प्यारे पाठकों! हर दौर की एक पहचान होती है, कभी कलम और किताब का ज़माना था, कभी रेडियो और टीवी का दौर आया और आज हम डिजिटल दौर में जी रहे हैं जहाँ सोशल मीडिया इंसान की ज़िंदगी का लाज़मी हिस्सा बन चुका है, ख़ास तौर पर नौजवान नस्ल जो उम्मत-ए-मुस्लिमा का सरमाया और मुस्तक़बिल है, इस के असरत से बराहे रास्त मुतास्सिर हो रही है, ऐसे में यह जानना बेहद ज़रूरी है कि इस्लाम हमें इस तेज़ रफ़्तार डिजिटल दुनिया में रहते हुए क्या रहनुमाई देता है और नौजवान किस तरह अपनी दीनी और अख़लाक़ी शनाख़्त को बरकरार रख सकते हैं।
इस वक़्त एस आई ओ के वाबस्तगान तमाम के तमाम उस नस्ल से ताल्लुक़ रखते हैं जिसे डिजीटल न्यूज़ कहा जाता है। यानी वह नस्ल जिस ने कंप्यूटर और इंटरनेट के माहौल में आँख खोली और इस माहौल से पैदाइशी तौर पर मानूस है। चुनांचे यह फितरी है कि उन के वक़्त का बड़ा हिस्सा कंप्यूटर इंटरनेट और सोशल मीडिया पर गुज़रता है। इस तरह इंटरनेट और सोशल मीडिया अब हमारे तंज़ीमी कल्चर का एक अहम जुज़ बन चुका है। सरगर्मीयों का बड़ा हिस्सा सोशल मीडिया पर अंजाम पाने लगा है। सोशल मीडिया के ज़रीया हम एक दूसरे से भी जुड़ते हैं और समाज से भी ताल्लुक़ क़ायम करते हैं। हमारी फ़िक्री दीनी और तंज़ीमी तरबियत में भी इस का रोल है और हमारी दावत और पैग़ाम की अशाअत में भी इल्मी व फ़िक्री कामों के लिए भी हम इसे इस्तेमाल करते हैं और जेहद कारी एहतिजाज और राए आम्मा की हमवारी के लिए भी ।
सोशल मीडिया बिला शुबा इस्लाम के दाईयों के लिए एक बड़ी नेमत भी है। एक दाई हक़ की सब से बड़ी आरज़ू यही हो सकती है कि वह ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक पहुँचे। इस के पैग़ाम की अल्लाह के हर बंदा तक रसाई हो। वह जो कहना चाहता है उसे दुनिया का हर आदमी सुने। सोशल मीडिया ने दाई हक़ की इस आरज़ू की तकमील कर दी है।
आज से तीस चालीस साल पहले अहल इस्लाम को यह शिकवा था कि मास मीडिया पर बड़े बड़े सरमाया दार क़ाबिज़ हैं। सरमाया दाराना इस्तेअमार सारी दुनिया में इस्लाम को अपने लिए रुकावट समझता है चुनांचे दुनिया टीवी के स्क्रीन पर इस्लाम के मुखालिफीन को ही देखती है। अख़बारों में इन्ही को पढ़ती है।
जहाँ सोशल मीडिया समाजी तब्दीली समाज में बेदारी लाने और लोगों को किसी बड़े मक़सद के लिए मुतहर्रिक व मुज्तमेअ करने का एक अहम ज़रीया है वहीं बाज़ माहिरिन इस को समाज में रुकावट भी क़रार देते हैं । आज भी कितने लोग हैं जो किसी एहतिजाजी जलसा में आने पर जलसा की लाइव स्ट्रीमिंग देख लेने को तरजीह देते हैं । ऑनलाइन पिटीशन को साइन कर के इन का ज़मीर मुतमइन हो जाता है कि एहतिजाज का हक़ अदा हो गया। बहुत से लोगों के लिए समाजी काज़ भी सोशल मीडिया पर अपनी समाजी पोजीशन बेहतर बनाने का ज़रीया बन जाता है । सच पोस्ट करने वाले की दिलचस्पी इस बात से कम होती है कि कितने लोग इस के मक़सद और इस की दावत से मुत्तफ़िक़ हुए दिलचस्पी का मरकज़ यह होता है कि कितने लोगों ने इस की पोस्ट को लाइक किया? कितने कमेंट आए कितने शेयर हुए।
आज फेसबुक के इस्तेमाल करने वालों की तादाद दो बिलियन हो चुकी है। यानी फेसबुक अगर कोई मुल्क होता तो दुनिया का सब से बड़ा मुल्क होता । गोया इंसानियत के बहुत बड़े हिस्सा तक अपनी बात पहुँचाना इंतिहाई आसान हो गया है। इस तरह सोशल मीडिया ने बे आवाज़ों को आवाज़ बख़्शी । इस बात को मुमकिन बनाया कि अगर पैग़ाम में ताक़त और कशिश है तो वह वसाइल और दौलत के सहारे के बग़ैर महज़ अपनी अंदरूनी कशिश और ताक़त के बल पर फैले और असर अंदाज़ हो। यह इस्लाम और अहल इस्लाम के लिए बहुत बड़ा मौक़ा है। अहल इस्लाम की असल ताक़त पैग़ाम की ताक़त है। इन के पास ख़ुदा का पैग़ाम है जो बे पनाह कशिश अपने अंदर रखता है। इस तरह सोशल मीडिया ने इस असल ताक़त को बरूए कार लाने के मवाक़े कई गुना बढ़ा दिए हैं और इमकानात की एक वसीअ दुनिया के दरवाज़े खोल दिए हैं लेकिन यह तस्वीर का एक रुख है तस्वीर का दूसरा रुख क्या है? इस की वज़ाहत दर्ज ज़ैल हक़ाइक़ से होती है।
