जानते हैं मेराज की रात हमें क्या मिला?


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> आज मेराज की रात है। और आज ही की रात हमें नमाज़ का तोहफ़ा मिला, तो हमें अपनी नमाज़ों की हिफ़ाज़त करनी चाहिए क्योंकि नमाज़ एक बहुत ही अहम, आला और क़ीमती तोहफ़ा है इस लिए के तमाम आमाल-ए-सालेहा मसलन रोज़ा, हज और ज़कात वगैरा ज़मीन पर नाज़िल हुए मगर नमाज़ को अल्लाह ने अपने प्यारे महबूब ﷺ को अर्श पर बुला कर अता फ़रमाया।

*`आला चीज़ हमेशा आला मक़ाम पर दी जाती है।`*
> जैसे हम दुनियावी गिफ़्ट और मामूली तोहफ़ों की हिफ़ाज़त करते हैं, वैसे ही बल्कि इस से कहीं ज़्यादा हमें अपनी नमाज़ों की हिफ़ाज़त करनी चाहिए, मैं तो कहती हूँ कि जब नमाज़ इतना क़ीमती तोहफ़ा है तो हम इस की हिफ़ाज़त क्यों न करें इसे वक़्त पर पाबंदी के साथ क्यों अदा न करें, मेरी नाक़िस राय के मुताबिक़ जो इस फ़रीज़ा की अदायगी से तसाहुली और कोताही बरते वो इनाम-ए-इलाही से महरूम है लिहाज़ा अपनी नमाज़ों को संभाल कर रखें, उन्हें वक़्त पर अदा करें और दिल की पूरी तवज्जोह के साथ पढ़ें ताकि अल्लाह और उसके रसूल की ख़ुशनूदी हासिल कर सकें।
*करीम आक़ा ﷺ ने भी फ़रमाया:*
> "क़यामत के दिन सब से पहले नमाज़ का हिसाब लिया जाएगा, अगर नमाज़ सही हुई तो बाक़ी आमाल भी सही होंगे और अगर नमाज़ ख़राब हुई तो बाक़ी आमाल भी ख़राब होंगे।"
[सुनन इब्न माजा/किताब इक़ामत अल-सलात व अल-सुन्ना/हदीस: 1425]

~नमाज़ का ये क़ीमती तोहफ़ा हमें मेराज की रात में दिया गया है। ये दुनिया में भी सुकून का ज़रिया है और आख़िरत में कामयाबी की ज़मानत है।~


*`लिहाज़ा हमें अपनी नमाज़ें वक़्त पर इख़लास के साथ और पूरी तवज्जोह के साथ अदा करनी चाहिए ताकि हम उख़रवी नेमतों और जन्नत की आसائشों से लुत्फ़ अंदोज़ हो सकें और।`* 

*पढ़ नमाज़-ए-पंजगाना न कर कोई बहाना*
*इसी में तेरी जन्नत है वरना फिर दोज़ख़ है तेरा ठिकाना*

*अल्लाह हमें इस क़ीमती तोहफ़े की हिफ़ाज़त करने और इस पर अमल करने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए।* 
*आमीन या रब्ब अल-आलमीन*

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 *दुआ की तलबगार:*
*सुग़रा अंजुम हनफ़ी* 
बिन्त सग़ीर उद्दीन  _________
*२५, जनवरी सन २०२५ء*
*२४, रजब अल-मुरज्जब सन १४४६ھ*