कब्र इंसान की आख़िरी मंज़िल और दुनिया की हक़ीक़त का ख़ामोश एलान है। जब इंसान अपनी ज़िंदगी के ग़रूर, ताक़त और ख़्वाहिशात के साथ इस दुनिया में चलता है तो कब्र उसे ये याद दिलाती है कि अंजाम सब का एक ही है। न दौलत साथ जाती है, न ओहदा और न ही रुतबा, साथ सिर्फ़ आमाल होते हैं।
कब्र हमें ख़ामोशी से सबक़ देती है कि ये दुनिया आरज़ी है और असल ज़िंदगी आख़िरत की है। यहां इंसान तन्हा होता है, न दोस्त काम आते हैं और न रिश्ते, बस वही नेक आमाल रौशनी बन कर उस के साथ होते हैं जो उस ने दुनिया में किए होते हैं। इसी लिए अक़्ल मंद वो है जो कब्र को याद रखे और अपने किरदार को संवारे।
कब्र का तसव्वुर इंसान के दिल में आजिज़ी पैदा करता है, गुनाहों से रोकता है और नेकी की तरफ़ माइल करता है। जो शख़्स कब्र को याद रखता है वो दुनिया की चमक दमक में खो नहीं जाता, बल्कि हर क़दम सोच समझ कर रखता है।
आखिर में यही कहा जा सकता है कि कब्र हमें ज़िंदगी का मक़सद समझाती है। अगर हम इस दुनिया में अल्लाह की रज़ा के मुताबिक़ ज़िंदगी गुज़ारें तो कब्र ख़ौफ़ की जगह नहीं बल्कि रहमत और सुकून का दरवाज़ा बन सकती है।