ख़्वाजा गरीब नवाज़ रहमतुल्लाह अलैह की शिक्षाएँ और आज के मुसलमान का अमली विरोधाभास

 अंबिया-ए-किराम अलैहिमुस्सलातु वस्सलाम के बाद बिला शुबह हक़ की गवाही और उसकी हिफ़ाज़त का अज़ीम फ़रीज़ा बे शुमार औलिया-ए-किराम और बुज़ुर्गाने दीन ने अंजाम दिया। तमाम अंबिया ए किराम और रसूलान ए अज़ाम ने हमें यही पैग़ाम और यही तालीम दी कि जब भी कोई ज़ालिम, जाबिर और ज़ुल्म करने वाला हक़ के मुक़ाबिल आए तो उसके ख़िलाफ़ जहाँ तक मुमकिन हो, खुल कर, बे ख़ौफ़ व ख़तर और पूरी जुर्रत के साथ हक़ का एलान करना ही असल इस्लामी तालीम है। उन्होंने हमें ज़िंदगी के हर मोड़ और हर महाज़ पर यह सबक़ दिया कि सच के साथ, हक़ के साथ डट जाना ही असल ईमान है और यही एक मोमिन की हक़ीक़ी पहचान है। यही तरीक़ा, यही ज़ाविया-ए-फ़िक्र और यही रवैया हमें नबी करीम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा ﷺ ने अता फ़रमाया।
 आप ﷺ के बाद आपके सहाबा-ए-किराम, ख़ुलफ़ा-ए-राशिदीन, ताबेईन, तबअ ताबेईन, आइम्मा-ए-मुजतहिदीन और दीगर तमाम बुज़ुर्गाने दीन ने इसी मिशन को आगे बढ़ाया। बाल्खुसूस गौस-ए-आज़म शेख अब्दुल क़ादिर जिलानी रहमतुल्लाह अलैह ने इसी हक़ गोई और जुर्रत-ए-ईमानी का दरस दिया। उसके बाद बर्रे सग़ीर हिन्द की मुक़द्दस सरज़मीन पर जिन अज़ीम हस्ती को सबसे ज़्यादा मुअज़्ज़ज़, मुहर्रम और मुक़द्दस मक़ाम हासिल है, वह हैं सुल्तान उल हिन्द, ख़्वाजा ख़्वाजगान, हज़रत ख़्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती अजमेरी संजरी रहमतुल्लाह अलैह। आपने हिंदुस्तान की सरज़मीन पर जो पैग़ाम, जो पंद व नसाइह और जो हिदायात दीं, वह सरासर हक़, अदल, मोहब्बत और ज़ुल्म के ख़िलाफ़ डट जाने पर मबनी थीं। इसी रास्ते पर चलते हुए हमारे इमाम-ए-अहले सुन्नत, आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा ख़ान फ़ाज़िल बरेलवी रहमतुल्लाह अलैह, मुफ़्ती-ए-आज़म-ए-हिंद रहमतुल्लाह अलैह, हुज्जतुल इस्लाम रहमतुल्लाह अलैह और ताज उश शरिया रहमतुल्लाह अलैह ने भी वही पैग़ाम दिया, वही तालीमात उम्मत तक पहुंचाईं जो क़ुरान व सुन्नत और बुज़ुर्गाने दीन की अमानत थीं।
 लेकिन अफ़सोस! आज इन तमाम बुज़ुर्गाने दीन की इन अज़ीम तालीमात पर सच्चे दिल, पुख़्ता अज़्म और हक़ीक़ी वफ़ादारी के साथ अमल करने वाले बहुत कम रह गए हैं। अल्लाह के फ़ज़ल से शायद एक, दो या चंद ही उलमा ऐसे दिखाई देते हैं जो इन तालीमात पर साबित क़दम हों। अक्सरियत इस क़दर दुनिया की रंगीनियों, ऐश व इश्रत और वक़्ती मुफ़ादात में उलझ चुकी है कि न उन्हें अपने असलाफ़ और बुज़ुर्गाने दीन की हिदायात का एहसास बाक़ी रहा है और न ही नबी करीम ﷺ की सुन्नत-ए-मुबारका की हक़ीक़ी क़द्र। इसी ग़फ़लत का नतीजा यह है कि