शेर-ए-खुदा हज़रत अलीؓ: इतिहास-ए-इस्लाम का दरख़्शाँ बाब
जिस की कुव्वत दीन इस्लाम की ताक़त ठहरी
वो अली जिस की रज़ा हक़ की मसीयत ठहरी
कह दे कोई घेरा है बलाओं ने हसन को
ए शेर खुदा बहर मदद तेग़ बकफ़ जा
यह ख़ाकदान-ए-गीती आमद-ओ-रफ़्त की एक मुसलसल दास्तान है, जहाँ रोज़ाना बे-शुमार इंसान जन्म लेते हैं, अपनी ज़िंदगी की मुक़र्ररा मुद्दत पूरी करते हैं और फिर दाई-ए-अजल की सदा पर लबैक कहते हुए इस दार-ए-फ़ानी को अलविदा कह जाते हैं। मगर वक़्त का यह बे-रहम बहाओ सब को यकसाँ तौर पर याद नहीं रखता। जो लोग इस आलम-ए-रंग-ओ-बू में किसी भी मैदान में नुमायां ख़िदमात अंजाम देते हैं, तारीख़ के औराक़ उन्हें मुद्दत-ए-दराज़ तक महफ़ूज़ कर लेते हैं, जबकि वो ज़िंदगियाँ जो मक़सद और असर से ख़ाली हों, रफ़्ता-रफ़्ता सफ़हा-ए-हस्ती से मिट जाती हैं। तारीख़ के औराक़ पर नज़र डालें तो वाज़ेह होता है कि कुछ इंसानों ने दुनियावी नज़्म, मुआशरती बेहतरी और इंसानी सहूलतों को अपनी जद्दोजहद का मेहर बनाया, और कुछ ऐसे भी थे जिन्होंने अपनी ज़िंदगी को दीन की ख़िदमत, सुन्नत के इस्तेहकाम और इस्लाम की इशाअत के लिए वक़्फ़ कर दिया। यह वो नुफ़ूस थे जिनके नज़दीक दुनिया महज़ क़ियाम गाह थी और असल तवज्जोह हयात-ए-उख़रवी की तामीर पर मरकज़ रही। इसी निस्बत से वो दीन के इल्म बरदार बने और अपने बाद फ़िक्री व अख़लाक़ी विरासत छोड़ गए।
इसी इंसानी हुजूम में अक्सर अफ़राद ऐसे गुज़रे जिन में कोई नुमायां इम्तियाज़ न था, और कुछ वो थे जिन्हें चंद सिफ़ात का हिस्सा मिला; मगर हज़रत अली करम अल्लाह वजहहुल करीम की ज़ात-ए-अक़दस एक ऐसी जामे शख़्सियत के तौर पर सामने आती है जिस में कमालात का तनव्वु भी है और हर वस्फ़ में इम्तियाज़ी शान भी। आप शेर-ए-खुदा भी हैं और रसूल-ए-अकरम ﷺ के दामाद भी; हैदर-ए-करार भी और ज़ुल्फ़िक़ार के मालिक भी। आप हज़रत फ़ातिमा ज़हरा रज़ी अल्लाह ताला अन्हा के रफ़ीक़-ए-हयात और हसनैन-ए-करीमैन रज़ी अल्लाह ताला अन्हुमा के शफ़ीक़ वालिद हैं। आप की ज़िंदगी सख़ावत और शुजाअत, इबादत और बसीरत, इल्म और हिल्म का हुस्न इम्तेज़ाज है। आप फ़ातेह-ए-ख़ैबर भी हैं और फ़िक्र-ओ-बयान के मैदान में भी बे-मिसाल। यूँ हज़रत अली रज़ी अल्लाह ताला अन्हु एक ऐसी हमह जहत शख़्सियत के तौर पर जलवागर होते हैं जो महज़ एक तारीखी किरदार नहीं बल्कि अक़दार और कमालात का ज़िंदा इस्तेआरा है। इसी लिए दुनिया उन्हें मज़हरुल अजाइब वल ग़राएब के नाम से याद करती है, और यह याद क़यामत तक ताज़ा व ताबिंदा रहेगी।
*नाम व नसब*
