वन्दे मातरम: आज़ादी का नारा या धार्मिक प्रतीक? एक आलोचनात्मक जायज़ा


यह एक कड़वी सच्चाई है कि हिंदुस्तानी सियासत में कुछ मसलों को जानबूझकर ज़िंदा रखा जाता है, इसलिए नहीं कि उनसे कौमी मफ़ाद वाबस्ता हो, बल्कि इसलिए कि उनके सहारे मुआशरे में तक़सीम की लकीर को मज़ीद गहरा किया जा सके। वन्दे मातरम का मसला भी इन्हीं मामलात में शामिल है, जिसे वक़्तन फ़वक़्तन सियासी स्टेज पर ला कर मज़हबी शनाख़्तों को आमने सामने खड़ा कर दिया जाता है। इस तरह के इक़दामात न तो कौमी यकजहती को मज़बूत करते हैं और न ही हुब्बुलवतनी को फ़रोग़ देते हैं, बल्कि यह इख़्तिलाफ़ और बे एतमादी की फ़ज़ा को जन्म देते हैं।
वन्दे मातरम को एक कौमी जज़्बे की अलामत बना कर पेश करना दरअस्ल एक फ़िक्री मुग़ालता है। यह गीत अपनी तारीख़ी और फ़िक्री साख़्त के एतबार से हमेशा इख़्तिलाफ़ का बाइस रहा है। आज़ादी से क़ब्ल भी इस पर शदीद एतराज़ात किए गए और आज़ादी के बाद भी इस की मुतनाज़ा हैसियत में कोई बुनियादी तब्दीली नहीं आई। इस हक़ीक़त से सिर्फ़-ए-नज़र नहीं किया जा सकता कि इस के बा'ज़ तसव्वुरात मुसलमानों के मज़हबी अक़ाइद से बराहे रास्त मुतसादिम हैं, और यही तसादुम इस तनाज़े की असल बुनियाद है। मुसलमानों का एतराज़ महज़ जज़्बाती या सियासी नहीं बल्कि ख़ालिस अक़ीदे से जुड़ा हुआ है। इस्लाम की असास तौहीद पर क़ायम है, जिस में किसी भी ग़ैर अल्लाह की ताज़ीम या तक़दीस की गुंजाइश नहीं। वन्दे मातरम के बा'ज़ हिस्से ऐसे तसव्वुरात पर मबनी हैं जिन्हें एक मुसलमान मज़हबी तौर पर क़बूल नहीं कर सकता। इस हक़ीक़त को समझे बग़ैर मुसलमानों से इस गीत के इसरार की तवक़्क़ो रखना न सिर्फ़ ग़ैर मुंसिफ़ाना है बल्कि आईनी उसूलों से भी मुतसादिम है।
बात भी तारीख़ी रिकॉर्ड का हिस्सा है कि आज़ादी की तहरीक के दौरान ख़ुद कांग्रेस के अंदर इस मसले पर मुकम्मल इत्तेफ़ाक़ राय मौजूद नहीं था। पंडित जवाहर लाल नेहरू ने कभी इसे कौमी तराना तस्लीम करने पर इसरार नहीं किया, जबकि सुभाष चंद्र बोस जैसे क़ौम परस्त रहनुमा भी इस के मुख़ालिफ़ीन में शामिल थे। कांग्रेस ने बाद में इस के बा'ज़ हिस्सों को मुतनाज़ा क़रार दे कर हज़फ़ किया, जो इस बात का वाज़ेह एतराफ़ था कि यह गीत सब के लिए क़ाबिल-ए-क़बूल नहीं। मुतअद्दिद कौमी और समाजी रहनुमाओं ने इस गीत को फ़िर्क़ा वाराना जज़्बात को भड़काने का ज़रीया क़रार दिया। आल इंडिया तलबा यूनियन ने इसे तलबा इज्तिमाआत के लिए नामौज़ूं बताया, जबकि एम एन राय जैसे सोशलिस्ट मुफ़क्किर ने मुसलमानों के एतराज़ात को उसूली और दुरुस्त क़रार दिया। डॉक्टर राम मनोहर लोहिया ने तो यहां तक कहा कि ”आनंद मठ“ नावल, जिस में यह गीत शामिल है, हमारी कौमी तारीख़ के एक तारीक पहलू की नुमाइंदगी करता है।
