सादिया फातिमा अब्दुल खालिक

 नांदेड़ महाराष्ट्र 8485884176

 ,, यह वक़्त न खो जाए ,,

तमाम तारीफें अल्लाह के लिए हैं और सारी नेमतें उसी की दी हुई हैं, 

हम ग्रेगोरियन कैलेंडर के नए साल में दाखिल हुए हैं, नए साल में दाखिल होना यानी कि हमारी उम्र का एक साल कम हो जाना, हम क़यामत से क़रीब तरीन पहुँच रहे हैं, खुदा के बनाए गए निज़ाम की हर चीज़ अपने अंदाज़ में मुक़र्रर है, कायनात की हर चीज़ मुसलसल एक राह पर गामज़न है, ज़मीन, चाँद, सूरज, सैयारे, सितारे, उस वाहिद ज़ात के इशारे पर मुतहर्रिक हैं, जिस के क़ब्ज़े में हमारी जान है, अल्लाह तआला ने आफ़ताब व माहताब के तुलू व ग़ुरूब और उनकी रफ़्तार को एक खास हिसाब से रखा है, जिस के ज़रिए इंसान सालों, महीनों, दिनों और घंटों का बल्कि मिनटों और सेकंडों का हिसाब ब आसानी लगा सकता है, यह अल्लाह जल शानहु की कुदरत शाहना का अमल है कि इन अज़ीमुश्शान नूरानी करों और उनकी हरकात को ऐसे मुस्तहकम और मज़बूत अंदाज़ से रखा कि हज़ारों साल गुज़र जाने पर भी इन में कभी एक मिनट या एक सेकंड का भी फर्क़ नहीं होता, यह दोनों नूर के करे अपने अपने दायरे में मुअय्यन रफ़्तार के साथ चल रहे हैं, सालों और महीनों का हिसाब शम्सी भी हो सकता है और क़मरी भी, दोनों ही अल्लाह तआला के इनामात हैं, 

गर्दीश लैल व नहार यह बता रही है कि हम क़यामत से क़रीब से क़रीब तर होते जा रहे हैं, घड़ी की सुइयों के साथ हमारी उम्र का ग्राफ़ घट रहा है, बदलते मौसम की रतें चीख़ चीख़ कर एहसास दिला रही हैं कि हम हैं जो तुम्हें हुक्म इलाही से याद दिला रहे हैं कि तुम्हारा वक़्त कम हो रहा है,  एक एक लम्हा हम आगे बढ़ रहे हैं, गुज़रे हुए वक़्त का एहसास बाक़ी तक नहीं रहा कि क्या सही क्या है और क्या ग़लत कर रहे हैं, क्या खोया है क्या पाया है,  इंसान को खुद अपना एहतिसाब करना चाहिए, नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का इरशाद है कि आदमी के इस्लाम की खूबी यह है कि फ़ज़ूल चीज़ों से बच्चे, (तिरमिज़ी 2/ 58 क़दीमी) 

हज़रत अब्दुल्लाह इब्न मसूद फरमाते हैं कि मैं किसी चीज़ पर इतना नादिम और शर्मिंदा नहीं हुआ जितना कि ऐसे दिन के गुज़रने पर, जिस का सूरज ग़ुरूब हो गया जिस में मेरा एक दिन कम हो गया और उस में मेरे अमल में इज़ाफ़ा न हो सका, (क़ीमती अज़्ज़मन इन्दल उलमा स : 27, 

हमें हर मैदान में अपना मुहासबा करके देखना चाहिए, हुक़ूक़ अल्लाह और हुक़ूक़ अल इबाद की अदायगी में हमने क्या, क्या है, इबादत व मामलात में हमने किस हद तक भर पाई की है, हराम व हलाल में कितनी तमीज़ की है, अमल व आमाल में पूरे उतरे या नहीं, खुलूस व हमदर्दी में क्या कुछ किया है, यह सारा मुहासबा करें, और देखें कि हमने ग़लतियाँ कहाँ कहाँ पर की हैं, इंसान दूसरों की नज़रों से तो अपनी ग़लतियों और कोताहियों को छुपा सकता है, लेकिन खुद की नज़रों से नहीं बचा सकता, इसी लिये नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का इरशाद है कि ।۔۔۔۔۔ ,, तुम खुद अपना मुहासबा करो क़ब्ल इस के कि तुम्हारा हिसाब किया जाए, (तिरमिज़ी 4/742 अबवाब अज़्ज़ुहद बैरूत) ,

हमें अपने नई नस्लों के ईमान बचाए की कोशिश का वक़्त है, 

हम नई टेक्नालजी के घेराव में हैं, मग़रिबियत के जाल में उलझ चुके हैं, डिजिटल दौर की दौड़ और काने दज्जाल के इस्तिक़बाल की तैयारियाँ (नऊज़ुबिल्लाह)  इसमें हम अपनी पहचान को खो रहे हैं, मग़रिबियत के लिबादे को फैशन का नाम दे रहे हैं, बेहूदगी को मॉडर्न ज़िंदगी का नाम दे रहे हैं, वक़्त की कमी के नाम पर रिश्तों से दूरी को अपनाया जा रहा है, नई टेक्नालजी के नाम पर, परवरिश को दीन से दूर किया जा रहा है, हमने अख़लाक़ियात के फरीज़ा को बंद कर रखा है, रिश्तों की अहमियत को ख़त्म किया जा रहा है  तालीम निस्वां के नाम पर बेहूदगी और फहशी और बद चलनी को बढ़ावा दिया जा रहा है, दोस्ती और मुहब्बत के नाम पर इर्तिदाद के मुर्तकिब हो रहे हैं , रिश्तों की पासबानी नहीं रही, ज़ुल्म के नाम पर खैरियत मनाने खुश हो रहे हैं, ग़लत फ़ैसलों की मोहर पर तकलीफ़ का शाएबा तक नज़र नहीं आ रहा, अगले ज़ुल्म के लिए गर्दन झुकाई जा रही है , माल के हड़प करने को ज़रूरी क़रार दिया जा रहा है, 

