बहन का हक़ ग़सब करने वाले भाई—संभल जाओ!

तहरीर: मोहम्मद मसूद रहमानी अररियावी (सदाए क़लम)

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कुछ भाई बड़े फ़ख़्र से माथे पर सजदों के निशान सजाए, हाथ में तस्बीह थामे मस्जिद की पहली सफ़ में नज़र आते हैं, लेकिन जब घर लौटते हैं तो उनकी तिजोरियाँ अपनी ही बहनों के खून पसीने की कमाई और उनके विरासत के हक़ से भरी होती हैं।

याद रखो! बहन की विरासत कोई ख़ैरात या भीख नहीं है जो तुम अपनी मर्ज़ी से उसे दो या न दो, बल्कि यह अल्लाह तबारक व तआला का मुक़र्रर करदा वह हक़ है जिसे हड़प करना बराहे रास्त अल्लाह से जंग करने के मुतरादिफ़ है।

बहनें उमूमन हया और मुरव्वत में ख़ामोश रहती हैं, वह नहीं चाहतीं कि भाई से ताल्लुक़ ख़राब हो, लेकिन भाई इस ख़ामोशी को अपनी जीत समझ लेते हैं। क्या तुम भूल गए कि तुम जिस माल पर साँप बन कर बैठे हो, वह कल तुम्हारे लिए जहन्नम का ईंधन बनेगा? तुम अपनी औलाद को वह रिज़्क़ खिला रहे हो जिसमें तुम्हारी यतीम या बेसहारा बहन की आहें शामिल हैं।

तंबीह:

अगर तुम ने दुनिया में बहन का हक़ मार कर उसे "महरूम" कर दिया, तो कल क़यामत के दिन अल्लाह तुम्हें अपनी रहमत से महरूम कर देगा। बहन का हक़ मारने वाला भाई चाहे कितने ही हज कर ले या कितनी ही तस्बीहाँ पढ़ ले, वह ज़ालिम है और अल्लाह ज़ालिमों को हिदायत नहीं देता।

अभी वक़्त है, तौबा करो और अपनी बहनों को उनका जाइज़ शरई हक़ उनके घर जा कर इज़्ज़त के साथ दे कर आओ, इस से पहले कि मौत का फ़रिश्ता तुम्हारा गिरेबान पकड़ ले।

शेर:

बहन का हक़ दबा कर तुम बने बैठे हो जो "मसूद"

जहन्नम की दहकती आग में जलना पड़ेगा तुम को