लोग बिला ख़ौफ़-ए-ख़ुदा, अल्लाह और उसके रसूल ﷺ की नाफ़रमानी करते हैं, मगर दावा यह करते हैं कि हम अल्लाह और उसके रसूल ﷺ को मानने वाले हैं, हम अहले सुन्नत व जमाअत से ताल्लुक़ रखते हैं। हालांकि अगर उनकी ज़िंदगी, मामलात और किरदार का संजीदगी से जायज़ा लिया जाए तो उनमें वह आमाल कहीं नज़र नहीं आते जिनकी तालीम हमें ख़्वाजा गरीब नवाज़ हज़रत मोइनुद्दीन चिश्ती अजमेरी रहमतुल्लाह अलैह ने दी थी और जिन पर चलने की उन्होंने पूरी उम्मत को दावत दी थी।
 दर हक़ीक़त इस ज़वाल की सबसे बड़ी वजह यही है कि हमने ख़्वाजा गरीब नवाज़ रहमतुल्लाह अलैह की इस बुनियादी और मरकज़ी तालीम को नज़रअंदाज़ कर दिया है जो रिसालत-ए-मुहम्मदी ﷺ से कामिल मोहब्बत और ग़ैर मशरूत इताअत पर मबनी है। ख़्वाजा गरीब नवाज़ रहमतुल्लाह अलैह के नज़दीक दीन-ए-इस्लाम की असल रूह यही थी कि बंदा-ए-मोमिन अपने दिल, अपने क़ौल और अपने अमल तीनों एतबार से नबी करीम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा ﷺ की ज़ात-ए-अक़दस से गहरा ताल्लुक़ क़ायम कर ले। आप रहमतुल्लाह अलैह साफ़ और दो टूक अंदाज़ में फ़रमाया करते थे कि जिस अमल में सुन्नत-ए-रसूल ﷺ की झलक न हो, जो अमल नबी करीम ﷺ के तरीक़े के मुताबिक़ न हो, वह बा ज़ाहिर कितना ही रूहानी, कितना ही पुरकशिश या कितना ही मक़बूल क्यों न हो, अल्लाह ताला की बारगाह में क़ाबिले क़बूल नहीं हो सकता। ख़्वाजा गरीब नवाज़ रहमतुल्लाह अलैह के नज़दीक तसव्वुफ़, बुज़ुर्गी और विलायत सब इसी वक़्त मोतबर हैं जब वह मुकम्मल तौर पर सुन्नत-ए-मुस्तफ़ा ﷺ के ताबे हों। यूं कहा जाए तो बे जा न होगा कि आज हमारे क़ौल व फ़ेल में जो तज़ाद नज़र आता है, वह दर असल सुन्नत-ए-नबवी ﷺ से अमली दूरी का नतीजा है। अगर हम वाक़ई ख़्वाजा गरीब नवाज़ रहमतुल्लाह अलैह की तालीमात के सच्चे पैरौकार बनना चाहते हैं तो हमें सबसे पहले अपनी ज़िंदगियों को नबी करीम ﷺ की सुन्नत के साँचे में ढालना होगा, क्योंकि यही वह रास्ता है जो ख़्वाजा गरीब नवाज़ रहमतुल्लाह अलैह ने हमें दिखाया था और यही असल कामयाबी का रास्ता है।
 आप रहमतुल्लाह अलैह ने यह हक़ीक़त उजागर की कि नबी करीम ﷺ से मोहब्बत महज़ ज़बानी दावा नहीं, बल्कि अमली इताअत का नाम है। सुन्नत-ए-नबवी ﷺ को ज़िंदगी का मरकज़ बनाना, अखलाक़, मामलात, इबादत और मुआशरत हर शोबे में रसूल अल्लाह ﷺ की पैरवी करना ही सच्ची मोहब्बत की अलामत है। ख़्वाजा गरीब नवाज़ रहमतुल्लाह अलैह ने अपने मुरीदों और मुतवस्सिलीन को हमेशा यह नसीहत फ़रमाई कि तसव्वुफ़, विलायत या बुज़ुर्गी अगर सुन्नत के ख़िलाफ़ हो तो वह गुमराही है, न कि क़ुर्ब-ए-इलाही का रास्ता। आप रहमतुल्लाह अलैह के नज़दीक शरीयत और तरीक़त में कोई तसादुम नहीं था। शरीयत रसूल