आप रज़ी अल्लाह अन्हु का नाम ‘‘अली बिन अबी तालिब’’ और कुनियत अबुल हसन व अबू तुराब’’ है। आप रज़ी अल्लाह अन्हु सरकार अक़दसﷺके चचा अबू तालिब के साहिबज़ादे हैं यानी हुज़ूरर ﷺके चचाज़ाद भाई हैं। आप रज़ी अल्लाह अन्हु की वालिदा मोहतरमा का इस्मे गिरामी फ़ातिमा बिन्त असद बिन बाशिम है और यह पहली ख़ातून हैं जिन्होंने इस्लाम क़ुबूल किया और हिजरत फ़रमाई।।आप करम अल्लाह वजहहुल करीम का सिलसिला-ए-नसब इस तरह है। अली बिन अनी तालिब बिन अब्दुल मुत्तलिब बिन हाशिम बिन अब्दुल मुनाफ़ ।आप रज़ी अल्लाह अन्हु वाक़िया फ़ील के 30 साल बाद पैदा हुए।(सीरत-ए-ख़ुलफ़ा राशीदीन ,स:251) ।
शजर-ए-नसब पदरी : हज़रत अली अल मुर्तज़ा करम अल्लाह वजहहुल करीम का शजर-ए-नसब पदरी कुछ इस तरह है : ‘‘ अली अल मुर्तज़ा करम रज़ी अल्लाह अन्हु बिन अबू तालिब बिन अब्दुल मुत्तलिब बिन हाशिम बिन अब्दुल मुनाफ़ बिन क़ुसई बिन कलाब बिन मुर्रा बिन काब बिन लुई।’’ (तबाक़ात इब्न साद ,ज: सोम ,स:150) ।
शजर-ए-नसब मादरी : हज़रत अली अल मुर्तज़ा करम अल्लाह वजहहुल करीम का शजर-ए-नसब पदरी कुछ इस तरह है :‘‘ फ़ातिमा बिन्त असद बिन हाशिम बिन अब्दुल मुनाफ़ बिन क़ुसई बिन कलाब बिन मुर्रा बिन काब बिन लुई।’’ ((तबाक़ात इब्न साद ,ज: सोम ,स:150) ।
*हुलिया मुबारका*
हज़रत अली अल मुर्तज़ा रज़ी अल्लाह अन्हु का क़द मियाना, रंग गंदुमी, आँखें बड़ी, सीना चौड़ा और जिस्म पर बाल बकसरत थे। आप ही उनके बाज़ू और पिंडलीयों पर गोश्त ज़्यादा था और जिस्म मुबारिक़ क़दरे फ़र्बा था। आप भी बीवी के कंधे चौड़े और मज़बूत थे और सर मुबारिक़ के बाल क़दरे कम थे। आप पैसे की रेश मुबारिक़ घनी थी और जो कोई आप टाया है के सरापा को देखता था वो इस में खो जाता था। हज़रत अली अल मुर्तज़ा या सादा लिबास ज़ेब तन फ़रमाते थे और आप नबी का लिबास दो चादरों से ज़्यादा न होता था। आप मैली मौलवी सर पर हमेशा इमामा बांधते थे। (तारीख़ तबरी जिल्द सोम ,स: 360) ।
सरकारﷺ की परवरिश में
और एलान-ए-नबूवत से पहले ही मौला-ए-कुल सैय्यद-उर-रसूल जनाब अहमद मुजतबा मोहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहु तआला अलैहि व आलेही वसल्लम की परवरिश में आए के जब कुरैश कहत में मुब्तला हुए थे तो हुज़ूर ﷺने अबू तालिब पर अयाल का बोझ हल्का करने के लिए हज़रत अली करम अल्लाह वजहहुल करीम को ले लिया था। इस तरह हुज़ूर ﷺ के साए में आप रज़ी अल्लाह अन्हु ने परवरिश पाई और उन्हीं की गोद में होश संभाला, आँख खुलते ही हुज़ूर ﷺम का जमाल-ए-जहाँ आरा देखा। आपﷺम ही की बातें सुनें और आपﷺ ही की आदतें सीखीं। इस लिए बनूँ की नजासत से आप करम अल्लाह वजहहुल करीम का दामन कभी आलूदा न हो यानी आप करम अल्लाह वजहहुल करीम ने कभी बुत परस्ती न की और इसी लिए‘‘ करम अल्लाह ताला वजहहु’’आप रज़ी अल्लाह ताला अन्हु का लक़ब हुआ।
