टिमटिमाते चिराग🕯️, बिखरते परवाने🦗
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✍🏻गुल रज़ा राही अररियावी
आशियाने टूट रहे हैं, बुलबुलें रो रही हैं
शमा महफ़िल टिमटिमा रही है, परवाने बिखर रहे हैं
एक सवाल है हमारे तर्जुमान से?
बताएं !
क्या तसव्वुर है? क्या ग़म है? क्या हुज़्न है? क्या मलाल है? क्या परेशानी है? क्या फ़िक्र है? क्या बात है? क्यों दिल बेचैन है? क्यों आंखें अश्कबार हैं? क्यों जिस्म ग़म से निढाल है? क्यों चेहरे मुज़्महिल हैं? क्यों फूल मुरझाए हुए हैं? मुस्कुराते चेहरे क्यों रो रहे हैं? फ़रोगुज़ाश्त की गुज़ारिशें क्यों हो रही हैं? मुझे कोई बताए ये तब्दीली क्यों है? अचानक से जज़्बात क्यों बदल गए? क़ज़िय-ए-नामरज़िया कैसे पेश आ गए? रिफ़ाक़त की मुफ़ारक़त कैसे हो रही है? आशियाने क्यों बिखरे हुए नज़र आ रहे हैं? बातें ग़ैर-मुर्तब क्यों हो रही हैं? आज हमारी महफ़िल खामोश क्यों है? हल्क़ा-ए-अहबाब के चेहरे बदले हुए क्यों हैं? नज़रें झुकी हुई क्यों हैं? हमारे मोहसिन के आंखों से आंसू क्यों छलक रहे हैं? उनकी बातों और नसीहतों में ये दर्द क्यों है? जज़्बात बेकाबू क्यों हैं?
तर्जुमान साहब मुझे बताओ!
तो राही सुनो!
एक तसव्वुर है जाने का, एक ग़म है अलग होने का, एक हुज़्न है फ़ुर्क़त की, एक मलाल है विदाई की, एक रंज है रुख़्सती की, एक अलम है बेवफ़ाई की, एक नम है बिछड़ने का, एक फ़िक्र है जुदा होने का, एक दर्सगाह की जुदाई है, एक एहसास की जुदाई है, एक फ़िक्री ज़ाविए की जुदाई है, एक धुन की जुदाई है, एक लगन की जुदाई है, एक मंज़िल की जुदाई है, एक मुसाफ़िर की जुदाई है, एक सफ़र की जुदाई है, एक बाम-ओ-दर की जुदाई है, एक सहन की जुदाई है, एक आंगन की जुदाई है, एक अंगूठी के नगीने की जुदाई है, एक सफ़ीने की जुदाई है, एक तड़प की जुदाई है, एक महफ़िल की जुदाई है, एक दरख़्त की जुदाई है, एक शाख़ की जुदाई है, एक डाली की जुदाई है, एक मां की जुदाई है, एक गोद की जुदाई है, एक मोहब्बत की जुदाई है, एक आगोश की जुदाई है, एक मुद्दत की जुदाई है, एक आंचल के ठंडक की जुदाई है, एक शमा के परवानों की जुदाई है, एक आशिक़-ए-ज़ार की जुदाई है, एक चमन के कलियों की जुदाई है, एक फूल के खुशबुओं की जुदाई है, एक घोंसले की चिड़ियों की जुदाई है, एक भाई की जुदाई है, एक दोस्त की जुदाई है, एक ज़मील की जुदाई है, एक सबील की जुदाई है, एक नबील की जुदाई है, एक कलीम की जुदाई है, एक फ़सीह की जुदाई है, एक सलीम व हलीम की जुदाई है, एक करीम की जुदाई है, एक शफ़ीक़ की जुदाई है, एक रक़ीब की जुदाई है, अदीब की जुदाई