ﷺ का हुक्म है और तरीक़त उसी हुक्म पर चलने का नाम। इसी लिए ख़्वाजा गरीब नवाज़ रहमतुल्लाह अलैह ने हर उस रूहानी अमल से दूरी इख़्तियार की जो क़ुरान व सुन्नत के दायरे से बाहर हो। आप रहमतुल्लाह अलैह का यह मौक़िफ़ आज के ज़माने के लिए भी निहायत अहम है, जब दीन के नाम पर कई ऐसी बातें राइज हो चुकी हैं जिन का सुन्नत-ए-नबवी ﷺ से कोई ताल्लुक़ नहीं। ख़्वाजा गरीब नवाज़ रहमतुल्लाह अलैह ने यह भी तालीम दी कि नबी करीम ﷺ की इताअत दर असल अल्लाह ताला की इताअत है। जो शख्स रसूल ﷺ की सुन्नत को अपनाता है, वह दर हक़ीक़त अल्लाह के हुक्म पर अमल करता है। इसी लिए आप रहमतुल्लाह अलैह ने अपने अमल, गुफ़्तार और किरदार से सुन्नत-ए-नबवी ﷺ को ज़िंदा किया और दूसरों को भी इसी की दावत दी। ख़्वाजा गरीब नवाज़ रहमतुल्लाह अलैह के नज़दीक रिसालत-ए-मुहम्मदी ﷺ से मोहब्बत और इताअत न सिर्फ दीन की बुनियाद है बल्कि ईमान की तकमील भी इसी के ज़रिए होती है। जो शख्स इस उसूल को थाम ले, उसकी ज़िंदगी खुद ब खुद हिदायत और इस्लाह का नमूना बन जाती है।
 ख़्वाजा गरीब नवाज़ हज़रत मोइनुद्दीन चिश्ती अजमेरी रहमतुल्लाह अलैह की तालीमात में हक़ गोई और हक़ पर साबित क़दमी को एक मरकज़ी हैसियत हासिल है। आप रहमतुल्लाह अलैह के नज़दीक हक़ का साथ देना सिर्फ एक अखलाक़ी वस्फ़ नहीं बल्कि यह ईमान का तक़ाज़ा है। आप रहमतुल्लाह अलैह यह तालीम देते थे कि मोमिन की पहचान यही है कि वह हक़ को पहचाने भी और उस पर डट भी जाए, चाहे हालात कितने ही सख़्त क्यों न हों। ख़्वाजा गरीब नवाज़ रहमतुल्लाह अलैह ने वाज़ेह किया कि ज़ुल्म, जबर और ना इंसाफ़ी के सामने ख़ामोश रहना कमज़ोरी ही नहीं बल्कि बाज़ औक़ात गुनाह के ज़ुमरें में आ जाता है। अगर इंसान ज़ुल्म को देख कर भी हक़ बात न कहे तो वह ज़ालिम का बिल वास्ता साथी बन जाता है। इसी लिए आप रहमतुल्लाह अलैह ने अपने मुरीदों और चाहने वालों को यह सबक़ दिया कि हक़ बात कहने में किसी दुनियावी नुक़सान, मुखालफ़त या ख़ौफ़ को आड़े न आने दिया जाए।
 ताहम आप रहमतुल्लाह अलैह की हक़ गोई जज़्बाती या इश्तआल अंगेज़ नहीं थी, बल्कि हिकमत, वक़ार और अखलाक़ के दायरे में रह कर होती थी। आप रहमतुल्लाह अलैह ने यह सिखाया कि हक़ कहना ज़रूरी है, मगर अंदाज़ ऐसा हो जो इस्लाह का सबब बने, फ़साद का नहीं। यही वजह है कि आप रहमतुल्लाह अलैह ने तलवार के बजाए किरदार, अखलाक़ और सच्चाई के ज़रिए बातिल को शिकस्त दी। ख़्वाजा गरीब नवाज़ रहमतुल्लाह अलैह ने अमली तौर पर यह साबित किया कि हक़ पर साबित क़दमी इंसान को वक़्ती तौर पर आज़माइश में डाल सकती है, मगर अंजाम कार इज़्ज़त और कामयाबी उसी के हिस्से में आती है। आप रहमतुल्लाह अलैह ने न हुक्मरानों की खुशनूदी के लिए हक़ को छोड़ा और न अवामी मक़बूलियत के लिए मसलहत को हक़ पर तरजीह दी। यही इस्तिकामत आप रहमतुल्लाह अलैह को अल्लाह के नज़दीक मक़बूल और मख़लूक़ के दिलों में मुहर्रम बनाती है।
