वह पंद्रह अगस्त की सुहानी शाम थी, बारिश की फुहारें और सर्द हवाएं दिलों को सुकून बख्श रही थीं, इसी मुसरत व शादमानी में एक फ़र्द बशर से मुलाक़ात हुई, आं जनाब के बेतकल्लुफ़ाना अंदाज़ और उनकी नटखट बेटी को देख कर मैं सवाल कर बैठा कि आखिर आपके साहिबज़ादगान कितने हैं? इतना पूछना था कि एक दिलख़राश दास्तान का आग़ाज़ हो गया; फ़रमाने लगे: कि बच्चों की तादाद तो फ़क़त दो है लेकिन यह दूसरा बच्चा दिमाग़ी मर्ज़ से दोचार है, हुआ कुछ यूं कि जब यह मासूम फ़क़त 9 माह का था तो एक रोज़ अचानक पलंग से गिर पड़ा, जिसके नतीजे में दिमाग़ का अहम तरीन हिस्सा ज़ख़्म आलूद हो गया। हम इसे ले कर फ़िलफ़ौर नागपुर के मशहूर हॉस्पिटल पहुंचे, डॉक्टरों ने दस्तबरदारी का इज़हार करते हुए बरमला कह दिया कि यह हमारे बस की बात नहीं, अब तो उम्मीद की कोई किरण नज़र नहीं आती लेकिन हम कोशिश करेंगे लिहाज़ा आप इन कागज़ात पर दस्तख़त फ़रमा दें, चारो नाचार धड़कते दिल के साथ हमने दस्तख़त कर दिए, 3 यौम इंतज़ार के बाद डॉक्टरों ने अपना बिल वसूल किया और उन्हें रेफ़र कर दिया,
अफ़रातफ़री के माहौल में हम इसे लेकर लता मंगेशकर हॉस्पिटल पहुंचे, ज़हे क़िस्मत कि वहां डॉक्टर मौजूद ही न थे, इस बे हिंगम सूरत हाल को देखते हुए हमने आना फ़ाना फ़ैसला किया कि हम इसे लेकर उस हॉस्पिटल में जाएंगे जो दिमाग़ी इलाज में बला की महारत रखता है,
उधर क़दम क़दम पे नाकामियां हाथ लग रही थीं और उधर मासूम सी जान वेंटिलेटर पे आख़िरी लम्हात गुज़ारने पर मजबूर थी, वालिदैन का कलेजा मुंह को आ रहा था, माशी क़ुव्वत साथ देने से इनकार कर रही थी, जेब में बिल और हाथों में चंद कागज़ात के सिवा कुछ भी न था, अब हिम्मत टूट रही थी, हौसला जवाब दे रहा था, लेकिन उस मुरझाती कली को देख कर वालिदैन का हौसला चीख़ चीख़ कर कहने लगा