*आप की हिजरत*
सरकार अक़दसﷺने जब खुदा-ए-ताला के के मुताबिक़ मक्का मुअज़्ज़मा से मदीना तैयबा की हिजरत का इरादा फ़रमाया तो हज़रत अली करम अल्लाह वजहहुल करीम को बुला कर फ़रमाया कि मुझे खुदा-ए-ताला की तरफ़ से हिजरत का हुक्म हो चुका है लिहाज़ा मैं आज मदीना रवाना हो जाऊँगा। तुम मेरे बिस्तर पर मेरी सब्ज़ रंग की चादर ओढ़ कर सो रहो। तुम्हें कोई तकलीफ़ न हो गी कुरैश की सारी अमानतें जो मेरे पास को रखी हुई हैं उन के मालिकों को दे कर तुम भी मदीने चले आना। यह मौक़ा बड़ा ही ख़ौफ़नाक और निहायत ख़तरा का था। हज़रत अली करम अल्लाह वजहहुल करीम को मालूम था कि कुफ़्फ़ार कुरैश सोने की हालत में हुज़ूर ﷺके क़त्ल का इरादा कर चुके हैं इसी लिए खुदा-ए-ताला ने आपﷺ को अपने बिस्तर पर सोने से मना फ़रमा दिया है। आज हुज़ूर ﷺ का बिस्तर क़त्ल गाह है लेकिन अल्लाह के महबूब दाना-ए-ख़फ़ाया व ग़यूब जनाब अहमद मुजतबा मोहम्मद मुस्तफ़ा ﷺके इस फ़रमान से कि ‘‘ तुम्हें कोई तकलीफ़ न हो गी कुरैश की अमानतें दे कर तुम भी मदीना चले आना। ’’ हज़रत अली करम अल्लाह वजहहुल करीम को पूरा यक़ीन था कि दुश्मन मुझे कोई तकलीफ़ नहीं पहुंचा सकेंगे मैं ज़िंदा रहूँगा और मदीना ज़रूर पहुँचूँगा लिहाज़ा सर का र अक़दस सﷺम का बिस्तर जो आज बाज़ाहिर काँटों का बिछौना था वो हज़रत अली करम अल्लाह वजहहुल करीम के लिए फूलों की सेज बन गया इस लिए कि उन का अक़ीदा था कि सूरज मशरिक़ के बजाए मग़रिब से निकल सकता है मगर हुज़ूर सल्लल्लाहु ताला अलैहि वसल्लम के फ़रमान के ख़िलाफ़ नहीं हो सकता। हज़रत अली करम अल्लाह वजहहुल करीम फ़रमाते हैं कि मैं रात भर आराम से है सोया सुबह उठ कर लोगों की अमानतें उन के मालिकों को सौंपना शुरू कीं और किसी से नहीं छुपा। इसी तरह मक्का में तीन दिन रहा फिर अमानतों के अदा करने के बाद मैं भी की मदीना की तरफ़ चल पड़ा। रास्ता में भी किसी ने मुझ से कोई तअर्रुज़ न किया यहां तक कि मैं कुबा में पहुंचा। हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम हज़रत कुलसूम रज़ी अल्लाह अन्हा के मकान में तशरीफ़ फ़रमाथे मैं भी वही ठहर गया। (असदु अल ग़ाबा, अली बिन अबी तालिब, 104/4) ।
*हज़रत अली रज़ी अल्लाह अन्हु और कश्फ़ व करामात*