 आज के दौर में, खुसूसन नौजवानों और उलमा के लिए ख़्वाजा गरीब नवाज़ रहमतुल्लाह अलैह की यह तालीम ग़ैर मामूली अहमियत रखती है। सच को छुपाना, हक़ को मरोड़ना या बातिल के साथ समझौता करना वक़्ती फ़ायदा तो दे सकता है, मगर यह दीन और ज़मीर दोनों के लिए नुक़सानदेह है। ख़्वाजा साहब रहमतुल्लाह अलैह हमें यह पैग़ाम देते हैं कि हक़ का रास्ता मुश्किल ज़रूर है, मगर यही रास्ता नजात और कामयाबी का रास्ता है। ख़्वाजा गरीब नवाज़ रहमतुल्लाह अलैह के नज़दीक हक़ गोई और हक़ पर डट जाना वह सिफ़त है जो इंसान को अल्लाह के क़रीब और बातिल से दूर कर देती है, और यही एक सच्चे मोमिन और दाई-ए-दीन की असल पहचान है।
 ख़्वाजा गरीब नवाज़ हज़रत मोइनुद्दीन चिश्ती अजमेरी रहमतुल्लाह अलैह की तालीमात में इंसानी मसावात को निहायत बुनियादी मक़ाम हासिल है। आप रहमतुल्लाह अलैह ने ऐसे दौर में यह पैग़ाम दिया जब मुआशरा जात पात, नस्ल, मज़हब और तबक़ाती तफ़रीक़ में बुरी तरह मुनक़सिम था। आप रहमतुल्लाह अलैह ने वाज़ेह किया कि अल्लाह ताला की निगाह में तमाम इंसान बराबर हैं, फ़ज़ीलत का मेयार न जात है, न दौलत और न ही नसब, बल्कि तक़वा और किरदार है। ख़्वाजा गरीब नवाज़ रहमतुल्लाह अलैह ने अमली तौर पर इस तालीम को ज़िंदा किया। आप रहमतुल्लाह अलैह की ख़ानक़ाह में अमीर व गरीब, हाकिम व महकूम, हिन्दू व मुसलमान सब एक ही सफ़ में बैठते, एक ही दस्तरख़्वान पर खाना खाते और एक ही तरह इज़्ज़त पाते थे। यह अमली मसावात इस वक़्त के समाजी निज़ाम के लिए एक इंक़िलाबी पैग़ाम थी, जिस ने हज़ारों दिलों को मुतास्सिर किया। आप रहमतुल्लाह अलैह ने इस बात की सख़्ती से नफ़ी की कि किसी इंसान को उसकी जात, ज़बान, रंग या इलाक़े की बुनियाद पर कमतर समझा जाए। आप रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते थे कि जो शख्स किसी इंसान को हक़ीर समझता है, वह दर असल अल्लाह की तख़लीक़ की तौहीन करता है। इसी फ़िक्र ने हिंदुस्तान में इस्लाम को एक रहमत के तौर पर मुतारिफ़ कराया।
 आज के दौर में, जब मुआशरा फिर तअस्सुब, नफ़रत और फ़िर्क़ा वारियत की तरफ़ बढ़ रहा है, ख़्वाजा गरीब नवाज़ रहमतुल्लाह अलैह की यह तालीम पहले से ज़्यादा अहम हो जाती है। नौजवानों और उलमा को यह समझना होगा कि दीन का पैग़ाम नफ़रत नहीं बल्कि इज़्ज़त-ए-इंसानियत है। अगर आलम खुद तफ़रीक़ का शिकार हो जाए तो वह उम्मत को कैसे जोड़ सकता है? ख़्वाजा गरीब नवाज़ रहमतुल्लाह अलैह ने हमें यह सिखाया कि हर इंसान क़ाबिले एहतराम है, और यही मसावात एक सालेह मुआशरे की बुनियाद है।
