दुनिया ज्यों-ज्यों तरक्की कर रही है, इंसान इंसानियत से आरी होता जा रहा है, ला-मज़हबियत और बे-दीनी के दलदल में फंसता जा रहा है, ज़ाहिरन तो रोशन ख़याली का दावा ज़बान-ज़द है; लेकिन बातिन ज़ुल्मात का बसेरा है, जद्दत पसंदी की रेल पेल में इतना मगन है, कि फहशी, और उरियानियत का दिलदादा होने की वजह से "أولئك كاالأنعام ، بل هم أضل" का मिसदाक बन चुका है, गैर तो खैर गैर है, अपने मुसलमान भी इस तूफ़ान-ए-बदतमीज़ी का शिकार होता जा रहा है, ज़बान पर "ला माबूद इल्लल्लाह" का दावा है; मगर हर चीज़ में मगरीबी तहज़ीब व सफ़ाफ़त को खुदाई का दर्जा दे रखा है, हिन्दुआना रस्म व रिवाज को मज़हब के नाम से अंजाम देने में ज़रा भी नहीं झिझकता, नौबत बा ईं जा रसीद कि जिंदगी के हर शोबे में गैरों के तौर तरीके इस तरह दर आए हैं, कि मुस्लिम व गैर मुस्लिम में इम्तियाज करना मुश्किल होता जा रहा है, खुसूसन शादी ब्याह के रुसूम में इतना इफरात बरता जा रहा है, कि एक आसान काम निकाह को मुश्किल बना दिया है, जिस की वजह से ज़िना आम होता जा रहा है।
चुनांचे जहां जहेज़ जैसी लानत ने हमारे मुआशरे में जड़ पकड़ लिया है, कि गरीब आदमी अपनी बेटी की शादी के लिए बरसों मेहनत करता है, और आखिर में कर्ज़ के बोझ तले दब कर अपनी बेटी को रुख़सत करता है; ताकि समाज में उस की नाक ऊंची रहे। तो दूसरी तरफ लड़कियों के ख्वाहिशात और मुतालिबात में इज़ाफ़ा होता जा रहा है, हर घराना सिर्फ दुनिया को तरजीह दे रहा है, हर कोई साहिब-ए-मुलाज़मत की तलाश में मुन्हमिक है, चाहे अखलाकी ऐतबार से वह कितना ही ज़लील क्यों न हो, बस दुनियावी ऐतबार से आला बिज़नेस मैन और सरकारी नौकरी वाला हो, तो उसी को तरजीह दी जाती है, हालानके इस अहम मौके पर दीनदारी को सब से पहले पेश-ए-नज़र रखना चाहिए; लेकिन आज होता यह है कि हमारी लड़कियां भी ऐसे लड़कों को ही तरजीह देती हैं, जिन के पास माल व दौलत की फ़रावानी हो, बड़े घर का मालिक हो, बड़ा बंगला वाला हो, जिस के पास ज़मीन और जायदाद की रेल पेल हो; हालानके उस के साथ उन को मुकम्मल जिंदगी गुजारनी है, जिस के लिए रफीक-ए-हयात का इंतखाब ऐसा होना चाहिए, कि माली ऐतबार से गरचे कमज़ोर हो; लेकिन दीनी और अखलाकी ऐतबार से इतना मियारी हो कि इज्जत व सुकून के साथ पूरी जिंदगी बीवी के हुकूक की रियायत कर सके, और इखलास के साथ अपने फराइज़ अंजाम दे सके।
आज हमारी बहनों और बेटियों को "हज़रत फातिमा बिन्त वहब रज़ियल्लाहु अन्हा" के वाकिए से सबक हासिल करना चाहिए, कि मुतम्मवल घराने से ताल्लुक रखने के बावजूद, सिर्फ नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के फरमान पर एक गरीब-उल-दयार, मिस्कीन सहाबी को रफीक-ए-हयात बनाने पर राज़ी हो जाती हैं। चुनांचे हज़रत साद असवद सहाबी रसूल हैं, देहात के बाशिंदे हैं, शक्ल व सूरत अच्छी नहीं है, आप के काले पन की वजह से "असवद" लकब पड़ जाता है, माली ऐतबार से इतना कमज़ोर हैं कि कई कई अय्याम फाके पर गुज़र जाते हैं, आप ने मदीने के हर घर में अपना रिश्ता भेजा; मगर आप की शक्ल व सूरत और माली हालत को देख कर सब ने अपनी बेटी देने से इनकार कर दिया, बा आखिर मायूसी और ना उम्मीदी की हालत में नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की मजलिस में हाज़िर हुए, नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम सहाबा के दरमियान मस्जिद-ए-नबवी में तशरीफ फरमा थे, जब