टिप्पणी पुस्तक पर 
बनाम "मकालात नोमानी"
काविश : हज़रत मौलाना मुफ्ती अबुल कासिम नोमानी दामत बरकातहुमुल आलिया 
टिप्पणीकार: गुल रज़ा राही अररियावी ✍🏻

किताब दोस्ती एक ऐसा ज़ौक है जिससे एक नफीस तबियत सुकून व सरूर पाता है, इसकी महफिल बन जाती है, हंगामा आराई इसके ज़ौक में कोई खलल अंदाज़ी नहीं कर पाता, वह हर सतर को अपना एक सफर समझता है, हुरूफ़ व मआनी की इश्वह तराज़ी उसको इतर बेज़ी का फन सिखलाता है, शायद मुश्क  व अंबर वह खुशबू पैदा न कर सके जो किताब का एक उनवान इंसान के ज़ेहन में पैदा कर देता है, वह वाकिया काबिल ज़िक्र है जो मताए वक्त और कारवान इल्म में मज़कूर है 
कि ! मुद्दिस उल असर अल्लामा अनवर शाह कश्मीरी अपनी इल्लत में थे और तबीब हाज़िक ने उन्हें कुछ दिनों के लिए मुताला से मना कर दिया था कुछ लम्हा तो तोक्कुफ किया मगर बाद में हज़रत शाह साहिब से रहा नहीं गया और वह किताब ले कर बैठ गए फिर इन्हिमाक के साथ मुताला में मसरूफ हो गए, उधर आपके शागिर्द मुफ्ती शफी साहिब व अल्लामा शब्बीर अहमद उस्मानी रह और दीगर हजरात को मालूम हुआ तो सब घर की तरफ लपके और सूरत हाल देखी तो शागिर्द ने अपने उस्ताद रह से मोहब्बत व उल्फत में यह कहने लगे !
हज़रत अव्वल तो इल्म का कोई गोशा ऐसा नहीं जो आप से खाली हो फिर भी अगर कुछ है भी तो इस हालत में क्या ज़रूरत थी, अगर ज़रूरत थी भी तो हम खादिम किस लिए हैं कह देते तो तलाश कर लेता 
इस मौके पर शाह साहिब ने यह जुमला कहा !
"मुताला ही मेरा असल मर्ज़ है"

तो हमारे अकाबिर का मर्ज़ ही मुताला जिससे उन्हें सुकून मिलता था -
तारीख में ऐसे लोगों का एक मुस्तकिल बाब है जिसमें बिला तफरीक मुस्लिम व गैर मुस्लिम के कई सौ सफहात का यौमिया मुताला का मामूल था-
यह सब बा तौफीक लोग थे जो इल्मी दुनिया में अपना नाम रोशन कर गए और बाद में आने वालों के लिए नमूना ए अमल छोड़ गए-
बफज़लिल्लाह व औनही कुछ सालों से राकिम आसी भी कुछ वरक गर्दानी की कोशिश कर रहा है और दिल में मखफी बातों की खामह फरसाई की भी सई पैहम कर रहा है,
राकिम की किसी किताब पर यह दूसरा तब्सिरा है-

"मकालात नोमानी "हज़रत मौलाना मुफ्ती अबुल कासिम नोमानी दामत बरकातहुमुल आलिया की मुख्तलिफ मौजूआत का एक खज़ाना है जिसको हज़रत मुहतमिम साहिब ने बेशुमार मसरूफियत के बावजूद बड़ी अर्क रेज़ी और जानकाही से अंजाम दिया है इसका हर मौजू लाजवाब है और इसकी पूरी तहकीक हज़रत दामत बरकातहुमुल आलिया ने फरमाई है-
 इसके अंदर सहाबा ए किराम के मुताल्लिक उलमा ए देवबंद का नज़रिया पेश किया गया और सगीर उस सिन में कौन से सहाबा ए किराम आपके आगोश तरबियत में आए उनको शुमार कराया गया है आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की तरबियत का अंदाज़ बतलाया गया है, फितनों का ताकुब , गुंबद खजरी तारीख के मुख्तलिफ दौर में रौज़ा ए अकदस की तामीर , इसी तरह मुख्तलिफ इल्मी शख्सियात का मुख्तसर तारुफ और कुछ खुसूसियात को उजागर किया गया है और मुख्तलिफ किताबों का तारुफ भी कराया गया है जिनमें अल्लामा ज़हबी की सियर ए आलम अन नुबला , अल्लामा शिबली नोमानी रह की सीरत उन नबी, ला
मअ अल दरारी , गोया कि इस किताब के अंदर ज़रूरत के लिहाज़ से बेशुमार मौजूआत हमें दस्तयाब हो जाते हैं यह किताब यकीनन सहल लिल लफ्ज़ भी है पढ़ने वालों के लिए मालूमात का खज़ाना भी और किताब ज़ाहिरी और मअनवी दोनों ऐतबार से खूबियों का हामिल , काबिल ए सतइश और लायक ए तहसीन है यह किताब ३९३ सफहात पर मुश्तमिल है-
यह किताब हवाला की मोतियों से मुज़य्यन भी है जिसकी वजह से यह किताब मज़ीद काबिल ए एतेना हो गया है-
 अव्वल तो यह किताब हज़रत मुहतमिम साहिब दामत बरकातहुमुल आलिया के नाम से ही मंसूब हो जाना काफी था लेकिन हवाला जात ने इसकी खूबियों में मज़ीद इज़ाफा किया है हज़रत की और भी कई मंसे शहूद पर आकर मकबूल हो चुकी हैं मौजूद हैं और यह इस में मज़ीद इज़ाफा है 
अल्लाह ताला हज़रत मुहतमिम साहिब दामत बरकातहुमुल आलिया की उम्र में बरकत अता फरमाए और उनको मज़ीद सेहत तंदुरुस्ती अता फरमाए और उनका साया ए आतफत ता देर कायम व दायम फरमाए आमीन