सोशल मीडिया और इंसानी ज़हन पर इसका असर
  बकलम: मोहम्मद अली सुब्हानी ✍️

आज के इस डिजिटल दौर में सोशल मीडिया हमारी ज़िंदगी का एक लाज़मी हिस्सा बन चुका है। हम सुबह आँख खोलते ही सबसे पहले अपने मोबाइल फ़ोन की स्क्रीन पर नज़र डालते हैं, नोटिफ़िकेशन्स चेक करते हैं, और दिन का आगाज़ लाइक्स, कमेंट्स और शेयर्स से करते हैं। बाज़ाहिर ये प्लेटफ़ॉर्म्स हमें दुनिया से जोड़ने, जानकारी फ़राहम करने और इज़हार-ए-ख़याल का मौक़ा देने का ज़रिया हैं, लेकिन हक़ीक़त में ये आहिस्ता-आहिस्ता हमारे ज़हनों को क़ाबू में कर रहे हैं।

ये तस्वीर इसी हक़ीक़त की अक्कासी करती है। हाथ जो दिमाग़ की डोरियाँ खींच रहा है, इस बात की अलामत है कि सोशल मीडिया कंपनियाँ और उनके एल्गोरिथम्स हमारी सोच, तरजीहात, और हत्ता कि जज़्बात को भी कंट्रोल कर रहे हैं। हम वही देखते हैं जो ये प्लेटफ़ॉर्म्स हमें दिखाना चाहते हैं, हम वही पसंद करते हैं जो उनके हिसाब से "ट्रेंड" में होता है, और हम वही सोचने लगते हैं जो हमें बार-बार दिखाया जाता है।

हम अक्सर कहते हैं कि हम सिर्फ़ "कुछ देर" मोबाइल देखने जा रहे हैं, लेकिन रील्स देखते देखते पता ही नहीं चलता कि कब दो या तीन घंटे गुज़र गए। इस दुनिया में कोई चीज़ मुफ़्त नहीं मिलती, तो फिर ये सोशल मीडिया एप्स हमें मुफ़्त में वीडियोज़ क्यों दिखाती हैं? इसकी क़ीमत है , आपका वक़्त। और जब आप अपना वक़्त देते हैं, तो आहिस्ता-आहिस्ता ये आपके जज़्बात, फ़ैसलों और दिमाग़ पर भी क़ाबिज़ होने लगते हैं।

सोशल मीडिया ने इंसान को एक मसनूई दुनिया में क़ैद कर दिया है जहाँ असल ताल्लुक़ात, हक़ीक़ी ख़ुशियाँ और कुदरती तजरबात कम होते जा रहे हैं। लोग अपनी ज़िंदगी के हक़ीक़ी लम्हात को क़ीमती समझने के बजाए सोशल मीडिया पर "परफ़ेक्ट" दिखने की दौड़ में शामिल हैं। नतीजतन ज़ेहनी दबाओ, एहसास-ए-कमतरी, तन्हाई, और इज़्तिराब में इज़ाफ़ा हो रहा है।

अगर आप चाहते हैं कि सोशल मीडिया के इस्तेमाल को कम करें तो इन आसान मगर मुअस्सिर नुकात पर अमल करें:

1. सोने से कम अज़ कम दो घंटे पहले मोबाइल अलग रख दें।


2. तमाम सोशल मीडिया एप्स की नोटिफ़िकेशन्स बंद कर दें।


3. इंस्टाग्राम को अनइंस्टॉल कर के सिर्फ़ ब्राउज़र में इस्तेमाल करें।


4. रोज़ाना का “स्क्रीन टाइम” चेक करें और एक हद मुक़र्रर करें।


5. हर हफ़्ते एक “डिजिटल डिटॉक्स डे” रखें जिस में कोई सोशल मीडिया इस्तेमाल न करें।


6. फ़ारिग़ वक़्त में किताब पढ़ें, चहल क़दमी करें या किसी दोस्त से आमने सामने बात करें।


7. ग़ैर ज़रूरी एप्स डिलीट कर दें और सिर्फ़ ज़रूरत की एप्स रखें।



ज़रूरत इस बात की है कि हम सोशल मीडिया को अपने फ़ायदे के लिए इस्तेमाल करें, न कि इसे अपने ऊपर हावी होने दें। ये एक ताक़तवर आला है, मगर अगर हम इस के ग़ुलाम बन जाएँ तो ये हमारी ज़ेहनी आज़ादी छीन लेता है।