  ख़्वाजा गरीब नवाज़ हज़रत मोइनुद्दीन चिश्ती अजमेरी रहमतुल्लाह अलैह की तालीमात का एक अहम पहलू अमन, रोदारी और बर्दाश्त है। आप रहमतुल्लाह अलैह ने ऐसे मुआशरे में दावत-ए-दीन का काम किया जहां मुख्तलिफ़ मज़ाहिब, सकाफ़तें और नज़रियात एक साथ मौजूद थे। इस तनव्वुअ के बावजूद आप रहमतुल्लाह अलैह ने तसादुम के बजाए अमन और मोहब्बत का रास्ता इख़्तियार किया। आप रहमतुल्लाह अलैह का पैग़ाम वाज़ेह था कि इस्लाम तलवार या जबर से नहीं बल्कि अखलाक़, सब्र और हुस्न-ए-सुलूक से दिलों में दाखिल होता है। आप रहमतुल्लाह अलैह ने नफ़रत, तशद्दुद और इंतिक़ाम की सख़्ती से मुखालफ़त की और बर्दाश्त को मोमिन की असल ताक़त क़रार दिया। आप रहमतुल्लाह अलैह के नज़दीक हक़ीक़ी बहादुरी ग़ुस्से पर क़ाबू पाने और दुश्मनी को मोहब्बत में बदलने में है। ख़्वाजा गरीब नवाज़ रहमतुल्लाह अलैह ने रोदारी का यह मफ़हूम भी वाज़ेह किया कि दूसरे मज़ाहिब के मानने वालों के अक़ाइद का एहतराम किया जाए, उनके साथ इंसाफ़ और हुस्न-ए-सुलूक से पेश आया जाए, और इख़्तिलाफ़ को फ़साद का ज़रिया न बनाया जाए। यही वजह है कि ग़ैर मुस्लिम भी आप रहमतुल्लाह अलैह के अखलाक़ से मुतास्सिर हो कर आप की तरफ़ खिंचे चले आते थे।
आज के दौर में, जब मामूली इख़्तिलाफ़ भी तशद्दुद और नफ़रत में बदल जाता है, ख़्वाजा साहब रहमतुल्लाह अलैह की यह तालीम हमारी सबसे बड़ी ज़रूरत है। नौजवानों और उलमा को यह सीखना होगा कि सख़्ती, गाली और नफ़रत से दीन नहीं फैलता, बल्कि दीन बदनाम होता है। ख़्वाजा गरीब नवाज़ रहमतुल्लाह अलैह हमें यह पैग़ाम देते हैं कि अमन के बग़ैर दीन की ख़िदमत मुमकिन नहीं। जो शख्स खुद बे सब्र और मुतशद्दिद हो, वह मुआशरे को सुकून कैसे दे सकता है? बस यह समझ लें कि अमन, रोदारी और बर्दाश्त वह सिफ़ात हैं जो एक फ़र्द को भी अज़ीम बनाती हैं और एक क़ौम को भी।
 ख़्वाजा गरीब नवाज़ रहमतुल्लाह अलैह की तालीमात में इल्म-ए-दीन को निहायत मरकज़ी हैसियत हासिल है। आप रहमतुल्लाह अलैह के नज़दीक इल्म वह रोशनी है जो इंसान को हक़ और बातिल में फ़र्क सिखाती है। बग़ैर इल्म के इबादत और अमल अगरचे ज़ाहिरी तौर पर अच्छे नज़र आएं, मगर वह अक्सर गुमराही या इफ़रात व तफ़रीत का सबब बन जाते हैं। इसी लिए आप रहमतुल्लाह अलैह ने हमेशा सही और मुस्तनद इल्म हासिल करने पर ज़ोर दिया। ख़्वाजा गरीब नवाज़ रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते थे कि इल्म अगर क़ुरान व सुन्नत की बुनियाद पर न हो तो वह फ़ायदे के बजाए नुक़सान का बाइस बन सकता है। इसी वजह से आप रहमतुल्लाह अलैह ने अपने मुरीदों और शागिर्दों को यह नसीहत फ़रमाई कि वह किसी भी अमल को इख़्तियार करने से पहले उसकी शरई हैसियत को समझें। आप