है, एक रहीम की जुदाई है, एक शागिर्द की जुदाई है, एक उस्ताद की जुदाई है, एक बाप की जुदाई है, एक मुरब्बी की जुदाई है, एक हादी की जुदाई है, एक साक़ी की जुदाई है, एक क़ाइद की जुदाई है, एक मुअल्लिम की जुदाई है, एक मुदर्रिस की जुदाई है, एक मुफ़क्किर की जुदाई है, एक मुदब्बिर की जुदाई है, एक मुहद्दिस की जुदाई है, एक मुफ़स्सिर की जुदाई है, एक फ़क़ीह की जुदाई है, एक दर्स की जुदाई है, एक रज़्म की जुदाई है, एक बज़्म की जुदाई है, एक तरब की जुदाई है, एक दर्द की जुदाई है, एक कर्ब की जुदाई है, एक जज़्ब की जुदाई है, एक रूहानियत की जुदाई है, एक मुसाहिबत की जुदाई है, एक तिलावत की जुदाई है, एक हलावत की जुदाई है, एक क़राबत की जुदाई है, एक इल्म के मोतियों की जुदाई है, एक सदफ़ की जुदाई है, एक किताब की जुदाई है, एक क़लम की जुदाई है, एक मसनद की जुदाई है, एक मसनद नशीन जुदाई है, एक बालियों के दाने की जुदाई है, एक हंसी की जुदाई है, एक मज़ाक़ की जुदाई है, एक तंज़ की जुदाई है, एक मिज़ाह की जुदाई है, एक तुर्श रूई की जुदाई है, एक चहक की जुदाई है, एक महक की जुदाई है, मुतनोव्वे चेहरे की जुदाई है, एक मय-ख़्वार की जुदाई है, एक जाम-ओ-सुबू की जुदाई है, एक मयख़ाना की जुदाई है -
बस जुदाई ही जुदाई है, विदाई ही विदाई है, रुख़्सती ही रुख़्सती है-
वो कश्ती जो आगाज़ साल में किताब, क़लम, सबक नसीहत, मक़सद, फ़िक्र, तदब्बुर और दुआओं के साथ चली थी, जिसमें हम अहबाब सवार थे, जिसके मल्लाह हमारे असातिज़ा थे अब वो कश्ती साहिल पर पहोंच चुकी है, मता-ए-इल्म (अज़्म, इरादा, ज़ौक़, जुस्तजू, फ़िक्र, मेहनत, मक़सद, जुनून) जो हम लेकर सवार हुए थे अब फ़रोकश होंगे-
लम्हा-ए-फ़िक्रिया :
अब मुसाफ़िरों को देखना ये है कि जो तोशा-ए-सफ़र और ज़ाद-ए-राह लेकर सवार हुए थे वो हमारे पास है या नहीं
मुहासबा ये है कि क्या हम मता-ए-मक़ासिद लेकर साहिल पर उतरे? क्या हम अपने सामान-ए-सफ़र की निगरानी कर पाए?
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हमारी बेदार मग़ज़ी, चाबुक दस्ती, निशात, हरारत और फ़िक्र-ओ-तदब्बुर ने क्या पाया? हमारी ग़फ़लत व कोताही, लाउबाली व बेख़बरी, बे एहतिआती, बे तदबीरी और बेहिसी ने क्या खोया? यही चीज़ हमारे आगे का सफ़र, अज़्म-ओ-इरादे को महमीज़ करने वाली है और सिम्त-ए-फ़लाह को तय करने वाली है-
गुज़ारिश :
हल्क़ा-ए-अहबाब बाहमी रंजिश, तुर्श रूई, सख़्त सुस्त को अपनी कुशादा ज़र्फ़ी से माफ़ करें बतौरे ख़ास सरापा तक़सीर राही बेबक़ा को माफ़ी दे कर सुकून-ए-क़ल्ब मयस्सर फ़रमाएं - ऐन-ओ-करम होगा
फ़क़त वस्सलाम