क़ुरान समझ में आया तो सब कुछ बदल गया
✍️ मुफ़्ती मुहम्मद तस्लीम उद्दीन अल-महमूदी
क़ुरान फ़हमी: इबादत की रूह, अमल की जान
इंसान की ज़िंदगी में बहुत सी चीज़ें ऐसी होती हैं जो बज़ाहिर दुरुस्त नज़र आती हैं, मगर अंदर से खाली होती हैं। जैसे कोई मकान जिस की दीवारें तो मज़बूत हों मगर उस में रोशनी, हवा और हरारत न हो; ऐसा घर रहने के काबिल तो होता है मगर जीने का ज़ौक़ नहीं देता। बिल्कुल यही हाल इबादत का है जब वो क़ुरान की समझ और तदब्बुर से खाली हो।
क़ुरान को समझे बग़ैर किए जाने वाले आमाल ऐसे हैं जैसे किसी ने मोबाइल तो हाथ में ले लिया हो मगर उसे ऑन करना, इस्तेमाल करना और उस की असल सलाहियत जानना न सीखा हो। मोबाइल मौजूद है, हाथ में है, मगर फ़ायदा सिफ़र। इसी तरह क़ुरान मौजूद हो, नमाज़ भी हो, दुआ भी हो, मगर क़ुरान की रहनुमाई शामिल न हो तो इबादत एक आदत बन कर रह जाती है, ज़िंदगी बदलने वाली ताक़त नहीं बन पाती।
क़ुरान के बग़ैर इबादत: रस्म, क़ुरान के साथ इबादत:
जब इंसान क़ुरान को समझे बग़ैर नमाज़ पढ़ता है तो वो अल्फ़ाज़ दोहरा रहा होता है, दिल शरीक नहीं होता। जैसे कोई तालिब इल्म सबक ज़बानी याद कर ले मगर मफ़हूम न समझे; इम्तिहान तो पास हो सकता है मगर इल्म नहीं आता। ऐसी नमाज़ में क़ियाम, रुकू और सजदा तो होते हैं मगर दिल कहीं और भटक रहा होता है।
लेकिन जब वही इंसान क़ुरान के मआनी से वाक़िफ़ हो, ये जानता हो कि वो किन अल्फ़ाज़ में अपने रब से बात कर रहा है, तो नमाज़ का मंज़र ही बदल जाता है। फिर सजदा ज़मीन पर सर रखने का नाम नहीं रहता बल्कि दिल के बोझ उतारने की जगह बन जाता है। फिर नमाज़ ऐसे लगती है जैसे दिन भर के शोर के बाद किसी ने सुकून की पनाह गाह में पनाह ले ली हो।
क़ुरान: अमल में ज़ाइक़ा पैदा करने वाली हक़ीक़त
खाना अगर नमक के बग़ैर हो तो पेट भर सकता है, मगर दिल खुश नहीं होता। क़ुरान आमाल के लिए वही नमक है। इस के बग़ैर आमाल बे-ज़ाइक़ा, बे-लुत्फ़ और बे-असर रहते हैं। क़ुरान इंसान को बताता है कि वो क्यों इबादत कर रहा है, किस के लिए कर रहा है, और इस इबादत का असल मक़सद क्या है।
जब क़ुरान दिल में उतरता है तो नेकी बोझ नहीं रहती, ज़िम्मेदारी नहीं लगती, बल्कि दिल की तलब बन जाती है। फिर गुनाह से बचना मजबूरी नहीं रहता बल्कि तबीयत खुद पीछे हट जाती है, जैसे सेहतमंद इंसान खुद ज़हर से दूर रहता है।
दुआ: अल्फ़ाज़ से कैफ़ियत तक
क़ुरान के बग़ैर दुआ अक्सर मख़सूस वक़्तों और अल्फ़ाज़ तक महदूद रहती है। हाथ उठाए जाते हैं, मांगा जाता है, और बात ख़त्म। मगर क़ुरान इंसान को ये सिखाता है कि दुआ सिर्फ़ मांगने का नाम नहीं, बल्कि अल्लाह के सामने अपनी मोहताजी महसूस करने का नाम है।
जब क़ुरान समझ में आता है तो दिल हर हाल में अल्लाह से जुड़ा रहता है। फिर दुआ सिर्फ़ मस्जिद या जाए नमाज़ तक महदूद नहीं रहती। चलते हुए, काम करते हुए, परेशानी में, खुशी में—दिल हर वक़्त एक ख़ामोश दुआ की कैफ़ियत में रहता है। इंसान हर फ़ैसले में अल्लाह से रहनुमाई चाहता है, जैसे अंधेरे में चलने वाला हर क़दम पर रोशनी तलाश करता है।
क़ुरान: ज़िंदगी को मानी देने वाली किताब
क़ुरान सिर्फ़ नमाज़, रोज़ा और दुआ ही को नहीं बदलता, बल्कि इंसान के पूरे सोचने का अंदाज़ बदल देता है। वो इंसान को ये सिखाता है कि कामयाबी सिर्फ़ दौलत और शोहरत का नाम नहीं, और नुक़सान सिर्फ़ ग़ुरबत या नाकामी का नाम नहीं। क़ुरान इंसान को हर अमल की हक़ीक़त दिखाता है—चाहे वो ख़ानदानी ज़िंदगी हो, कारोबार हो, सब्र हो या शुक्र।
जब इंसान क़ुरान के साथ जीता है तो उसे छोटी नेकी में भी बड़ा अजर नज़र आता है, और बड़े दुख में भी रब की हिकमत झलकती दिखाई देती है। फिर दुनिया की बड़ी से बड़ी कामयाबी भी दिल को धोखा नहीं दे पाती, क्योंकि दिल किसी और हक़ीक़त से जुड़ चुका होता है।
: क़ुरान के बग़ैर अमल, क़ुरान के साथ ज़िंदगी
क़ुरान के बग़ैर इबादत ऐसे है जैसे जिस्म बग़ैर रूह के। हरकत तो है, ज़िंदगी नहीं। और क़ुरान के साथ इबादत ऐसे है जैसे दिल धड़क रहा हो, खून दौड़ रहा हो, और पूरा वजूद ज़िंदा हो।
असल दुआ यही है कि अल्लाह ताला हमें क़ुरान सिर्फ़ पढ़ने वाला नहीं बल्कि समझने, महसूस करने और जीने वाला बना दे। क्योंकि जब क़ुरान ज़िंदगी में उतर जाता है तो फिर इबादत फ़र्ज़ नहीं रहती, मोहब्बत बन जाती है; और ज़िंदगी महज़ गुज़ारने की चीज़ नहीं रहती, बल्कि अल्लाह की तरफ़ सफ़र बन जाती है।
अल्लाह हमें तदब्बुर-ए-क़ुरान की वो लज़्ज़त अता फ़रमाए जो आमाल में जान, दिल में नूर और ज़िंदगी में सिम्त पैदा कर दे। आमीन।