दुनिया में दो किस्म का कैलेंडर राइज है। एक हिजरी कैलेंडर और दूसरा ईसवी कैलेंडर, मुसलमानों का असली कैलेंडर ईसवी नहीं हिजरी है। इस्लामी नए साल का आगाज़ मुहर्रम उल हराम से होता है और ज़िल हिज्जा पर मुकम्मल होता है। जब कि ईसवी कैलेंडर जनवरी से शुरू होकर दिसंबर पर तमाम होता है।
ईसवी कैलेंडर तो आम व खास सबों को खूब याद रहता है, लेकिन अफसोस तो यह है कि हमें इस्लामी तारीख का भी इल्म भी नहीं होता
इस पर गजब यह कि हमारी पूरी मुस्लिम कौम ईसवी नए साल की खुशियां मनाने में वह सारी बुराइयां कर गुजरते हैं जो इस रात में गैर कौमें करती हैं।
हर तरफ हैप्पी न्यू ईयर की सदाएं गूंजती हैं, आतिश बाजियां की जाती हैं और मुख्तलिफ नाईट क्लबों में तफरीही प्रोग्राम रखा जाता है, जिस में शराब व शबाब और म्यूजिक व डांस का भरपूर इंतजाम रहता है।
यह गैर करें तो बात समझ में आती है कि इन बेचारों के पास जिंदगी गुजारने का कोई दस्तूर व जाब्ता नहीं मगर मुसलमानों का यह अमल चीख चीख कर ऐलान कर रहा है कि हम दीन से दूर, नाम के मुसलमान और अंग्रेजों की गुलामी का पट्टा हमारे गुलों में पड़ा है।
क्या हमारा मजहब इस की इजाजत देता है नहीं हरगिज नहीं। हम ईसवी तारीख से अपने काम अंजाम देते हैं तो इस का मतलब यह नहीं निकलता कि हम अंग्रेजों की नक्काली शुरू कर दें।
नया साल हमें खास तौर पर दो बातों की तरफ मुतवज्जेह करता है : एक ''माजी का एहतेसाब'' और दूसरे ''आगे का लाइहा अमल''।
माजी का एहतेसाब:
कह हम अपनी जिंदगी का मुहासबा करें कि एक साल कम हो गया है इस में हम ने क्या खोया और क्या पाया?
हम ने कितनी इबादतें कीं। कितने नेक काम किए और कितने बुरे काम किए। इसी लिए नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का इरशाद है कि: हसिबू अन्फुसकुम कब्ल अन् तुहासबू तर्जुमा: तुम खुद अपना मुहासबा करो कब्ल इस के कि तुम्हारा हिसाब किया जाए।
दूसरी चीज आगे हमें क्या करना है इसका प्लान कि जो गलतियां हम से हो चुकी हैं उन को नहीं करेंगे।
दीन के काम में माजी से ज्यादा मुस्तकबिल में करने का पुख्ता इरादा करें और अपने वक्त को यूं ही जाय नहीं करेंगे।
नबी करीम ﷺ का इरशाद है:
इग्टनिम खमसन कब्ल खम्सिन, यानी: पांच चीजों से पहले पांच चीजों को गनीमत जान लो।
(1) शबाबका कब्ल हरमिक, अपनी जवानी को बुढ़ापे से पहले।
(2) व सिह्तका कब्ल सकमिक, अपनी सेहत व तंदुरुस्ती को बीमारी से पहले।
(3) व गिनाका कब्ल फक्रिक, अपनी मालदारी को फक्रो फाके से पहले।
(4) व फरागाका कब्ल शुगलिका, अपने खाली औकात को मशगूलियत से पहले।
(5) व हयातका कब्ल मौतिका, अपनी जिंदगी को मौत से पहले।
और यह भी अहद कर लें कि गैरों की मुशाबहत इख्तियार नहीं करेंगे इंशाअल्लाह।
क्योंकि अल्लाह के नबी ने एक मौका पर यह इरशाद फरमाया: मन तशब्बहा बिकौमिन फहुवा मिन्हुम।
यानी: जिस ने किसी कौम की मुशाबहत इख्तियार की तो वह उन्हीं में से है।
अल्लाह ताला हमें अपने महबूब ﷺ की सच्ची इत्तेबा और पैरवी की तौफीक अता फरमाए। आमीन