रहमतुल्लाह अलैह के नज़दीक इल्म और अमल का ताल्लुक़ रूह और जिस्म जैसा था एक के बग़ैर दूसरा नामुकम्मल। आप रहमतुल्लाह अलैह ने इल्म के साथ अदब और तवाज़ो को भी लाज़िम क़रार दिया। आप रहमतुल्लाह अलैह के नज़दीक वह इल्म जो इंसान को मुतकब्बिर बना दे, हक़ीक़ी इल्म नहीं बल्कि आज़माइश है। एक सच्चा आलम वह है जो जितना सीखे, उतना ही झुक जाए और अपनी ज़िम्मेदारियों को समझे।
 आज के दौर में, जब सोशल मीडिया और ग़ैर मुस्तनद ज़राए से दीन के नाम पर बहुत सी बातें फैलाई जा रही हैं, ख़्वाजा गरीब नवाज़ रहमतुल्लाह अलैह की यह तालीम पहले से ज़्यादा अहम हो गई है। नौजवान उलमा और तलबा को चाहिए कि वह गहरे मुताले, असातज़ा की रहनुमाई और तहक़ीक़ के बग़ैर किसी बात को दीन का हिस्सा न बनाएं। बस इतना याद रखें कि ख़्वाजा गरीब नवाज़ रहमतुल्लाह अलैह के नज़दीक इल्म-ए-दीन न सिर्फ नजात का रास्ता है बल्कि उम्मत की फ़िक्री हिफ़ाज़त का मज़बूत ज़रिया भी है।
 ख़्वाजा गरीब नवाज़ हज़रत मोइनुद्दीन चिश्ती अजमेरी रहमतुल्लाह अलैह की तालीमात का एक अहम पहलू अदल व इंसाफ़ की हिमायत है। आप रहमतुल्लाह अलैह ने वाज़ेह तौर पर यह तालीम दी कि इस्लाम ज़ुल्म के ख़िलाफ़ और इंसाफ़ के हक़ में खड़े होने का नाम है। अदल सिर्फ अदालतों तक महदूद नहीं बल्कि ज़िंदगी के हर शोबे में इस का क़ियाम ज़रूरी है। आप रहमतुल्लाह अलैह ने सिखाया कि एक सच्चा मोमिन वह है जो ताक़तवर के ख़िलाफ़ और कमज़ोर के हक़ में खड़ा हो, चाहे इस के नतीजे में उसे नुक़सान ही क्यों न उठाना पड़े। आप रहमतुल्लाह अलैह ने अपने अमल से यह बात साबित की कि अल्लाह के नज़दीक सबसे अफ़ज़ल वही है जो मज़लूम की फ़रियाद सुने और उसकी मदद करे। ख़्वाजा गरीब नवाज़ रहमतुल्लाह अलैह ने हुक्मरानों और साहिब-ए-इक़्तिदार अफ़राद को भी अदल की तलक़ीन की और ज़ुल्म पर ख़ामोश रहने को ईमान के मुनाफ़ी क़रार दिया। ता हम, आप रहमतुल्लाह अलैह का अंदाज़ हमेशा हिकमत, नरमी और ख़ैर ख़्वाही पर मबनी होता था, न कि बग़ावत या फ़साद पर।
 आज के मुआशरे में, जहां ना इंसाफ़ी, करप्शन और ताक़त का ग़लत इस्तेमाल आम होता जा रहा है, ख़्वाजा साहब रहमतुल्लाह अलैह की यह तालीम हमारे लिए एक वाज़ेह रहनुमाई फ़राहम करती है। नौजवान उलमा और बा शऊर अफ़राद को चाहिए कि वह इंसाफ़ की आवाज़ बनें, न कि मसलहत या ख़ौफ़ की वजह से ख़ामोश तमाशाई बने रहें। यह ज़ेहन नशीं कर लें कि ख़्वाजा गरीब नवाज़ रहमतुल्लाह अलैह के नज़दीक अदल व इंसाफ़ महज़ एक समाजी क़द्र नहीं बल्कि ईमान का अमली तक़ाज़ा है, और इसी के ज़रिए मुआशरे में अमन और भलाई क़ायम हो सकती है।
