बिन्ते अबुल खैर आज़मीؔ

इन्सानी इतिहास का हर दौर अपने अंदर कुछ सवाल, कुछ संभावनाएं और कुछ त्रासदी समेटे हुए होता है, मगर आज का इंसान जिस मोड़ पर खड़ा है वह महज एक ऐतिहासिक चरण नहीं बल्कि एक नैतिक परीक्षा है।
साइंस व टेक्नोलॉजी ने इंसान को फलक बोश इमारतों तक पहुंचा दिया, मगर दिलों के दरम्यान फासले पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गए।
हाथों में ताकत है, ज़ेहनों में वुसअत है, मगर दिलों में रहम कम और मुफ़ाद ज्यादा नज़र आता है।
आज इंसान ने चांद को मुसख़्ख़र कर लिया, मगर अपने ही हम जिन्स इंसान के दुख को समझने से कासिर है।
तरक़्क़ी की दौड़ में उसने सहूलतें तो खरीद लीं, लेकिन सुकून बेच दिया।
 ज़बान पर हुक़ूक़े इंसानी के नारे हैं, मगर अमल में कमज़ोरों का इस्तिहसाल, मज़लूमों की आहें और बे गुनाहों का खून सस्ता हो चुका है।
 इंसानियत के नाम पर होने वाली गुफ़्तगू और इंसानियत के नाम पर होने वाले आमाल के दरम्यान एक गहरा तज़ाद पैदा हो चुका है।

मुआशरा तेजी से बदल रहा है, रिश्ते मुफ़ाद के ताबे, दोस्ती ज़रूरत की मोहताज, और मोहब्बत शर्तों में जकड़ी हुई दिखाई देती है।
 वालिदैन का अदब क़िस्सों में रह गया, पड़ोसी का हक़ भुला दिया गया, और भूखे के दर्द पर नज़रें चुरा लेना मामूल बन चुका है।

सवाल यह नहीं कि वसाइल कम हैं, सवाल यह है कि एहसास कम क्यों हो गया है?
 सच दब जाता है, झूठ संवर जाता है।
 ऐसे में इंसानियत का चिराग़ मधम ज़रूर हुआ है, मगर बुझा नहीं।

अभी भी कहीं किसी मां की दुआ, किसी मज़लूम की आह, किसी नेक दिल की
खामोश मदद इंसानियत की सांसों को जिंदा रखे हुए है।

इंसानियत आज एक दोराहे पर खड़ी है: एक रास्ता वह है जो खुद गर्ज़ी, ज़ुल्म और
बे हिसी की तरफ जाता है; दूसरा वह जो रहम, अदल और ईसार की तरफ बुलाता है।

 फैसला हमें करना है कि हम किस सिम्त कदम बढ़ाते हैं।
 अगर हम ने दिलों को जिंदा रखा, ज़मीर को बेदार किया और कमज़ोरों का हाथ थामा, तो इंसानियत फिर से सर उठा कर चल सकती है; वरना तरक़्क़ी के मीनारों के साए में अख़लाक़ की लाशें उठती रहेंगी।

आखिर में यही कहा जा सकता है कि इंसानियत आज कमज़ोर ज़रूर है, मगर खत्म नहीं हुई।
इसे सिर्फ़ खुलूस, इंसाफ और ज़िम्मेदारी के सहारे की ज़रूरत है।
 अगर हर इंसान अपने हिस्से का चिराग़ जला ले, तो यह अंधेरा ज्यादा देर बाकी नहीं रह सकता।