साद असवद ने अपने हालात नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के सामने बयान किए, तो नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की आंख से आंसुओं की लड़ी जारी हो गई, और थोड़ी देर बाद इरशाद फरमाया: "जाओ साद मैंने तुम्हारा निकाह मदीने की सब से खूब रू और सब से ज्यादा मालदार लड़की "फातिमा बिन्त वहब बिन अम्र बिन सक़फी" से कर दिया। चुनांचे यह पैगाम ले कर हज़रत साद, वहब सक़फी के घर गए, दरवाजे पर दस्तक दी, फातिमा के वालिद वहब सक़फी ने दरवाजा खोला, और आने का सबब मालूम किया, हज़रत साद ने पूरा माजरा बयान किया, जिस को सुन कर वह गुस्से में आ गए, और चीख कर कहने लगे "यहां से चले जाओ, मैं अपनी बेटी का निकाह ऐसे आदमी से हरगिज़ नहीं करूंगा, जिस की न शक्ल अच्छी हो, और न माल व दौलत पास हो"; लेकिन हज़रत फातिमा रज़ियल्लाहु अन्हा छुप कर सारी बातें सुन रही थीं, उन्होंने अंदर से आवाज़ दे कर कहा कि "जब रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने मेरा निकाह कर दिया है, तो मुझे यह निकाह मंज़ूर है, फरमान-ए-रसूल के आगे माल व दौलत और शक्ल व शबाहत की कोई हैसियत नहीं"।
अल-गरज़! हज़रत साद उन को ले कर अपना घर देहात आ गए; लेकिन घर में अशिया-ए-खुर्द व नोश न थीं, जिस की वजह से मुसलसल इन्हें यह फिक्र परेशान करने लगी, कि फातिमा बड़े घर की साहिबजादी हैं, उन के लिए कुछ न कुछ इंतिज़ाम करना पड़ेगा, इसी मकसद के लिए फातिमा से चंद साअतों के लिए बाहर जाने की इजाजत चाही; लेकिन फातिमा ने इजाजत नहीं दी, और कहने लगी "मेरे सरताज! मुझे छोड़ कर आप कहीं न जाएं" हज़रत साद जब बार बार इसरार करने लगे, तो हज़रत फातिमा ने बाहर जाने की वजह पूछी, हज़रत साद ने कहा कि खुर्द व नोश का इंतिज़ाम करना है, तो कहने लगी कि आप क्या खाएंगे? हज़रत साद ने जवाब दिया कि मेरा रोजा है, तो हज़रत फातिमा रज़ियल्लाहु अन्हा भी बोल पड़ी कि "कसम बह खुदा मेरा भी रोजा है" फिर दरियाफ्त किया कि इफ्तार किस से करेंगे?। इस सवाल पर हज़रत साद रज़ियल्लाहु अन्हु ने घर के किसी कोने से रोटी का एक छोटा सा टुकड़ा निकाल कर दिखाया, कि मैं इसी से इफ्तार कर लूं गा। हज़रत फातिमा ने भी कहा कि मुझे मज़ीद किसी चीज़ की ख्वाहिश नहीं, यही मेरे लिए काफी है। अल्लाह अल्लाह! कितनी वफादारी शौहर के साथ, और कितना तवक्कुल अल्लाह पर, कि एक मालदार घराने से ताल्लुक रखने के बावजूद सूखी रोटी पर शौहर के साथ जिंदगी गुजारने पर राज़ी हैं।
आज हमारी बहनों और बेटियों को इस से सबक हासिल करना चाहिए, यकीनन आप इस दर्जे की कनाअत और तवक्कुल का मुजाहिरा नहीं कर सकतीं; क्यों कि यह खैर-उल-कुरून का वाकिया है, जिस से हम काफी दूर हो चुके हैं; लेकिन इतना तो कर ही सकती हैं कि निकाह के मौके पर माल को ज्यादा अहमियत न दें; बल्कि दीनदारी, वफादारी और हुस्न-ए-अखलाक को मियार बनाएं; क्यों कि माल ज़ाइल होने वाला साया है, आज है तो कल नहीं; लेकिन अच्छे अखलाक, वफादारी, फराइज़-ए-मनसबी को अंजाम देने की फिक्र और सारे हुकूक की पासदारी की कोशिश, ऐसी चीज़ है कि जिस के अंदर यह खूबी हो, वह कभी भी किसी की आंख में आंसू नहीं आने देता; इस लिए हमारी लड़कियों, और उन के वालिदैन को भी चाहिए कि उन्हें चीज़ों को मदेनज़र रख अपनी बेटी को सुपुर्द करें, यकीनन उन की दुनिया व आखिरत दोनों कामयाब हो जाएंगी। इंशा अल्लाह
*✍️: मोहम्मद शाहिद गुडावी*