 ख़्वाजा गरीब नवाज़ हज़रत मोइनुद्दीन चिश्ती अजमेरी रहमतुल्लाह अलैह की तालीमात में ग़रीबों, यतीमों और मिस्कीनों की ख़िदमत को ग़ैर मामूली अहमियत हासिल है। यही वजह है कि आप रहमतुल्लाह अलैह को“ग़रीब नवाज़”कहा गया, यानी ग़रीबों का सहारा बनने वाला। आप रहमतुल्लाह अलैह के नज़दीक किसी भी इंसान की क़द्र व मन्ज़िलत उसकी दौलत या हैसियत से नहीं बल्कि उसकी इंसानियत से होती है। आप रहमतुल्लाह अलैह ने अपनी पूरी ज़िंदगी ग़ुरबा, फ़ुकरा और महरूम तबक़ात की ख़िदमत में गुज़ारी। आप रहमतुल्लाह अलैह की ख़ानक़ाह सिर्फ इबादत गाह नहीं बल्कि एक समाजी फ़लाही मरकज़ भी थी, जहां भूके को खाना, नंगे को लिबास और बे सहारा को सहारा मिलता था। आप रहमतुल्लाह अलैह यह तालीम देते थे कि जिस दिल में ग़रीबों के लिए दर्द नहीं, वह दिल अल्लाह की मोहब्बत से भी ख़ाली है। ख़्वाजा गरीब नवाज़ रहमतुल्लाह अलैह ने यह भी सिखाया कि ग़रीबों की मदद एहसान जताने के लिए नहीं बल्कि अल्लाह की रज़ा के लिए होनी चाहिए। मदद करने वाला खुद को बड़ा न समझे बल्कि शुक्र अदा करे कि अल्लाह ने उसे किसी के काम आने का मौक़ा दिया। यही ख़ुलूस इस ख़िदमत को इबादत का दर्जा देता है।
 आज के दौर में, जब मुआशरा खुद ग़रज़ी और मादा परस्ती का शिकार है, ख़्वाजा साहब रहमतुल्लाह अलैह की यह तालीम हमें याद दिलाती है कि दीन का असल चेहरा ख़िदमत-ए-ख़ल्क़ है। नौजवानों और उलमा को चाहिए कि वह महज़ गुफ़्तार पर इक्तिफ़ा न करें बल्कि अमली तौर पर ग़रीबों के साथ खड़े हों। ग़रीबों और मिस्कीनों का ख़याल रखना ख़्वाजा गरीब नवाज़ रहमतुल्लाह अलैह की तालीमात का दिल है, और यही वह सिफ़त है जो मुआशरे में रहमत और बरकत का सबब बनती है।
  ख़्वाजा गरीब नवाज़ हज़रत मोइनुद्दीन चिश्ती अजमेरी रहमतुल्लाह अलैह की तालीमात में वहदत-ए-उम्मत को बुनियादी हैसियत हासिल है। आप रहमतुल्लाह अलैह ऐसे दौर में हिंदुस्तान तशरीफ़ लाए जब मुआशरा मज़हबी, समाजी और तबक़ाती इख़्तिलाफ़ात का शिकार था। इस माहौल में आप रहमतुल्लाह अलैह ने मुसलमानों के दरमियान इत्तेहाद, भाई चारे और बाहमी एहतराम का पैग़ाम आम किया और इख़्तिलाफ़ को इंतिशार का ज़रिया बनने से रोका। आप रहमतुल्लाह अलैह ने यह वाज़ेह फ़रमाया कि इस्लाम इत्तेहाद का दीन है, तफ़र्रुक़े का नहीं। फ़िकही या फ़िक्री इख़्तिलाफ़ अगर अदब और हुदूद के अंदर हो तो वह रहमत बन सकता है, मगर जब यही इख़्तिलाफ़ तअस्सुब, नफ़रत और तकफ़ीर की शक्ल इख़्तियार कर ले तो उम्मत की क़ुव्वत कमज़ोर हो जाती है। इसी लिए आप रहमतुल्लाह अलैह ने अपने मुरीदों को इस बात की सख़्ती से तलक़ीन की कि वह एक दूसरे की नियतों पर हमला न करें और इख़्तिलाफ़ के बावजूद उख़ुव्वत को बरक़रार रखें। ख़्वाजा गरीब नवाज़ रहमतुल्लाह अलैह ने ख़ानक़ाही निज़ाम के ज़रिए अमली तौर पर वहदत-ए-उम्मत का मुज़ाहिरा किया। आप रहमतुल्लाह अलैह की ख़ानक़ाह में मुख्तलिफ़ इलाक़ों, ज़बानों और पस मन्ज़र से ताल्लुक़ रखने वाले लोग एक साथ रहते, इबादत करते और ख़िदमत-ए-ख़ल्क़ में हिस्सा लेते थे। यह अमली इत्तेहाद, सिर्फ ज़बानी नारों से कहीं ज़्यादा मुअस्सिर साबित हुआ।
 आज के दौर में, जब उम्मत-ए-मुस्लिमा फ़िर्क़ा वारियत, गिरोह बंदी और बाहमी नफ़रत का शिकार है, ख़्वाजा साहब रहमतुल्लाह अलैह की यह तालीम हमारे लिए मशअल-ए-राह है। नौजवान उलमा और दाईयान-ए-दीन को चाहिए कि वह इख़्तिलाफ़ी मसाइल को हवा देने के बजाए मुश्तरका अक़दार को उजागर करें और उम्मत को जोड़ने का किरदार अदा करें। ख़्वाजा गरीब नवाज़ रहमतुल्लाह अलैह हमें यह पैग़ाम देते हैं कि उम्मत की क़ुव्वत इत्तेहाद में है, और इख़्तिलाफ़ के बावजूद एक दूसरे को बर्दाश्त करना ही इस्लामी उख़ुव्वत का तक़ाज़ा है।
 ख़्वाजा गरीब नवाज़ हज़रत मोइनुद्दीन चिश्ती अजमेरी रहमतुल्लाह अलैह की तालीमात का आख़िरी मगर निहायत अहम पहलू अमली दावत है। आप रहमतुल्लाह अलैह का तरीक़ा दावत सिर्फ वअज़ व नसीहत या मुनाज़रों तक महदूद नहीं था, बल्कि आप रहमतुल्लाह अलैह ने अपने किरदार, अखलाक़ और ख़िदमत के ज़रिए इस्लाम को लोगों के दिलों तक पहुंचाया। आप रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते थे कि जब आलम या दाई का अमल उसके क़ौल के ख़िलाफ़ हो तो उसकी बात में असर बाक़ी नहीं रहता। इस लिए आप रहमतुल्लाह अलैह ने पहले खुद अमल किया, फिर दूसरों को दावत दी। आप रहमतुल्लाह अलैह की सच्चाई, सब्र, तवाज़ो और ख़िदमत-ए-ख़ल्क़ ही वह औसाफ़ थे जिन्होंने हज़ारों लोगों को मुतास्सिर किया और इस्लाम की तरफ़ राग़िब किया। ख़्वाजा गरीब नवाज़ रहमतुल्लाह अलैह के नज़दीक अमली दावत का मतलब यह था कि इंसान दूसरों के लिए आसानी का सबब बने, न कि बोझ। आप रहमतुल्लाह अलैह ने लोगों के दुख दर्द को अपना दुख समझा, उनके मसाइल में साथ दिया और बग़ैर किसी इम्तियाज़ के उनकी मदद की। यही अमल लोगों के दिलों में इस्लाम की मोहब्बत पैदा करता था।
 आज के दौर में, ख़ास तौर पर सोशल मीडिया के ज़माने में, ज़बानी दावत बहुत आम हो चुकी है मगर अमली नमूने कम नज़र आते हैं। ख़्वाजा साहब रहमतुल्लाह अलैह की यह तालीम हमें मुतनब्बे करती है कि महज़ पोस्टें, तक़ारीर और नारे दीन की ख़िदमत नहीं, जब तक वह हमारे किरदार में न ढल जाएं। नौजवान उलमा और तलबा दीन के लिए ख़्वाजा गरीब नवाज़ रहमतुल्लाह अलैह का पैग़ाम बिल्कुल वाज़ेह है: अपनी ज़ात को दावत बना लो। जब तुम्हारा अखलाक़, मामलात और रवय्या इस्लामी होगा तो तुम्हारी ख़ामोशी भी दावत बन जाएगी।


तहरीर: मुहम्मद फ़िदा उल मुस्तफ़ा क़ादरी
राब्ता नंबर: 9037099731
पी जी स्कॉलर: दारुल हुदा इस्लामिक यूनिवर्सिटी, केरला