हज़रत अली अल मुर्तज़ा करम अल्लाह वजहहुल करीम साहिब कश्फ़ व करामात थे और आपﷺ की हयात तैयबा में और बाद विसाल भी कई करामातों का ज़ुहूर हुआ। ज़ैल में आप रज़ी अल्लाह अन्हु की चंद करामात इख़्तिसार के साथ बयान की जा रही हैं।
बोसदा दीवार : हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ अली अल्लाह से मरवी है फ़रमाते हैं कि एक मरतबा हज़रत अली अल मुर्तज़ा या बीवी एक ख़स्ता हाल दीवार के साए में बैठे किसी मुक़द्दमा का फ़ैसला नाज़ है थे। मुक़द्दमा के दौरान लोगों ने शोर मचाया कि अमीर उल मोमिनीन! यह दीवार ख़स्ता हाल है और हमें ख़तरा है कि कहीं यह गिर न जाए? हज़रत अली अल मुर्तज़ा करम अल्लाह वजहहुल करीम ने इत्मीनान से फ़रमाया कि मुक़द्दमा की कारोवाई जारी रखो अल्लाह अज़्ज़वजल बेहतरीन हिफ़ाज़त फ़रमाने वाला है। फिर आप करम अल्लाह वजहहुल करीम ने इंतिहाई इत्मीनान के साथ मुक़द्दमा सुना और इस मुक़द्दमा का फ़ैसला करने के बाद वहां से चल दीये। जैसे ही आप करम अल्लाह वजहहुल करीम इस दीवार के साया से उठ कर रवाना हुए वो ख़स्ता हाल दीवार गिर गई। (तारीख़ अल ख़ुलफ़ा, स:258) ।
सैलाब में कमी: हज़रत अली अल मुर्तज़ा करम अल्लाह वजहहुल करीम के ज़माना ख़िलाफ़त में एक मरतबा नहर फ़ुरात में शदीद तुग़यानी के बाइस सैलाब आगया जिस से तमाम लोग मुतास्सिर हुए और फ़सलें बर्बाद हो गईं। लोग आप की ख़िदमत में हाज़िर हुए और दाद रसी की दरख़ास्त की। आप इस वक़्त उठ खड़े हुए और हुज़ूर नबी करीम ﷺ का जुब्बा मुबारिक़ व इमामा शरीफ़ और चादर पाक ज़ेब तन फ़रमाई फिर घोड़े पर सवार हुए और एक जमाअत आ प के साथ रवाना हुई जिस में हज़रत सैय्यदना इमाम हसन और हज़रत सैय्यदना इमाम हुसैन मबनी ये भी थे। हज़रत अली अल मुर्तज़ा अली करम अल्लाह वजहहुल करीम नहर फ़ुरात के पुल पर पहुंचे और अपने असा से नहर फ़ुरात की जानिब इशारा किया तो नहर का पानी फ़ौरी तौर पर कम हो गया। आप भी यूनियन ने दूसरी मरतबा इशारा फ़रमाया तो मज़ीद पानी कम हो गया। फिर जब आप की अल्लाह ने तीसरी मरतबा इशारा फ़रमाया तो सारा पानी उतर गया और सैलाब ख़त्म हो गया यह देख कर लोगों ने शोर मचाना शुरू कर दिया अमीर उल मोमिनीन! बस कीजये इस क़दर ठीक है। (शवाहिद उन नबुव्वत सिफ़र 282,283) ।
एक साअत में क़ुरान ख़त्म करना: हज़रत अली अल मुर्तज़ा माली इन को अल्लाह अज़्ज़वजल ने यह कुव्वत अता फ़रमाई थी कि आप अला ये घोड़े पर सवारी के वक़्त एक रिकाब में पाँव डालते तो क़ुरान मजीद शुरू करते और दूसरे रिकाब में पाँव डालने तक आप की यह क़ुरान मजीद ख़त्म कर लिया करते थे। (शवाहिद उन नबुव्वत,स: 280) ।
