अपनी ज़िंदगी को हर किसी के सामने ज़ाहिर न करें।
हसद अक्सर वहीं से पैदा होता है जहाँ लोग आपके हालात और वसाइल को जान लेते हैं।
कोई आपको नुकसान नहीं पहुंचा सकता जब तक वो आपकी ज़िंदगी की तफ़सीलात न जानता हो।
कोई मंसूबा नाकाम नहीं होता जब तक आप खुद इसे दूसरों के सामने न रख दें। याद रखें, राज़ आपके इख्तियार में हो तो वो आपका कैदी है, लेकिन जब आप इसे किसी को बता देते हैं तो आप खुद उसके कैदी बन जाते हैं।
बाज़ लोग खैरख्वाही के नाम पर भी नुकसान पहुंचा सकते हैं।
अपने घर और खानदान के लिए भी हुदूद तय करें।
कोई भी शख्स बार-बार आपके घर आ कर आपकी कमजोरियां जान सकता है। करीबी रिश्तेदारों के लिए भी एक हद मुक़र्रर करें, क्योंकि हर कोई आपके राज़ को महफूज़ नहीं रख सकता।
इसका मतलब ये नहीं कि ताल्लुकात तोड़ दें, बल्कि ये कि ताल्लुकात में हद और तवाज़ुन कायम रखें।
अपनी ज़िंदगी के तमाम पहलू किसी के सामने न रखें, क्योंकि इंसान के बदलने में वक़्त नहीं लगता। जो कभी सुकून का बाइस होते हैं वही वक़्त आने पर परेशानी का सबब भी बन सकते हैं, अगर आपने उन्हें अपनी कमजोरियां दिखा दी हों।

अपने राज़ को संभाल कर रखें।
अपने घर और खानदान को गैर ज़रूरी बेतकल्लुफी से महफूज़ रखें।
कामयाब मंसूबे दूसरों के साथ शेयर न करें।
ख़ुशी और ग़म दोनों में अपनी ज़बान और जज़्बात पर काबू रखें।

हाल पर नज़र रखें और मुस्तकबिल को सामने रख कर फैसला करें ۔۔
अज़ ۔۔۔मोहम्मद साजिद कासमी