बनकम चंद्र चटर्जी के फ़िक्री पस मंज़र को नज़रअंदाज़ कर के वन्दे मातरम को महज़ एक ग़ैर जानिबदार कौमी अलामत क़रार देना भी दुरुस्त नहीं। ख़ुद अदबी और फ़िक्री हलक़ों में यह बात तस्लीम की गई है कि यह गीत दुर्गा देवी की वंदना से जुड़ा हुआ है और बंगाल की मज़हबी रिवायत की तर्जुमानी करता है। ऐसे में यह तवक़्क़ो रखना कि मुसलमान इसे मज़हब से मावरा महज़ कौमी जज़्बे के तौर पर क़बूल कर लें, हक़ीक़त पसंदाना नहीं। इसी पस मंज़र में यह बात समझना ज़रूरी है कि वन्दे मातरम की कोई आईनी या क़ानूनी हैसियत नहीं जो इसे लाज़िमी क़रार दे। किसी शहरी को, ख़्वाह वह किसी भी मज़हब से ताल्लुक़ रखता हो, इस के पढ़ने या कहने पर मजबूर नहीं किया जा सकता। जम्हूरियत मुआशरे में हुब्बुलवतनी का पैमाना किसी एक नारे या गीत को क़रार देना आईनी रूह के मुनाफ़ी है।
आज़ादी के बाद मुख़्तलिफ़ हुकूमतों ने इस मसले को कभी दबाया और कभी सियासी फ़ायदे के लिए उभारा, मगर इस का बुनियादी तनाज़ा आज भी बरकरार है। सवाल यह नहीं कि वन्दे मातरम कहा जाए या न कहा जाए, बल्कि असल सवाल यह है कि क्या इस मुल्क में हुब्बुलवतनी को ज़बरदस्ती के पैमाने पर नापा जाएगा, या आईन के दायरे में रह कर तनव्वुअ और इख़्तिलाफ़ को क़बूल किया जाएगा?
यूपी में बी जे पी और जनता पार्टी की मख़लूत हुकूमत के दौर में स्कूलों के अंदर वन्दे मातरम को पढ़ाने की मुनज़्ज़म तहरीक चलाई गई, जिस का मक़सद महज़ तालीमी नहीं बल्कि नज़रियाती था। आज एक मरतबा फिर बी जे पी इसी मसले को सियासी फ़ायदे के लिए उछाल रही है। 15 अगस्त 1947 के बाद जब हुकूमत-ए-हिंद ने आज़ादी की पचास साला गोल्डन जुबली मनाने का एलान किया तो 12 जमाअती कुल हिंद महाज़ की मरकज़ी हुकूमत के दौर में भी दूरदर्शन के ज़रीये मुख़्तलिफ़ सूरतों और अंदाज़ में वन्दे मातरम की भरपूर तशहीर की गई। हालानके हक़ीक़त यह है कि यह तराना न तो तहरीक-ए-आज़ादी का मुत्तफ़क़ा गीत है और न ही इसे किसी एक क़ौम या मज़हब पर ज़बरदस्ती मुसल्लत किया जा सकता है। अगर वन्दे मातरम के मुकम्मल मफ़हूम और तर्जुमे को सामने रखा जाए तो इस की नौईयत ख़ुद वाज़ेह हो जाती है।
(1) मैं तेरा बंदा हूँ ऐ मेरी माँ
मेरे अच्छे पान, अच्छे फलों
भीनी भीनी ख़ुशबू, जुनूबी हवाओं
शादाब खेतों वाली मेरी माँ
(2) हुसैन चांदनी से रोशन
शगुफ़्ता फूलों वाली, गुंजान दरख़्तों वाली
मीठे फलों, मीठी ज़बान वाली
सुख देने वाली, बरकत देने वाली
(3) तीस करोड़ की पुरजोश आवाज़ें
साठ करोड़ बाज़ुओं में तलवारों को उठाए हुए
क्या इतनी ताक़त के होते हुए भी
ऐ माँ तू कमज़ोर है
तू ही हमारे बाज़ुओं की क़ुव्वत है
मैं तेरे क़दमों को चूमता हूँ
(4) तू ही मेरा बातिन, तूही मेरा मरकज़
तू ही जिस्म के अंदर की जान
तू ही बाज़ुओं की क़ुव्वत है
दिल के अंदर तेरी हक़ीक़त है
तेरी महबूब मूरती है एक एक मंदिर में
(5) तू ही दुर्गा, दस मुसल्लह हाथों वाली