मॉडर्न ज़िंदगी के तौर पर हमने हर दिन कोई न कोई मग़रिबी तहज़ीब के दिन मनाने शुरू किए हैं, कभी मदर डे, कभी फादर डे, कभी चिल्ड्रन्स डे, कभी वैलेंटाइन डे, कभी टीचर्स डे वगैरा, यह मुख्तलिफ किस्म के जश्न यहूद व नसारा और दूसरी कौमों के लोग मनाते हैं, क्योंकि इन के पास रिश्तों में दिखावा होता है, माँ बाप को अलग रखते हैं और औलाद को बालिग़ होते ही घर से निकाल बाहर कर दिया जाता है, इन के पास कोई खानदानी निज़ाम नहीं होता है, इस लिए यह लोग दिखावे के लिए अलग अलग दिन मुतअय्यन कर रखे हैं, मगर इस्लाम में सब के हुक़ूक़ मुक़र्रर कर दिए गए हैं और पूरा एक खानदानी निज़ाम मौजूद है, इस लिए हमें न दिखावे की ज़रूरत है न कोई डे मनाने की बल्कि मुसलमानों को इस से बचने की सख्त ज़रूरत है, ताकि दूसरी कौमों की मुशाबहत से बचा जा सके, इस के लिए हमारे आक़ा व मौला सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने हम को गैरों की इत्तिबा और उस की मुशाबहत इख्तियार करने से बचने का हुक्म दिया है, 

यह उम्र और ज़िंदगी जो हम को अता हुई है वह सिर्फ आखिरत की अबदी ज़िंदगी की तैयारी की खातिर अता हुई है कि हम इस के ज़रिए आने वाली ज़िंदगी को बेहतर बना सकें और अपने आमाल को अच्छा बना सकें, आँख दुनिया की हर चीज़ को देख सकती है मगर जब आँख के अंदर कुछ चला जाए तो उसे देख नहीं पाती, बिल्कुल इंसान भी इसी तरह दूसरों के ऐब तो देखता है पर उसे अपने ऐब नज़र नहीं आते, 

कभी सोचा है, ऐसा क्यों है, ।۔۔۔۔۔ सब से बड़ा मसला कुरान को न समझने की वजह है, हराम व हलाल को न समझने की वजह है, हमदर्दी का दौर का भी वास्ता नहीं रहा, तालीम में अख़लाक़ियात से दूर होने की वजह है, और सब से बड़ी बात तालीमी पेशा, ज़रिया ए मआश की हद तक ही दुरुस्त समझा जा रहा है, तालीमी मैदान में सबक़त के नाम पर रंगीनियों को तरजीह दी जा रही है, यह सब बहुत आगे तक मामला निकल चुका है, मगर इरादा मुसम्म हो, जवाँ अज़्म हो तो लगे वक़्त के हाथों बाज़ी पलट कर राह रास्त पर लाकर हम 2026 को एक नई उम्मीद की किरन से सिरात ए मुस्तक़ीम पर संवार सकते हैं, अल्लाह को राज़ी करते हुए ज़िंदगी और आखिरत को बेहतर बनाने का अज़्म कर सकते हैं, 

वक़्त रहते हम अपनी ज़िंदगी को सही रास्ते पर गामज़न कर सकते हैं, अपनी सेहत को बीमारी से पहले गनीमत जान कर संभल जाएं, अपनी जवानी को बुढ़ापे से पहले गनीमत जान लें, अपनी ज़िंदगी को मौत से पहले संवार लें, खिदमत सब की करें मगर उम्मीद किसी से भी न रखें क्योंकि खिदमात का अजर सिर्फ अल्लाह तआला ही दे सकता है हैं इंसान नहीं, 

आखिरत की ज़िंदगी की कामयाबी और नाकामी का दारोमदार इसी दुनिया के आमाल पर मुनहसिर है, 

इंसान के लालच का प्याला कभी नहीं भरता क्यों कि इस में हिर्स और ना शुक्री के सुराख होते हैं जो इस को भरने नहीं देते, इंसान को खुद को मज़बूत होना चाहिए, खुद को अंदर से मज़बूत करें और अंदर तभी मज़बूत होता है जब अल्लाह से रिश्ता मज़बूत होता है, जितना ताल्लुक़ मज़बूत होगा, इंसान उतना ही मज़बूत होगा, 

इंसान जब खुद को अल्लाह की हिफाज़त में नहीं देता है तो शैतान की चालों का शिकार हो जाता है, इस लिए ताल्लुक़ बिल्लाह मज़बूत कीजे, खुद को अल्लाह की हिफाज़त में दीजिए, ताकि शैतान के हमलों से महफूज़ रह सकें, अल्लाह तआला हर हमें ग़लती से बचाए, हमें गैरों की मुशाबहत से बचाए, और आक़ा ए नामदार आक़ा सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की सुन्नत की इत्तिबा की तौफ़ीक़ अता फरमाए अल्लाह हमारे इरादों में कामयाबी अता फरमाए, हमें दीन व दुनिया में सुर्ख़रूई अता फरमाए, हमारी नई नस्ल की हिफाज़त फरमाए और नई नस्ल को दीन पर कायम रखे, आमीन ।