यूँ तो दुनिया के अंदर सैकड़ों अद्यान पाए जाते हैं, बेशुमार मज़हब व मसालक के लोग आबाद हैं, हर कोई अपने तौर पे अपने मज़हब की ताईद में लगा हुआ है, अपने मज़हब को सही साबित करने और उसकी इशायत में सरगर्म है, लेकिन सवाल ये है कि कौन सा मज़हब दुरुस्त है, हम कौन सा मज़हब इख़्तियार करें जिससे हमारी दुनिया व आख़िरत संवर जाए, तो इसके लिए ज़रूरी है हम ऐसे मज़हब को तलाश करें जिसमें हर एतबार से जामियत हो, जो ज़ाहिरी व बातिनी खूबियों से आरास्ता हो, हर तरह के अयूब व नक़ाइस से मुनज़्ज़ह हो, अदल व इंसाफ़ का हक़ीक़ी अक्स जमील हो, मसावात का हमनवा हो, इंसान के अफ़कार व नज़रियात को सही सिम्ट देने वाला हो, फ़हम व फ़रासत को दुरुस्त करने वाला हो, गुफ़्तार व किरदार के मेयार को दोबाला करने वाला हो, उख़ुवत व मुहब्बत की तालीम देने वाला हो, इंसानियत से हम आहंग करने वाला हो, सुलह व आशती का पैग़ाम देने वाला हो, ख़ालिक़ हक़ीक़ी मिलने का रास्ता फ़राहम करने वाला हो, ऐसा मज़हब ऐसा दीन जो अक़्ल व नस के ऐन मुताबिक़ हो, सवाब दीद पे क़ायम हो, ज़ी शऊर और सही उल अक़्ल इंसान को कोई इख़्तिलाफ़ न हो, जो मज़हब मज़कूरा औसाफ़ का मुरक़्क़ा व मुरस्सा हो वही सच्चा मज़हब है-

आप अगर अद्यान आलम पे सही नज़र डालेंगे, दुनिया के मज़ाहिब का मुताला करेंगे तो आपको मज़हब इस्लाम के सिवा कोई दूसरा मज़हब नज़र नहीं आएगा जो हक़्क़ानियत पे क़ायम हो, मज़हब इस्लाम ही अक़्ल व नस के बिल्कुल ऐन मुताबिक़ है 
जिस की दलील क़ुरान करीम है खुद अल्लाह ताला ने इरशाद फ़रमाया!٫٫इन अददीन इंद अल्लाह अल इस्लाम ،،
अल्लाह के नज़दीक सब से पसंदीदा और सच्चा मज़हब इस्लाम है ,
दूसरी जगह इरशाद फ़रमाया ,जो शख़्स मज़हब इस्लाम के सिवा कोई दूसरा मज़हब तलाश करे उस को हरगिज़ क़बूल नहीं किया जाएगा,
नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम इरशाद फ़रमाते हैं 
मन शहद अन ला इलाहा इल्लल्लाह व अन मुहम्मदन रसूल अल्लाह हर्रम अल्लाह अलैहि अन्नार
जो शख़्स इस बात की गवाही दे कि अल्लाह के सिवा कोई इबादत व बंदगी के लायक़ नहीं है और मुहम्मद उसके रसूल हैं, तो अल्लाह ताला उस शख़्स दोज़ख़ की आग हराम कर दी है,
(मआरिफ़ अल हदीस जिल्द अव्वल किताब अल ईमान
हैस नंबर 11)
इसलिए की मज़हब इस्लाम अपनी नौइयत में मुनफ़रिद है, जामियत में उसकी कोई मिसाल नहीं, उख़ुवत व मुहब्बत में उसकी कोई नज़ीर नहीं, जो सरापा अदल व इंसाफ़ पे क़ायम है, जिस में पैदाइश से ले कर मौत तक रहनुमाई मौजूद है, जिस में सुलह व आशती का पैग़ाम मौजूद है-

क़ुरान पढ़िए तो आपको उसकी तालीमात का अंदाज़ा होगा कि ऐसा जामे उसूल किसी और मज़हब में नहीं मिलता, मज़हब इस्लाम ही ख़ालिक़ हक़ीक़ी से मिलाता है, हक़ीक़त से आश्ना कराता है, ज़िंदगी की हक़ीक़त से रोशनास कराता है-

लिहाज़ा हमें चाहिए कि हम दामन इस्लाम को थामे रखें ता दम हयात इस पे क़ायम व दाइम रहें, उसकी ख़ातिर हम वक़्त ईसार अल अन्नफ़्स का जज़्बा रखें ताकि हम दुनिया व आख़िरत में सुर्ख़ रू हो