तू ही कमला है कँवल के फूलों की बहार
तू ही पानी है, इल्म है, बहरा वर करने वाली
मैं तेरा ग़ुलाम हूँ, ग़ुलाम का ग़ुलाम हूँ
ग़ुलाम के ग़ुलाम का ग़ुलाम हूँ
अच्छे पानी अच्छे फलों वाली
मेरी माँ मैं तेरा बंदा हूँ
लहलहाते खेतों वाली, मुक़द्दस मोहनी आरास्ता व पैरास्ता
बड़े क़ुदरत वाली, क़ायम व दाइम माँ, मैं तेरा बंदा हूँ
(आनंद मठ)
यह भी एक नाक़ाबिल-ए-तरदीद हक़ीक़त है कि इस गीत के ख़ालिक़ बनकम चंद्र चटर्जी ने ”हाजी मोहसिन फंड“ के वज़ीफ़े पर अपनी तालीम जारी रखी और बी ए की डिग्री हासिल की, मगर इसी के साथ उन्होंने आनंद मठ जैसा नावल लिख कर मोहसिन कशी का सुबूत भी दिया। (ज़मींदार अख़बार, मौलाना ज़फ़र अली ख़ां, 12 अक्टूबर 1937)। वन्दे मातरम का यह गीत आनंद मठ नामी बंगाली नावल का हिस्सा है, जो एक फ़र्ज़ी दास्तान पर मबनी है। इस कहानी में यह तराना हिंदूओं की एक ख़ुफ़िया मज़हबी और नीम मज़हबी तंज़ीम का नारा क़रार दिया गया है। इस नावल के ज़रीये यह तसव्वुर घड़ा गया कि तक़रीबन एक सौ सत्तर साल क़ब्ल, नावल की तस्नीफ़ से पहले, बंगाल में मुसलमानों की हुकूमत को ख़त्म करने के लिए साज़िशें हो रही थीं। मुसलमानों की हुकूमत के खात्मे और हिंदू इक़्तिदार के क़याम के लिए वन्दे मातरम को एक जंगी नारे के तौर पर इस्तेमाल किया गया।
नावल का मरकज़ी किरदार एक संन्यासी है जिस के ज़रीये पूरी कहानी बयान की जाती है। इस का नाम भवानंदा है, जो अपने मिशन के लिए लोगों को मुनज़्ज़म और भर्ती करता है। इसी दौरान इस की मुलाक़ात एक नौजवान महेंद्र से होती है। भवानंदा उसे वन्दे मातरम के मा'नी समझाने की कोशिश करता है और कहता है कि जब तक इस मुल्क से मलच्छों (मुसलमानों) को निकाल नहीं दिया जाता, न तेरा धर्म महफ़ूज़ रह सकता है और न ही अपने मज़हब पर क़ायम रहना मुमकिन है। इस पर महेंद्र सवाल करता है कि क्या तुम तन्हा ही मुक़ाबला करो गे? भवानंदा जवाब देता है कि तीस करोड़ आवाज़ें बुलंद होंगी, साठ करोड़ हाथों में तलवारें लहराएंगी, तो क्या इतनी क़ुव्वत के होते हुए भी हमारी माता कमज़ोर रहेगी? यही वन्दे मातरम का तीसरा बंद है।
महेंद्र को इस जवाब से भी इतमीनान हासिल नहीं होता। वह भवानंदा से कहता है कि मुसलमानों की क़ुव्वत उन की काहिली और सुस्ती है, जबकि अंग्रेज़ मैदान-ए-जंग से नहीं भागता, चाहे इस की जान ही क्यों न चली जाए। मगर मुसलमान, इस के बक़ौल, बुज़दिल है, मामूली ख़तरा देखते ही पसपा हो जाता है और पसीना आते ही भाग निकलता है। अगली सुबह भवानंदा महेंद्र को आनंद मठ ले जाता है, जो इसी नावल का उनवान भी है। मंदिर का ब्रह्मचारी महंत महेंद्र को अंदर ले जाता है। मंदिर नीम रोशन होता है, मगर इस तक पहुंचने का रास्ता तारीकी में डूबा होता है। महेंद्र मंदिर के अंदर दाख़िल हो कर देखता है कि विष्णु की एक अज़ीम शान मूरती