाज़मी और यक़ीनी है अपनी ज़िंदगी की मुद्दत बढ़ाने के लिए दीवाना वार हाथ पाऊँ मार रही है। पुराने तहज़ीबी ढांचों की शिकस्त व रेख़्त के बाद से अब तक हमारा अदब एक गुना फ़रारियत का शिकार रहा है और ज़िंदगी के हक़ाइक़ से गुरेज़ कर के खोखली रोमानियत और बे बुनियाद तसव्वुर परस्ती में पनाह ढूँडता रहा है। जिस के बाइस इस की रगों में नया ख़ून आना बंद हो गया है और अब शदीद हैयत परस्ती और गुमराह कुन मंफ़ी रुझानत का शिकार हो गया है।
हिंदुस्तानी अदीबों का फ़र्ज़ है कि वह हिंदुस्तानी ज़िंदगी में रुनुमा होने वाली तबदीलियों का भरपूर इज़हार करें और अदब में साइंसी अक़्लियत पसंदी को फ़रोग़ देते हुए तरक़्क़ी पसंद तहरीक की हिमायत करें उन का फ़र्ज़ है कि वह इस क़िस्म के अंदाज़-ए-तनक़ीद को रिवाज दें जिस से ख़ानदान, मज़हब, जिन्स, जंग और समाज के बारे में रिजअत पसंदी और माज़ी परस्ती के ख़्यालात की रोक थाम की जा सके उन का फ़र्ज़ है कि वह ऐसे अदबी रुझानत को नशो व नुमा पाने से रोकें जो फ़िर्क़ा परस्ती, नस्ली तास्सुब और इंसानी इस्तिहसाल की हिमायत करते हैं।
हमारी अंजुमन का मक़सद अदब और आर्ट को इन रिजअत परस्त तबक़ों के चंगल से नजात दिलाना है जो अपने साथ अदब और फ़न को भी इनहितात के गड्ढों में धकेलना चाहते हैं। हम अदब को अवाम के क़रीब लाना चाहते हैं और इसे ज़िंदगी की अक्कासी और मुस्तक़बिल की तामीर का मुअस्सिर ज़रीया बनाना चाहते हैं। हम अपने आप को हिंदुस्तानी तहज़ीब की बेहतरीन रवायत का वारिस समझते हैं और इन रवायत को अपनाते हुए हम अपने मुल्क में हर तरह की रिजअत पसंदी के ख़िलाफ़ जद्दोजहद करेंगे जो हमारे वतन को एक नई और बेहतरीन ज़िंदगी की राह दिखाए।
इस काम में हम अपने और ग़ैर मुल्कों के तहज़ीब व तमद्दुन से फ़ायदा उठाएंगे। हम चाहते हैं कि हिंदुस्तान का नया अदब हमारी ज़िंदगी के बुनियादी मसाइल को अपना मौज़ू बनाए। यह भूख, इफ़लास, समाजी पस्ती और ग़ुलामी के मसाइल हैं, हम इन तमाम आसार की मुख़ालिफ़त करेंगे जो हमें लाचारी, सुस्ती और तव्वुहम परस्ती की तरफ़ ले जाते हैं। हम इन तमाम बातों को जो हमारी क़ुव्वत-ए-तनक़ीद को उभारती हैं और रस्मों और इदारों को अक़्ल की कसौटी पर रखती हैं तबदीली और तरक़्क़ी का ज़रीया समझ कर क़बूल करते हैं।
हलक़ा अरबाब-ए-ज़ौक़ के क़याम के सिर्फ़ तीन साल पहले न सिर्फ़ पाकिस्तानी अदब में बल्कि आलमी सतह पर अदब में यह एक ऐसी तहरीक थी जिस ने तमाम साबिक़ा अदबी नज़रियात को नज़र अंदाज़ करते हुए इंसान के बुनियादी मसाइल भूख, इफ़लास, समाजी पस्ती और ग़ुलामी को अदब का मौज़ू बनाया।
बुनियादी तौर पर यह लोग कार्ल मार्क्स के नज़रियात से मुतास्सिर थे और सरमाया दाराना निज़ाम के ज़ालिम शिकंजों से जकड़े हुए बे बस इंसानों की आवाज़ बन कर आलमी ज़मीर को झिंझोड़ना चाहते थे मगर देखना यह है कि क्या असनाफ़-ए-अदब को इस मक़सद के लिए इस्तेमाल करना दुरुस्त था या यह कि अगर ऐसा किया जाए तो अदब, अदब रहे गा या यह कोई और शक्ल इख़्तियार कर जाए गा।
मुंशी प्रेम चंद जो इस कान्फ्रेंस की सदारत कर रहे थे उन्होंने इस के हक़ में सदारती अल्फ़ाज़ कहे:
"जिस अदब से हमारा ज़ौक़-ए-सही बेदार न हो, रूहानी और ज़ेहनी तस्कीन न मिले, हम में क़ुव्वत और हरकत पैदा न हो, हमारा जज़्बा-ए-हुस्न न जागे, जो हम में सच्चा इरादा और मुश्किलात पर फ़तह पाने के लिए सच्चा इस्तिक़लाल न पैदा करे, वह आज हमारे लिए बेकार है।"
इस पर अदब का इतलाक़ नहीं हो सकता अदब आर्टिस्ट के रोमानी तवाज़ुन की ज़ाहिरी सूरत है और हम आहंगी हुस्न की तख़लीक़ करती है। तख़रीब नहीं, अदब हमारी ज़िंदगी को फ़ित्री और आज़ाद बनाता है, इस की बदौल