१५/ अगस्त 1947 को हमारा देश अंग्रेजों के नाजायज कब्जे से आजाद हुआ, और इस आजादी को ७५ साल से ज्यादा का अरसा गुजर चुका है; लेकिन मुसलमान हकीकी तौर पर अब तक आजाद नहीं हुए हैं, जिस तरह की शख्सी और मजहबी आजादी उन्हें मिलनी चाहिए थी, उससे अब तक महरूम हैं, और यही वजह है कि अव्वल दिन ही से मुसलमानों पर सख्त मज़ालिम ढाए जा रहे हैं, आए दिन हुकूमत की जानिब से मुश्किलात का सामना करना पड़ता है, मुख्तलिफ बहानों और हीलों से मुसलमानों को गद्दार साबित करने की सई जारी है; कभी "तलाक-ए-सलासा" में तरमीम कर के शरीयत में मुदाखलत की जाती है, तो कभी "वक्फ तरमीमी एक्ट २०२४" के जरिए मुसलमानों को माली ऐतबार से कमजोर करने की नापाक कोशिश की जाती है, कभी "यूनिफार्म सिविल कोड" को नाफिज कर के मजहबी आजादी सलब करने की तग व दो की जा रही है, तो कभी मुसलमानों के घरों को बुलडोज कर के उनकी जिंदगी अजीरन बनाई जा रही है। अल-गरज! यके बाद दीगरे तरह तरह के मसाइब के जरिए मुसलमानों को इस मुल्क में परेशान किया जा रहा है, और न जाने कब तक यह सिलसिला जारी रहेगा; मगर मुसलमान सब्र कर रहे हैं, इस उम्मीद से कि "लंबी है गम की शाम मगर शाम ही तो है"।
अभी एक मुसीबत से जान नहीं छूटी थी, कि एक नई मुसीबत हमारी गर्दनों पर डालने की भरपूर कोशिश की जा रही है, "वंदे मातरम" जो एक शिर्किया गीत है, जिसको पढ़ने से इस्लाम का बुनियादी अकीदा "अकीद-ए-तौहीद" खतरे में आ सकता है, 150 साल पूरा होने का बहाना बना कर, इसको मुसलमानों पर जबरदस्ती थोपने के लिए पार्लियामेंट में बहस की जा रही है, ऐसा लगता है कि किसी खास गीत, किसी खास नज्म और किसी खास गजल के गुनगुनाने से हमारे मुल्क में तरक्की हो जाएगी, यहां से गरीबी का नामोनिशान मिट जाएगा, महंगाई खत्म हो जाएगी, रेप और जिना बिल जबर के मामलात कम हो जाएंगे, मॉब लिंचिंग रुक जाएगी, जहरीली फिजा साफ व शफ्फाफ फिजा में तब्दील हो जाएगी, और मुल्क में अमन व सुकून और मोहब्बत व मुवद्दत की हवा चलने लगेगी, कि इस शिर्किया गीत के लिए पार्लियामेंट का कीमती वक्त, जिसको आवाम की फलाह व बहबूद के लिए इस्तेमाल किया जाना चाहिए था; मगर सिर्फ और सिर्फ मुसलमानों को परेशान करने, और इलेक्शन के मौके पर "हिंदू मुस्लिम सियासत" और "मजहबी सियासत" को हवा देने के लिए, एक गैर जरूरी बहस में तमाम औकात जाया कर दिए जाते हैं, ऐवानों में बैठे हुए जालिमों को न आवाम की परवाह है, और न मुल्क की सालमियत की, उन्हें बस फिक्र है तो सिर्फ और सिर्फ अपनी सियासत चमकाने, और हिंदू मुस्लिम कर के कुर्सी पर विराजमान होने की।
"वंदे मातरम" मुसलमानों पर जब्रन मुसल्लत किया जा रहा है, और ब-बांग-ए-दहल ऐलान किया जा रहा है, कि "अगर हिंदुस्तान में रहना है तो वंदे मातरम कहना होगा" हालंकि यह एक शिर्किया गीत है, जिसमें अनासिर-ए-अरबा के साथ साथ मुख्तलिफ चीजों की इबादत की बात कही गई है, जो इस्लाम के अकीद-ए-तौहीद के सरासर खिलाफ है, और मुसलमान किसी भी तरह से इसको कबूल करने पर राजी नहीं होंगे।
हिंदुस्तान एक जम्हूरियत मुल्क है, जिसमें हर मजहब से ताल्लुक रखने वालों को मजहबी आजादी हासिल है, किसी के मजहब में मुदाखलत करने की किसी को इजाजत नहीं है, हर एक की अपनी तहजीब व सकाफत है, जिस पर अमल करने की पूरी गुंजाइश "आईन-ए-हिंद" देता है, इसी तरह मुसलमान भी इस मुल्क के बाशिंदे हैं, इस मुल्क की आजादी में उनकी कुर्बानियां दीगर अक्वाम के मुकाबले में कई गुना हैं, और हमेशा इस मुल्क की हिफाजत के लिए मुसलमानों ने जद्दोजहद किया है, उन्हें भी अपने मजहब पर अमल करने का पूरा इख्तियार हासिल है, और "वंदे मातरम" को उसके सर डालना उसके मजहबी इख्तियारात को सलब करना है, जो किसी भी कीमत पर हम मुसलमानों को कबूल नहीं है, और यह बात भी याद रखनी चाहिए कि मजहब के लिए, और मुल्क के लिए जान देने से मुसलमानों ने कभी पस व पेश नहीं किया है, अगर आज भी यह नौबत आती है, तो हम मुसलमान इसके लिए भी तैयार हैं, और ब-कौल काइद-ए-मोहतरम "मर जाएंगे; मगर वंदे मातरम नहीं पढ़ेंगे"; क्यों कि हम मुसलमान हैं, हमारा सर सिर्फ खुदा-ए-वहदहु ला शरीक के सामने झुक सकता है, वही इबादत के लायक है, इसके अलावा सब उसकी मखलूकात में हैं, उसकी इबादत का तसव्वुर भी हमारे अकाइद इस्लाम के मुनाफी है, जिसे हम कभी नहीं कर सकते।
तौहीद की अमानत सीनों में है हमारे ★ आसां नहीं मिटाना नामो-निशां हमारा
(अल्लामा इकबाल)
✍️: मोहम्मद शाहिद गुड्डावी