नसब है, जिस के एक हाथ में संख, दूसरे में कड़ा, तीसरे में डंडा और चौथे में कँवल है। इस के दाएं जानिब लक्ष्मी और बाएं जानिब सरस्वती की मूरती मौजूद है। विष्णु की मूरती की गोद और क़दमों में ख़ून आलूद सर रखे हुए दिखाई देते हैं। ब्रह्मचारी महंत इस से पूछता है कि तू ने क्या देखा? महेंद्र जवाब देता है कि हाँ, मगर यह कौन है? ब्रह्मचारी कहता है कि वह माता है, वन्दे मातरम कहो। इस के बाद वह महेंद्र को एक और हुजरे में ले जाता है जहां दुर्गा देवी की बड़ी और पुरशकोह मूरती नसब है। ब्रह्मचारी कहता है कि हम तुझे डंडवत करते हैं, ऐ माता दुर्गा! जिस के दस दस हाथ हैं, तू ही लक्ष्मी है जो कँवल में रहती है और तू ही दानी है, जो हमें इल्म अता करती है।
(वन्दे मातरम का चौथा बंद)
इस मरहले पर महेंद्र के अंदर एक वाज़ेह तब्दीली पैदा हो जाती है। इस के लहू में क़सम खाने की हरारत दौड़ने लगती है और वह एलान करता है: मैं क़सम खाता हूँ। इस के बाद नावल के तीसरे हिस्से के आठवें बाब में क़त्ल व ख़ून, लूट मार और बर्बरीयत के वह मनाज़िर बयान किए गए हैं जिन से हिंदू वीरों के अंदर माता की सेवा का ऐसा जुनूनी जज़्बा उभरता है कि वह मुसलमानों के लिए अरसा हयात तंग कर देते हैं। मुसलमान अपनी जानें बचाने के लिए हर सम्त भागते दिखाई देते हैं। चारों तरफ़ शोर ओ ग़ोग़ा बरपा है, “मुसलमान को मारो, लूटो” की सदाएं बुलंद हो रही हैं, और वन्दे मातरम का नारा फ़ज़ा में गूंज रहा है। माता के सेवकों से वह बात कहलवाई जा रही है जो दरअस्ल इस नावल की असल ग़रज़ ओ ग़ायत को बे नक़ाब करती है। यह कहा जाता है: भाई, वह दिन कब आएगा जब हम मस्जिदों को मुसममार करेंगे और उन की जगह राधे और महादेव के मंदिर तामीर करेंगे। नावल के इख़्तिताम पर आनंद मठ का हीरो अपने पैरौकारों से कहता है:“अब अंग्रेज़ आ गए हैं, हमारी जान ओ माल को अमान मिलेगी।“
इस नावल का यह जुमला निहायत तवज्जोह तलब है। जिस नावल में अंग्रेज़ों की आमद को ख़ैर मुक़द्दम किया जाए, उन्हें अमन ओ तहफ़्फ़ुज़ की ज़मानत दी जाए, और इसी नावल के गीत को आज़ादी की गोल्डन जुबली के मौक़े पर मुल्क भर में फ़रोग़ दिया जाए, तो यह सवाल फ़ित्री तौर पर पैदा होता है कि आख़िर वन्दे मातरम की तरवीज का जवाज़ क्या है? इसी बुनियाद पर मुसलमान इस बात के हक़दार हैं कि वह वन्दे मातरम न पढ़ें और इस के पढ़े जाने के वक़्त एहतरामन खड़े होने से भी इनकार करें। इस मुतनाज़ा गीत की मुख़ालफ़त में यही जज़्बा कारफ़रमा होना चाहिए।