मदफ़न इमाम हुसैन रज़ी अल्लाह अन्हु से आगा ही: हज़रत अब्दुल्लाह फ़रमाते हैं कि एक मरतबा हम लोग हज़रत अली अल मुर्तज़ा करम अल्लाह वजहहुल करीम के हमराह सफ़र कर रहे थे कि हमारा गुज़र इस जगह से हुआ जहां आज इमाम हुसैन भी कुनीद की क़ब्र मुबारिक़ है। आप भी अल्लाह ने फ़रमाया इस जगह आने वाले दौर में आले रसूल से यम का एक क़ाफ़िला क़ियाम करे गा और इस जगह उन के ऊंट बंधे हुए होंगे और इसी मैदान में जवानान अहले बैत मी बेनीम की शहादत होगी और यह जगह शहीदों का मदफ़न बने गी और ज़मीन व आसमान इन लोगों पर रोएंगे। (शवाहिद अहर व सिफ़र,स: 386) ।
बीनाई जाती रही:हज़रत अली अल मुर्तज़ा अली इन की ख़िदमत में एक शख़्स आप बड़ी तैयबा के मुख़ालिफ़ीन का जासूस बन कर रहता था और आप की इन की खुफिया बातों की इतलाआत आप की एलियन के मुख़ालिफ़ीन को पहुंचा ता रहता था। एक दिन आप तैय नरीना ने इस से इस बारे दरयाफ़्त किया तो इस ने क़समें खाना शुरू कर दीं और अपनी बे गुनाही का यक़ीन दिलाना शुरू कर दिया। हज़रत अली अल मुर्तज़ा अली ने इस की दीदा दिलेरी देख कर जलाल में आगए और फ़रमाया अगर तू झूटा है तो अल्लाह अज़्ज़वजल तेरी आँखों की बीनाई छीन ले। चंद दिन ही गुज़रे थे कि इस शख़्स की आँखों की बीनाई जाती रही और वो नाबीना हो गया और लोग उसे लाठी पकड़ा कर चलाते थे। (शवाहिद उन नबुव्वत सिफ़र 229) ।
फ़ज़ीलत अली अल मुर्तज़ा करम अल्लाह वजहहुल करीम बरूए अहादीस:
हज़रत अली अल मुर्तज़ा करम अल्लाह वजहहुल करीम की फ़ज़ीलत के बारे में मुताअद्दिद अहादीस मरवी हैं और हुज़ूर नबी करीम ﷺ ने कई मवाक़े पर आप रज़ी अल्लाह अन्हु के फ़ज़ाइल बयान फ़रमाए। ज़ैल में चंद अहादीस बतोर नमूना पेश की जा रही हैं।
मोमिन बुग़्ज़ नहीं रखता: उम्मुल मोमिनीन हज़रत उम्मे सलमा रज़ी अल्लाह अन्हा से मरवी है फ़रमाती हैं हुज़ूर नबी करीम ﷺ ने फ़रमाया कि मुनाफ़िक़ अली रज़ी अल्लाह अन्हु से मुहब्बत नहीं रखता और मोमिन अली रज़ी अल्लाह अन्हु से बुग़्ज़ नहीं रखता। (सुनन अल तिरमिज़ी ) ।
अली रज़ी अल्लाह अन्हु से मुहब्बत, अल्लाह से मुहब्बत है: हुज़ूर नबी करीम ﷺने एक मौक़े पर फ़रमाया जिस ने अली रज़ी अल्लाह अन्हु से मुहब्बत की इस ने मुझ से मुहब्बत की और जिस ने मुझ से मुहब्बत की इस ने अल्लाह से मुहब्बत की और जिस ने अली रज़ी अल्लाह अन्हु से दुश्मनी मोल ली इस ने मुझ से दुश्मनी मोल ली और जिस ने मुझ से दुश्मनी मोल ली इस ने अल्लाह से दुश्मनी मोल ली। (तारीख़ अल तल्फ़ा ,स:935) ।
शहर इल्म का दरवाज़ा: हुज़ूर नबी करीम ﷺने एक मौक़े पर फ़रमाया कि जिस ने अली रज़ी अल्लाह अन्हु को बुरा कहा बिला शुबा इस ने मुझे बुरा कहा और मैं इल्म का शहर हूँ और अली रज़ी अल्लाह अन्हु शहर इल्म का दरवाज़ा है। (मुस्तदरक अल हाकिम जिल्द चहारुम किताब मरक़ा असहाब अना मा ये अल इल्म हदीस3994) ।
मैं औरअली एक ही दरख़्त की शाख़ें हैं: हज़रत जाबिर बिन अब्दुल्लाह रज़ी अल्लाह अन्हु से मरवी है कि एक मरतबा हुज़ूर नबी करीम ﷺने फ़रमाया कि तमाम लोग मुख़्तलिफ़ दरख़्तों की शाख़ें हैं जबकि मैं और अली एक ही दरख़्त की शाख़ें हैं। (तारीख़ इतलाअ ,सफ़हा:832) ।
अली रज़ी अल्लाह अन्हु को देखना भी इबादत है: हज़रत अब्दुल्लाह बिन मसऊद रज़ी अल्लाह अन्हु से मरवी है फ़रमाते हैं हुज़ूर नबी करीम ﷺने फ़रमाया अली रज़ी अल्लाह अन्हु को देखना भी इबादत है। (तारीख़ अल तल्लाअ, सफ़हा249) ।
तू मेरा है मैं तेरा हूँ: हुज़ूर नबी करीम से हम ने हज़रत अली अल मुर्तज़ा अली अलैहि के मुताल्लिक़ फ़रमाया तू मेरा है और मैं तेरा हूँ। (सही बुख़ारी जिल्द दुव्वम किताब अल मनाक़िब बाब मनाक़िब अली या हदीस 897) ।
मर्दों में सब से ज़्यादा मुहब्बत: उम्मुल मोमिनीन हज़रत आइशा सिद्दीक़ा रज़ी अल्लाह अन्हा से पूछा गया कि हुज़ूर नबी करीम ﷺ को सब से ज़्यादा मुहब्बत किस से थी? आप रज़ी अल्लाह अन्हा ने फ़रमाया हज़रत सैय्यदा फ़ातिमा ज़हरा रज़ी अल्लाह अन्हा से । सवाल करने वाले ने पूछा हुज़ूर नबी करीम ﷺमर्दों में किस से ज़्यादा मुहब्बत रखते थे? आप रज़ी अल्लाह अन्हा ने फ़रमाया हज़रत अली अल मुर्तज़ा ली ली है। (जामे तिरमिज़ी जिल्द दुव्वम) ।
फ़ज़ीलत अली अल मुर्तज़ा करम अल्लाह वजहहुल करीम बज़ ज़बान-ए-सहाबा किराम रज़ी अल्लाह अन्हुम : हज़रत अली अल मुर्तज़ा रज़ी अल्लाह अन्हु की फ़ज़ीलत के बारे में सहाबा किराम रज़ी अल्लाह अन्हुम के बे-शुमार अक़वाल हैं और सहाबा किराम रज़ी अल्लाह अन्हुम शरई व फ़िक़ही मसाइल में आप रज़ी अल्लाह अन्हु से बरजूअ करते थे। ज़ैल में सहाबा किराम रज़ी अल्लाह अन्हुम के चंद अक़वाल यहां बतोर नमूना पेश किये जा रहे हैं।
हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ؓ का चेहरा अली ؓ को तकता: उम्मुल मोमिनीन हज़रत आइशा सिद्दीक़ा रज़ी अल्लाह अन्हा से मरवी है फ़रमाती हैं:‘‘ मेरे वालिद हज़रत अबूबक्र सिद्दीक़ रज़ी अल्लाह अन्हु अक्सर हज़रत अली अल मुर्तज़ा रज़ी अल्लाह अन्हु के चेहरे को ग़ौर से देखा करते थे मैं ने एक मरतबा वजह पूछी तो आप रज़ी अल्लाह अन्हु ने फ़रमाया हुज़ूर नबी करीम ﷺने फ़रमाया था कि अली रज़ी अल्लाह अन्हु के चेहरे को देखना भी इबादत है’’ ।( इब्न असाकिर बहवाला तारीख़ दमिश्क़, हदीस: 167) ।