इंटरनेट के शुरू के सालों में मुसलमानों ने इंटरनेट पर तेज़ी से अच्छी जगह बना ली थी। गुज़िश्ता दहे के ख़त्म तक भी कई इस्लामी साइट्स दस मक़बूल तरीन मज़हबी साइट्स में शामिल होती रहीं। इस्लामी तहरीक से वाबस्ता नौजवानों ने भी इंटरनेट पर फ़आल सरगर्मी शुरू कर दी थी । लेकिन फिर इस के बाद मंज़र नामा तेज़ी से बदलने लगा। इंटरनेट पर निहायत मुतअस्सिब इस्लाम दुश्मन साइट्स बड़े वसाइल के साथ सर गर्म होने लगीं । आज सूरत हाल यह है कि इस्लाम से मुताल्लिक़ किसी भी मौज़ू को आप सर्च करते हैं तो बड़ी तादाद में पहले सफ़हा पर इस्लामोफो बुक साइट्स ही नज़र आती हैं। न्यूज़ पेपर्स डिस्कशन फोरम या सोशल मीडिया में इस्लाम से मुताल्लिक़ कोई भी मौज़ू छिड़ता है तो आना फानन शदीद मुखालिफ़ाना पोस्टों का सैलाब आ जाता है। मुग्लिज़ात और गाली गलौच से ले कर संजीदा लेकिन सख़्त तनक़ीदों तक हर सतह की मुखालिफ़ाना पोस्ट आने लगती हैं। यह सूरत हाल आलमी सतह पर भी है और हमारे मुल्क में भी। ऐसा महसूस होता है कि इस काम के लिए मुनज़्ज़म नेटवर्क लगे हुए हैं। इस के मुक़ाबला में अहल इस्लाम की सोशल मीडिया सरगर्मी का जब हम तजिया करते हैं तो मालूम होता है कि वह ज़्यादा तर दर्ज ज़ैल अक़साम से मुताल्लिक़ है।
नामहरम खवातीन से ज़रूरी फ़ासला रखिये। या द रखिये कि ना मुनासिब इख़्तिलात जिस तरह हक़ीक़ी ज़िंदगी में ममून है इसी तरह ऑनलाइन ज़िंदगी में भी ममून है। मुनासिब हुदूद का लिहाज़ रखते हुए इल्मी फ़िक्री तहरीकी मक़ासिद के लिए संजीदा तबादला ख्याल व तबादला मालूमात यक़ीनन ग़लत नहीं है लेकिन अगर यह सिलसिला आगे बढ़ कर बे तकल्लुफ़ बात चीत हंसी मज़ाक़ छेड़ छाड़ तबादला तसावीर खानगी उमूर व मामलात पर ग़ैर ज़रूरी गुफ़्तगू वगैरा की हुदूद में दाखिल होने लगे तो समझ लीजिये कि शैतानी चालें कामयाब होने लगी हैं।
जो बात भी लिखिये या किसी और को फॉरवर्ड कीजिये तो तहक़ीक़ कर लीजिये । हदीस में है कि आदमी के झूटा होने के लिए इतना काफ़ी है कि वह सुनी सुनाई बात बग़ैर तहक़ीक़ के दूसरों तक पहुंचा दे। याद रखिये कि सोशल मीडिया एक ताक़तवर ज़रीया इब्लाग़ है। इस पर लिखे और बोले जाने वाले लफ्ज़ लफ्ज़ का जितना बड़ा असर है उतनी ही ज़्यादा जवाब दही है। हमें हर लफ्ज़ का ख़ुदा के हुज़ूर जवाब पेश करना है।
मश किजिये कि सोशल मीडिया पर भी कोई आप का मुरब्बी हो जो आप की पोस्ट और ऑनलाइन सरगर्मी पर नज़र रखे। बरवक़्त टो के बेहतरी के लिए ज़रूरी मशवरे दे। खुद जिस की सरगर्मी को आप अपने लिए मॉडल बनाएं और जहाँ भी कोई उलझन दर पेश हो इस से बे तकल्लुफ़ मशवरा कर सकें। इसी तरह हमें एक दूसरे के लिए तो अमी बिल हक़ का फरीज़ा इंटरनेट और सोशल मीडिया पर भी अंजाम देना है। अगर हम एक दूसरे की कमज़ोरियों पर बरवक़्त जाती तौर पर मुतवज्जा करते रहें और अंजाम देता है। इल्ज़ाम एक दूसरे की तर सालेह ली सरगर्मीयों और इस के मवाक़े की तरफ़ एक दूसरे की निशानदेही करें तो इस तरह की बाहमी तावून से भी बहुत सी ग़लतियों से और ग़लत रवैयों से बचना मुमकिन हो जाता है।।