वन्दे मातरम में मुल्क को दुर्गा के क़ालिब में पेश कर के इस के सामने सर झुकाने का एलान किया गया है, जो इस्लामी नुक्ता-ए-नज़र से अक़ीदे और ईमान के सरासर मुनाफ़ी है, इस लिए मुसलमानों के लिए इसे क़बूल करना मुमकिन नहीं। बंगाली नावल आनंद मठ के मुस्लिम दुश्मन पस मंज़र की रोशनी में वन्दे मातरम इस हक़ीक़त को वाज़ेह करता है कि इस दौर में नौजवान नस्ल के अंदर मुसलमानों के ख़िलाफ़ नफ़रत पैदा करने के लिए इस तराने को बतौरे ज़रीया इस्तेमाल किया गया। एक मंदिर में दुर्गा देवी की मूरती के सामने एक हिंदू नौजवान से इबादत के अंदाज़ में यह तराना पढ़वाया जाना इस बात को पूरी तरह आश्कार कर देता है कि इस गीत का ख़ालिस मज़हबी पस मंज़र मुसलमानों के अक़ाइद से हम आहंग नहीं। इसी वजह से आज़ादी से पहले भी और आज़ादी के बाद भी वन्दे मातरम मुतनाज़ा ही रहा। यहां तक कि गुजरात हाई कोर्ट ने मुसलमानों के मज़हबी जज़्बात का एहतराम करते हुए इस के लाज़िमी नफ़ाज़ पर पाबंदी आइद कर दी थी।
मुसलमानों का रवैया हमेशा यह रहा है कि वह मुल्क के हर ज़र्रे से मुहब्बत करते हैं, मगर इस की परस्तिश नहीं कर सकते, और न ही इसे हिंदू देवमाला के दायरे में क़बूल कर सकते हैं। वन्दे मातरम में जो कुछ कहा गया है वह इस्लामी फ़िक्र और अक़ीदे पर बराहे रास्त ज़रब लगाता है, इस लिए किसी भी सूरत में इसे क़बूल नहीं किया जा सकता। बा'ज़ माहिरिन यह दावा करते हैं कि वन्दे मातरम आज़ादी के मतवालों का गीत था, मगर यह दावा तारीख़ी तौर पर दुरुस्त नहीं। यह न आज़ादी के मतवालों का गीत था और न ही राष्ट्र गान। मशहूर शायर असद अल्लाह ख़ान ग़ालिब और दीगर मौअर्रिख़ीन के मुताबिक़ 1857 की तहरीक-ए-आज़ादी के हामियों में सिर्फ़ दिल्ली में पचपन हज़ार उलमा और दीगर मुसलमानों को अंग्रेज़ों ने फांसी दी, मगर इन में कोई भी वन्दे मातरम पढ़ने वाला नहीं था।
तहरीक-ए-आज़ादी में शामिल लोगों में कोई कलिमा गो था, कोई गुरु नानक को याद करने वाला, कोई हिंदू था तो वह माँ भवानी का नाम लेता था। यह सब अपने अपने मज़हबी पस मंज़र के मुताबिक़ नारे लगाते थे। मगर यह कहना कि वन्दे मातरम आज़ादी का नारा था, सरासर ग़लत और तारीख़ से नावाक़फ़ियत की अलामत है। अगर कोई नारा हक़ीक़ी मा'नों में आज़ादी का तर्जुमान था तो वह “इंक़लाब ज़िंदाबाद” और “सरफ़रोशी की तमन्ना” जैसे नारे थे।
वन्दे मातरम वतन परस्ती का पैमाना नहीं है। एक शख़्स अपने मज़हब पर मुकम्मल अमल करते हुए भी सच्चा वतन परस्त हो सकता है। असल वतन परस्ती ईमान दारी, इख़्लास और मुल्क की तरक़्क़ी व ख़ुशहाली की ख़्वाहिश में मुज़्मिर है। वन्दे मातरम गाने वालों में कितने ऐसे लोग हैं जो बदउनवानियों में मुलव्वस हैं, मगर इन्हें कोई सवाल करने वाला नहीं। हक़ीक़त यह है कि वन्दे मातरम का मसला मुसलमानों के ख़िलाफ़ एक सोची समझी साज़िश है, जो उन की इज़्ज़त, वक़ार और अक़ीदे पर हमला है। मुसलमानों के लिए किसी भी हाल में वन्दे मातरम पढ़ना जाइज़ नहीं हो सकता।

✍️इस क़लम: मोहम्मद फ़िदा अल मुस्तफ़ा क़ादरी 
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पी जी रिसर्च स्कॉलर: दार अल हुदा इस्लामिक यूनिवर्सिटी, केरला