हज़रत उमर फ़ारूक़ ؓ का क़ौल:हज़रत अबू हुरैरा रज़ी अल्लाह अन्हु से मरवी है फ़रमाते हैं कि हज़रत उमर फ़ारूक़ रज़ी अल्लाह अन्हु ने फ़रमाया:‘‘ हज़रत अली अल मुर्तज़ा रज़ी अल्लाह अन्हु को तीन बेहतरीन फ़ज़ीलतें ऐसी अता की गईं जिन में से एक भी अगर मुझे मिल जाती तो वो मेरे नज़दीक दुनिया से ज़्यादा महबूब होती’’ । लोगों ने पूछा कि वो तीन फ़ज़ीलतें कौन सी हैं? आप रज़ी अल्लाह अन्हु ने फ़रमाया :‘‘ पहली फ़ज़ीलत यह कि हुज़ूर नबी करीम ﷺ ने अपनी साहिबज़ादी हज़रत सैय्यदा फ़ातिमा ज़हरा का निकाह उन से किया। दूसरी फ़ज़ीलत यह है कि इन दोनों को मस्जिद में रखा और जो कुछ इन्हें वहां हलाल है मुझे हलाल नहीं। तीसरी फ़ज़ीलत यह कि ग़ज़वा खैबर के दिन इन्हें इल्म अता फ़रमाया’’। (अल बिदाया वल निहाया, सफ़हा: 446) ।
हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास ؓ का क़ौल: हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ी अल्लाह अन्हु से मरवी है फ़रमाते हैं कि हज़रत उमर फ़ारूक़ रज़ी अल्लाह अन्हु ने फ़रमाया :‘‘ हम में बेहतरीन राय रखने वाले अली रज़ी अल्लाह अन्हु हैं और हम में बेहतरीन क़ारी उबई बिन काब रज़ी अल्लाह अन्हु हैं ’’।(मुस्तदरक अल हाकिम जिल्द सोम हदीस:5328) ।
इस तरह से अली अल मुर्तज़ा करम अल्लाह वजहहुल करीम की बे-शुमार फ़ज़ीलतें अहादीस नबवी ﷺ और अक़वाल सहाब-ए-किराम रज़ी अल्लाह अन्हुम में मिलती है बस हमें इस बात को समझने की ज़रूरत है । और अगर हक़ीक़ी मअनों में किसी ने अली अल मुर्तज़ा करम अल्लाह वजहहुल करीम को जान लिया और इन की ज़िंदगी को अपने लिए सरमाया समझ कर इस अमल-ए-पैरा हुआ तो इस की दुनिया भी संवरजائیگی और आख़िरत भी क्यों कि रसूल-ए-अकरम ﷺ का इरशाद मुबारिक़ है : ‘‘जिस ने अली से मुहब्बत की इस ने मुझ से मुहब्बत की और जिस ने मुझ से मुहब्बत की इस ने अल्लाह से मुहब्बत की और जिस ने अली रसे दुश्मनी मोल ली इस ने मुझ से दुश्मनी मोल ली और जिस ने मुझ से दुश्मनी मोल ली इस ने अल्लाह से दुश्मनी मोल ली’’ ।
अल्लाह रब्ब उल इज़्ज़त से दुआ है कि अल्लाह ताला हमें इन की सीरत पर चलने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए और इन जैसा बनने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए आमीन बजाह सैय्यद उल मुरसलीन
✍️तहरीर: मोहम्मद फ़िदा अल मुस्तफ़ा क़ादरी
राब्ता नंबर: 9037099731
पी जी रिसर्च स्कॉलर: दारुल हुदा इस्लामिक यूनिवर्सिटी, केरला