बेटियों के नाम एक खुला खत
(मुफ़्ती मुहम्मद इब्राहिम गफ़्फ़ारी)
मेरी प्यारी बेटी!
मैं यह खत तुम्हें किसी मिंबर से नहीं लिख रहा,
न ही किसी फ़तवे की ज़बान में…
मैं यह खत तुम्हें एक दर्द मंद दिल के साथ लिख रहा हूँ,
इस दिल के साथ जो तुम्हें खोते हुए डरता है।
बेटी!
तुम सिर्फ एक नाम नहीं हो,
तुम एक माँ की दुआ हो,
एक बाप की पेशानी का सुकून हो,
एक उम्मत की उम्मीद हो।
और जब तुम दीन से दूर होती हो
तो सिर्फ तुम नहीं बिखरतीं,
पूरे घर की रूह बिखर जाती है।
बेटी!
क्या तुम ने कभी सोचा है
कि इस्लाम ने तुम्हें क्या दिया?
तुम्हें ज़िंदा दरगोर होने से इज़्ज़त तक पहुँचाया,
तुम्हें ख़्वाहिश से वक़ार तक लाया,
तुम्हें बाज़ार से मेहराब तक उठाया।
वह दीन
जिस ने कहा:
बेटी रहमत है
बेटी अमानत है
बेटी जन्नत का रास्ता है
आज तुम उसी दीन को
बोझ समझने लगी हो?
बेटी!
जिन लफ़्ज़ों को तुम “आज़ादी” कह रही हो
वह दरअसल एक ख़ूबसूरत क़ैद है,
जहाँ जिस्म तो आज़ाद होता है
मगर रूह नंगी हो जाती है।
तुम्हें कहा जा रहा है
कि हिजाब रुकावट है,
कि नमाज़ क़दामत है,
कि इस्लाम सख़्ती है।
लेकिन बेटी!
ज़रा सच से आँख मिलाओ…
क्या वह दुनिया
जिस के लिए तुम अपना ईमान छोड़ रही हो
तुम्हें माँ की तरह मुहब्बत देगी?
क्या वह तुम्हें बहन की तरह महफ़ूज़ रखेगी?
या सिर्फ इस्तेमाल कर के
ख़ामोशी से छोड़ देगी?
बेटी!
मुहब्बत के नाम पर
तुम से जो दीन छीन रहा है
वह मुहब्बत नहीं,
वह सौदा है…
और इस सौदे में
नुकसान हमेशा तुम्हारा होता है।
क्या तुम जानती हो
कि ईमान टूट जाए
तो सब कुछ टूट जाता है?
क़ुरान कहता है
कि जो दीन से फिर जाए
उस के सारे आमाल ज़ाया हो जाते हैं।
बेटी!
यह कोई मामूली बात नहीं,
यह सिर्फ लिबास या रस्म का मसला नहीं,
यह रूह के मरने का मसला है।
मुझे मालूम है
तुम ने यह सब जान बूझ कर नहीं किया,
तुम्हें बहकाया गया है,
तुम्हारे जज़्बात को हथियार बनाया गया है।
लेकिन बेटी!
अल्लाह तुम्हें आज भी
वैसे ही बुलाता है
जैसे माँ बिगड़े हुए बच्चे को बुलाती है।
वह कहता है:
लौट आओ,
मेरी रहमत तुम से बड़ी है।
बेटी!
इस्लाम तुम से तुम्हारी ख़ुशी नहीं छीनता,
इस्लाम तुम्हें ऐसी ख़ुशी देता है
जो क़ब्र में भी साथ जाए।
नमाज़ क़ैद नहीं,
यह दिल की आज़ादी है।
परदा बोझ नहीं,
यह तुम्हारी शान है।
हया कमज़ोरी नहीं,
यह औरत की ताक़त है।
मेरी प्यारी बेटी!
अगर कभी दिल टूटे,
अगर दुनिया धोखा दे,
अगर सब छोड़ जाएँ…
तो याद रखना
एक रब है
जो आज भी तुम्हें
अपनी बाहों में लेने को तैयार है।
बस एक क़दम उस की तरफ़ बढ़ाओ…
यह ख़त
तुम्हें डराने के लिए नहीं,
तुम्हें खो देने के ख़ौफ़ में लिखा गया है।
अल्लाह तुम्हें
अपने नूर से जोड़े रखे,
तुम्हारे दिल में
इस्लाम की मुहब्बत हमेशा ज़िंदा रखे।
तुम बहुत क़ीमती हो,
अपना ईमान सस्ता मत करना
मुफ़्ती मुहम्मद इब्राहिम गफ़्फ़ारी
बानी व मोह्तमिम मदरसा अबूज़र गफ़्फ़ारी रज़ी अल्लाह अन्हु
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