,"अभी तो मैं जवान हूं, अभी तो मैं जवान हूं,
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हौसले की हिम्मत अफ़ज़ा आवाज़ उनके दिल ओ जां से टकरा गई, बस क्या था? वालिदैन ने अज़्म मुसम्म कर लिया कि अब चाहे जो हो जाए हम हिम्मत नहीं हारेंगे, इस मासूम की आख़िरी सांस तक हम साथ निभाएंगे, इसी कश्मकश के आलम ए दीगरगूं में उनकी गाड़ी हॉस्पिटल जा पहुंची, जब वहां फ़ीस से वाक़िफ़ कराया गया तो उनके पैरों तले ज़मीन खिसक गई, यौमिया एक लाख?? वो मसाइब व आलाम क्या कम थे कि मज़ीद आ धमकें
लेकिन वो तो वालिद का हौसला था न? वो कब जवाब दे सकता था?? उसकी हिम्मत कब टूट सकती थी? उस अज़्म ओ हौसले के पहाड़ ने लोगों से क़र्ज़ लिए और अपने बच्चे को इमरजेंसी वार्ड में दाखिल करा दिया, फिर वही पुरानी रविश, उन डॉक्टरों ने अपना पल्ला झाड़ने के लिए उनके दस्तख़त महफ़ूज़ करा लिए, अलग़र्ज़ तीन यौम के बाद डॉक्टरों ने ख़ुश ख़बरी सुनाई कि आपके बच्चे ने ज़िंदगी की जंग जीत ली अलबत्ता जो ज़ख़्म उसे लगे थे वो ता हयात उसके हमसफ़र रहेंगे, इतना सुनना था कि वालिदैन ख़ुशी से उछल पड़े, उन ग़रीब वालिदैन ने दो लाख सत्तर हज़ार रुपये अदा किए और इस ख़ुशी में घर लौट गए कि
,"फिर फ़स्ल बहारान आई है, उम्मीदों की किरण जगमगाई है,,
इन तमाम तर मसाइब से उलझने और पुर ख़तर राहों से गुज़रने के बाद भी दिमाग़ी आरिज़ा बाक़ी रह ही गया, मैंने सवाल किया कि दरबदर, शहर शहर, गली गली भटक भटक कर और इन मुशक़्क़तों की वादियों के ख़ारों से उलझ उलझ कर जब वो सेहतयाब न हो सका तो क्या आप मायूस नहीं हुए?? ज़रा जवाब सुनिएगा! उन्होंने बरजस्ता कहा कि मेरा नूर ए नज़र मेरी आंखों के सामने है जिसको जंग ए ज़िंदगानी में फ़तह नसीब हुई है, अब इसके सिवा और क्या चाहिए? अल्लाह अकबर, ऐ रब दो जहां तूने क्या अनोखी नेमत दी है, हम ही नाक़दरे हैं जो इस नेमत ए उज़मा की क़द्र नहीं करते।
यह तो सिर्फ़ एक वाक़िया है जिसे आप तक पहुंचाया गया वरना तो ऐसे सैकड़ों वाक़ियात हैं जहां अपनी औलाद को मसाइब में उलझता देख कर यह माएं सिसक सिसक कर रो पड़ती हैं गोया कि,"न ताब ए नज़र रहती है न ताब ए नज़्ज़ारा उसे,, यह माएं कितनी क़ुर्बानियां देती हैं हमें कुछ ख़बर भी है? उनके हौसलों की बुलंदी से हम कुछ वाक़िफ़ भी हैं? ज़रा ग़ौर कीजिए, कि वो दिसंबर की यख़ बस्ता हवाएं हों या जून की बाद ए समूम, उनकी हिम्मतें कभी नहीं हारतीं, हौसलों की उड़ान में कोई कमी नहीं आती, वो वक़्त ए सहर बेदार होकर बारगाह ए ख़ुदा में दस्त ब दुआ होते हैं, ज़िंदगी के हर मोड़ पर अपनी ख़्वाहिशें बाला ए ताक़ रख देते हैं! खुद भूके रह कर बच्चों का पेट भरते हैं, अपनी औलाद को कामयाबियों के मनाज़िल से हमकिनार कराने के लिए तरह तरह की परेशानियां उठाते हैं,
,लेकिन लेकिन, गर्दिश ए दौरां कभी किसी से वफ़ा नहीं करती    ْْْْ;
एक वक़्त आता है, कि वो सन रसीदा हो जाते हैं, भूलने की आदत सी पड़ जाती है, अदना अदना सी बातों पर ग़ैज़ ओ ग़ज़ब का शिकार हो जाते हैं, यह ऐसे दुश्वार गुज़ार मराहिल होते हैं जहां ख़िदमत गुज़ारी की सआदत हर एक को नसीब नहीं होती, आप नस्ल ए नौ को ही देख लें! क़द्रदानी तो दूर वो तो बे ग़ैरती की इंतिहा कर देती है, अलग़र्ज़ लिखने को तो बहुत कुछ है पर
 ,"आंखें जो देख रही हैं वो लब पर आएं क्या। 
,बस यहीं क़लम रोकता हूं और वक़्त ए रुख़्सत यह गुज़ारिश करता जाता हूं कि याद रखिये! यही वो हस्ती है जो हर मोड़ पर आपकी रहनुमाई करेगी, किश्ती हौसला की नाखुदाई करेगी, और लड़खड़ाते क़दमों की हौसला अफ़ज़ाई करेगी गोया यूं कि


वो करेंगे नाखुदाई तो लगे गी पार किश्ती
है नसीर वरना मुश्किल तेरा पार यूं उतरना
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8/11/2021
यह तहरीर बहुत पहले लिखी थी 

अबुल फ़ज़ल हैदरी