बिन्ते अबुल खैर आज़मीؔ

दिल एक अजीब अदालत है
यहाँ न वकील होते हैं, न जज की कुर्सी पर बैठा कोई इंसान,
मगर यहाँ फैसले वो होते हैं जो पूरी जिंदगी की سمت बदल देते हैं।
हर इंसान के अंदर एक अदालत कायम है
जहाँ ज़मीर गवाह बनता है,
नफ़्स मुलज़िम होता है,
और अक़्ल कभी वकील-ए-सफाई तो कभी वकील-ए-इस्तिगासा बन जाती है।
यही वो अदालत है जहाँ रोज़ हमारे आमाल का मुक़द्दमा चलता है।

मुक़द्दमे की इब्तिदा

जब रात की ख़ामोशी में इंसान तन्हा होता है
जब हुजूम की आवाज़ें थम जाती हैं
जब दुनिया की दाद व तहसीन भी ख़ामोश हो जाती है
तब दिल की अदालत लगती है।
ज़मीर खड़ा होकर सवाल करता है

“क्या तूने सच का साथ दिया?
क्या तूने किसी का दिल तोड़ा?
क्या तूने अपने रब के सामने सर झुकाया?”

और नफ़्स फौरन सफाई पेश करता है:
“मजबूरी थी, हालात ऐसे थे, सब ही तो ऐसा करते हैं…”
ये वो लम्हा होता है जहाँ इंसान या तो सच का साथ देता है
या फिर अपने आप को धोखे में रख लेता है।

गवाह की गवाही

दिल की अदालत में सबसे मज़बूत गवाह ज़मीर होता है।
ये न बिकता है, न झुकता है,
ये सिर्फ़ हक़ बोलता है
चाहे वो हक़ हमें कितना ही तल्ख़ क्यों न लगे।
ज़मीर कहता है
“तूने नमाज़ में कोताही की।
तूने वालिदैन की बात नज़रअंदाज़ की।
तूने किसी की इज़्ज़त मजरूह की।
तूने अपने वक़्त को ज़ाया किया।”

और दिल काँप उठता है…
क्योंकि इंसान दुनिया की अदालत में तो बच सकता है,
मगर ज़मीर की अदालत से कोई बरी नहीं हो सकता।

नफ़्स: सबसे बड़ा मुजरिम

दिल की अदालत का सबसे नाज़ुक लम्हा वो होता है
जब इंसान के सामने दो रास्ते होते हैं:
एक रास्ता हक़, तौबा, इस्लाह, वापसी का।
दूसरा रास्ता ज़िद, अना, बहाने, और अंधेरे की तरफ़ जाने का।
यही वो लम्हा है जहाँ इंसान या तो अपनी जिंदगी को सँवारता है
या फिर अपनी बर्बादी की फाइल पर खुद दस्तख़त कर देता है

तौबा: सबसे खूबसूरत फैसला

दिल की अदालत का सबसे हसीन फैसला तौबा है।
जब इंसान सच्चाई के आगे सर झुका दे,
जब वो कहे:
“ऐ मेरे रब! मैंने ख़ता की,
मैं मानती हूँ, मैं पलट आई हूँ…”
तो फिर आसमान की अदालत से रहमत का हुक्मनामा उतरता है।
ये वो लम्हा होता है जब दिल कैदी नहीं रहता, बल्कि आज़ाद हो जाता है।

एक ख़ामोश नसीहत

हम रोज़ दूसरों पर मुक़द्दमे चलाते हैं
कौन सही है, कौन ग़लत
मगर कभी अपने दिल की अदालत में पेश होकर देखा है?
कभी खुद से सवाल किया है
“अगर आज मेरा एहतिसाब हो जाए तो क्या मैं सुर्ख़रू हूँगी?”
“अगर आज मेरी नियतें तौली जाएँ तो क्या वो खालिस होंगी?”

याद रखिये!
दुनिया की अदालतें वक़्ती हैं, मगर दिल की अदालत रोज़ लगती है
और आखिरत की अदालत हमेशा के फैसले करती है।

आइए!
आज हम सब अपने दिल की अदालत में खुद को पेश करें।
अपने नफ़्स को कटहरे में खड़ा करें,
अपने ज़मीर को गवाह बनाएँ,
और अपने रब को मुंसिफ मान कर फैसला करें
कि हम बहाने नहीं, बदलाव चाहेंगे।
कि हम अंधेरों में नहीं, रोशनी में चलेंगे।
कि हम सिर्फ़ जीने नहीं, सँभल कर जीने का अज़्म करें।
क्योंकि
दिल की अदालत में दिया गया सच्चा फैसला
जिंदगी की सबसे बड़ी कामयाबी बन जाता है।