✍️ सईद अनवर अररियावी दारुल उलूम वक़्फ़ देवबंद      पिछले दिनों मुफ़्ती शमाइल साहब की डिबेट के बाद एक मर्तबा फिर यह विषय उभर आया है कि मदरिस इस्लामिया के निसाब में तजदीद की ज़रूरत है, इस ताल्लुक़ से विभिन्न मज़ामीन नज़र-ए-मुताला से गुज़र चुकी है, और अहाता-ए-मदारिस में यह मक़ूला मशहूर हो चुका है कि निसाब काफ़ी तवील है और इसमें दोबारा ग़ौर-ओ-ख़ौज़ की ज़रूरत है, लेकिन सवाल यह है कि नुक़्स कहाँ है? और क्या इस निसाब को पढ़ के जैद आलिम पैदा नहीं हो सकते, जब इस ताल्लुक़ से आपका मेयार-ए-फ़िक्र थोड़ी उमक़ में जाए तो आपको तीन बातों का अंदाज़ा होगा और शायद यह मसले का हल हो सकता है - (1) अगर इस बात की जवाब तलाश की जाए तो इतनी बात ज़रूर मनसा-ए-शहूद पे आती है कि निसाब में जुज़वी तब्दीली की ज़रूरत है, क़दीम कलाम व फ़ल्सफ़ा और मसाइल के साथ जदीद उलूम की मैयत क़ाबिल-ए-तहसीन इक़दाम होगा अलबत्ता मुकम्मल या अक्सर निसाब की तब्दीली का नुक़सान ज़ोफ़-ए-इस्तेदाद की सूरत में ज़ाहिर होगा सिर्फ़ यही नहीं बल्कि मुद्दत-ए-तालीम में कमी इससे कहीं ज़्यादा मोहलिक है - (2) इफ़ादा व इस्तेफ़ादा के ताल्लुक़ से मुअल्लिम और मुतअल्लिम दोनों को अपना किरदार बाख़ूबी अदा करना होगा, चुनाँचे हज़रात-ए-असातिज़ा से यह गुज़ारिश की जा सकती है कि वह हर किताब को बतौरे-ए-फ़न के पढ़ाएँ, क़दीम किताबों को जदीद उसलूब, हालिया मिसाल, नई इस्लाहात से मुज़य्यन करके अस्बाक़ को समझाएँ - (3) तीसरी बात यह कि जो तलबा इस निसाब पे सवाल उठाते हैं उनसे पूछा जा सकता है कि आपने बग़ौर सबक सुना? बादहु तकरार व मुताला किया? ख़ैर! वाक़िया यह है कि तलबा में मेहनत का शौक़ व लगन, तहक़ीक़ व जुस्तजू की ख़्वाहिश, तकरार व मुताला का ज़ौक़ सब मानद पड़ गई है, किताब से ज़्यादा मोबाइल अज़ीज़ हो गई है, ज़ाहिर है कि ऐसी सूरत में जैद उलमा की उम्मीद रखना बाइस-ए-तकलीफ़ होगी -     लिहाज़ा निसाब का इल्ज़ाम तर्क करके हर एक अपना फ़रीज़ा बाख़ूबी अदा करने की कोशिश करे तो बिलयक़ीन यह परेशानी दफ़ा हो जाएगी और अहाता-ए-इदारा में इल्म व अमल की महक, तकरार व मुताला की ख़ुशबू, तहक़ीक़ व तफ़्तीश की किरणें फूटने लगेंगी, अल्लाह ताला हम सब को हुसूल-ए-इल्म की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए -